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कारोबारियों के जुडऩे से होगा कृषि तकनीक विस्तार
खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  November 05, 2013

कृषि तकनीकी हस्तांतरण में बाजार की भूमिका को पहले कभी समझा नहीं गया। सार्वजनिक निधि का उपयोग करते हुए किए जाने वाले शोध के परिणामों का व्यवसायीकरण फिलहाल हमारे देश में मुश्किल ही है। परिणामस्वरूप कई नई तकनीकें और उत्पाद जिनकी जरूरत निर्माण क्षेत्र या फिर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने के लिए होती है, किसानों और दूसरे उपयोगकर्ताओं तक नहीं पहुंच पाते हैं। यह बात उन्नत बीजों, खासकर ऐसे गैर-अनाज फसलों जिनका वितरण सरकारी बीज एजेंसियों के हाथों में होता है, के मामले में पूरी तरह सच है।

इसके अलावा कृषि में काम आने वाली कुछ अन्य चीजों, पशुओं के टीके, रोगों की रोकथाम करने वाले उपकरण, नए उपकरण और अन्य चीजों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। शुक्र तो इस बात का है कि पुरानी मानसिकता अब बदल चुकी है। इसके चलते कृषि शोध केंद्रों और किसानों के बीच तकनीक का प्रवाह सुगम बनाने वाले संभावित उद्यमियों के लिए नए रास्ते खुलने लगे हैं।

वास्तव में यह सार्वजनिक धन का इस्तेमाल करने वाले राष्टï्रीय कृषि शोध तंत्र (एनएआरएस) की ओर से उठाया गया एक बड़ा और स्वागतयोग्य कदम है। एनएआरएस में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की शोध इकाइयां और राज्य कृषि विश्वविद्यालय शामिल हैं। इसका स्पष्टï लक्ष्य इस बात को सुनिश्चित कराना है कि शोध के परिणाम सिर्फ शोध पत्रिकाओं की शोभा बढ़ाने तक ही सीमित न रह जाए बल्कि उनका इस्तेमाल खेतों में भी होना चाहिए।

इसी दृष्टिïकोण को ध्यान में रखते हुए आईसीएआर कुछ ऐसे संस्थानों की शुरुआत कर रहा है जो विशेष रूप से कृषि तकनीकों को उन्नत और उनकी खोज करने की दिशा में काम करेंगे ताकि उनका प्रयोग व्यावसायिक ढंग से किया जा सके, साथ ही इन तकनीकों को संभावित निवेशकों को भी दिया जा सके। ज्यादातर कृषि शोध संस्थानों ने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए तकनीकी प्रबंधन इकाइयों की स्थापना कर ली है। इसके अलावा अलग-अलग शोध संस्थान में तैयार की गई बाजार में बेचे जाने लायक संभावित तकनीकों को संभावित उद्यमियों तक पहुंचाने के लिए दस तकनीकी शोध केंद्र और कारोबारी योजना एवं विकास इकाइयों की स्थापना की गई है। इस दिशा में वर्ष 2011 में एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया।

कृषि मंत्रालय के कृषि शोध एवं शिक्षा विभाग द्वारा कंपनी कानून, 1956 के अंतर्गत एक कंपनी 'एग्रीनोवेटÓ शुरू की गई। यह व्यावसायिक इकाई शोध जनित कृषि उत्पादों के निर्माण और उनका विपणन मुनाफे में साझेदारी के आधार पर करने के लिए सार्वजनिक-निजी, सार्वजनिक-सार्वजनिक और निजी-निजी साझेदारियों को बढ़ावा देने का काम करती है।

कुछ आईसीएआर शोध संस्थान टीके, निदान किट और इसी तरह के अन्य अपने अनूठे उत्पादों का उत्पादन और मार्केटिंग पहले से ही शुरू कर चुके हैं और उन्होंने बाजार में अपने ब्रांडों की साख भी बना ली है। लेकिन इसके लिए इन केंद्रों को अपने कंधों पर कारोबार परिचालन का अतिरिक्त बोझ उठाना होगा और इस मामले में इन केंद्रों के पास विशेषज्ञता की कमी है। इसके अलावा इन केंद्रों को कुछ अन्य बाधाओं का सामना भी करना पड़ता है। इन बाधाओं में सबसे प्रमुख है बाजार की समझ, उत्पादों और तकनीकों की लागत और कीमतें तय करने के तरीकों की कम जानकारी होना। ऐसे मामलों को एग्रीनोवट जैसे एक वाणिज्यिक उद्यम के जरिये हल किया जा सकता है।

शोध संगठनों में कारोबारी इकाइयों की स्थापना की जरूरत या फिर  इसके लिए एग्रीनोवेट जैसी विशेष तकनीक हस्तांतरण कंपनियों की भी जरूरत होती है। बौद्घिक संपदा अधिकारों की रक्षा के बढ़ते महत्त्व के कारण भी इन कंपनियों की जरूरत बढ़ रही है। दुनिया भर में रोज नए नवाचारों का पेटेंट हो रहा है। कुछ समय पहले तक अपनी नई तकनीकों का काफी कम संख्या में पेटेंट कराने वाले आईसीएआर संस्थानों ने अब बौद्घिक संपदा अधिकार का इस्तेमाल काफी अधिक मात्रा में करना शुरू कर दिया है।

जहां वर्ष 2001 में सिर्फ 11 आईसीएआर संस्थानों ने 34 तकनीकों और उत्पादों के पेटेंट कराए थे, वहीं इस वर्ष करीब 55 संस्थानों ने बौद्घिक संपदा अधिकार की रक्षा के लिए लगभग 1,600 आवेदन दाखिल किए हैं। समय के साथ-साथ इस संख्या में और तेजी आएगी। एग्रीनोवेट ने पहले ही भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान बेंगलूर के येलाहांका परिसर में पशुओं के पैर और मुख संबंधी व्याधियों को दूर करने वाले टीकों के उत्पादन का संयंत्र स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। सार्वजनिक-निजी साझेदारी वाली यह कंपनी राजस्व बंटवारे के आधार पर काम करेगी।

कंपनी इन टीकों की आपूर्ति ऐसे रोगों को जड़ से खत्म करने के अभियान चलाने वाली सरकारी एजेंसियों को करने की ओर ध्यान देगी। ठीक इसी तरह अगाती पाम ऑयल खेती के वक्त पाम बीजों की जरूरत पूरी करने के लिए एग्रीनोवेट ने एक निजी उद्यमी को संबंधित तकनीक का लाइसेेंस दे दिया है। एग्रीनोवेट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एम एम पांडेय का कहना है कि इस कंपनी का अपने सहयोगियों के साथ गठजोड़ अंत नहीं बल्कि लाइसेंसिंग करार के जरिये की गई एक शुरुआत है।

सभी प्रकार की तकनीकी मदद और तकनीक में सुधार के विकल्पों की मुहैया कराने, साथ ही उसे किसान के खेत तक पहुंचाने की अपनी प्रतिबद्घता पर कंपनी अभी भी कायम है। ऐसे में यह बात स्पष्टï है कि कृषि शोध संगठनों की  कारोबार प्रसार इकाइयों के साथ नए उद्यमियों के जुडऩे की वजह से कृषि तकनीक के प्रसार को वह व्यापकता हासिल करने में मदद मिलेगी जिसकी लंबे समय से जरूरत थी। दरअसल इसका लाभ दोतरफा होगा। किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को तकनीक विस्तार का लाभ मिलेगा।

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