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भूमि अधिग्रहण कानून से होगा समस्या का समाधान
विनायक चटर्जी /  October 24, 2013

नया भूमि अधिग्रहण कानून तमाम आलोचनाओं के बावजूद पुराने कानून की तुलना में अधिक तरक्कीपसंद है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विनायक चटर्जी

भूमि अधिग्रहण में समुचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन अधिनियम 2013 जिसे आमतौर पर भूमि अधिग्रहण कानून के नाम से जाना जाता है, को गत 27 सितंबर को राष्टï्रपति की मंजूरी मिल गई। विकास के हिमायती अनेक लोगों का कहना है यह अधिनियम औद्योगीकरण की प्रक्रिया को नष्टï कर देगा लेकिन हमें यह ध्यान देना चाहिए कि दरअसल इस अधिनियम का उद्देश्य क्या है और कैसे यह एक व्यापक और सोद्देश्य कानून है।

आइए 10 ऐसी वजहों पर विचार करते हैं जिनकी वजह से इस कानून को सकारात्मक अर्थों में लिया जाना चाहिए।

1. उपनिवेश काल में यानी 1894 में बने भूमिअधिग्रहण कानून का खूब गलत इस्तेमाल किया जा रहा था। जनहित वाले बिंदु का इस्तेमाल करने के मामले में सरकार सबसे बड़ी दोषी साबित हुई। नए कानून के मुख्य रचनाकार कहे जा सकने वाले जयराम रमेश आधिकारिक तौर पर कह चुके हैं:

'देश भर में सरकार ने जमीन का अधिग्रहण किया और उसके बाद 30-40 सालों तक वह यूंही बेकार पड़ी रही। खुद सरकार सबसे बड़ी अवैध निवासी है।Ó

'सरकारी कंपनियां पुनर्वास और पुनस्र्थापन के मोर्चे पर सबसे बड़ी डिफॉल्टर हैं।Ó 'बीते दशकों के दौरान चार करोड़ से अधिक आदिवासियों को विस्थापित किया गया लेकिन न तो उनका पुनर्वास हुआ न उन्हें हर्जाना मिला, यह देश के कुछ हिस्सों में वाम चरमपंथ के उदय की बड़ी वजह हो सकता है।Ó स्पष्टï है कि इस नए कानून का लक्ष्य निजी क्षेत्र को हताश करना नहीं बल्कि देश को खुद उसकी ही सरकार से बचाना है।

2.यह कानून केवल सरकारी अधिग्रहणों पर लागू होता है, जमीन की सामान्य खरीद फरोख्त पर नहीं। केंद्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा किसी सार्वजनिक काम, निजी-सार्वजनिक भागीदारी वाली परियोजना आदि के लिए अधिग्रहीत की जाने द्वारा भारी भरकम भूमि अधिग्रहण के लिए सरकार की मदद मांगे। हालांकि यह कानून निजी इस्तेमाल के लिए जमीन खरीदने के मामलों पर लागू नहीं होता।

3. 'सार्वजनिक  उपयोगÓ शब्द की अब स्पष्टï व्याख्या कर दी गई है। पुराने कानून में इसका खूब दुरुपयोग किया गया। इसके चलते कई जबरिया अधिग्रहण किए गए और कई मामलों में तो जरूरत से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया। इससे भी अधिक खतरनाक बात यह है कि इस शब्द का इस्तेमाल विकृत पूंजीवाद के लिए जमीन के सौदों में बड़ा आसरा बना रहा। विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर हुए जमीन अधिग्रहणों तथा विरोध प्रदर्शन की घटनाओं से हम सभी वाकिफ हैं।
दूसरा तरीका जो अपनाया गया वह था सरकारी संस्थाओं का निजी संस्थाओं के साथ संयुक्त उद्यम पर हस्ताक्षर। इसमें राज्य की आंशिक हिस्सेदारी रहती लेकिन इसके आधार पर वह कम कीमत पर जमीन का जबरन अधिग्रहण कर लेता।

4. कारोबारी जगत के लिए भी अधिग्रहण की लागत बड़ी समस्या बनी रही है। अर्थशास्त्री राजीव कुमार और प्रशांत कुमार ने गत 5 सितंबर को फाइनैंशियल टाइम्स में एक आलेख में पेश किए गए आकन में बढ़ी लागत के पहलू को प्रकट किया था। उन्होंने मध्य प्रदेश में नसरुल्लागंज क्षेत्र का उदाहरण लेते हुए बताया कि नए कानून की वजह से वहां जमीन अधिग्रहण की कीमत में सात गुना का इजाफा होगा और वह 12.91 लाख रुपये प्रति एकड़ से बढ़कर 89.90 लाख रुपये प्रति एकड़ हो जाएगी।

इसका क्या अर्थ हुआ? एनटीपीसी ने छत्तीसगढ़ के निकट लारा में 30,000 करोड़ रुपये से 4,200 मेगावॉट वाली तापबिजली परियोजना की घोषणा की। केंद्रीय बिजली प्राधिकरण के निर्देशों के मुताबिक परियोजना के लिए 2,400 एकड़ भूमि की आवश्यकता है। ऐसे में अगर नसरुल्लागंज वाला सिद्घांत लागू किया जाए तो केवल जमीन की लागत 2,158 करोड़ रुपये बैठती है। यह पूरी परियोजना लागत का 7.2 फीसदी होगा। जमीन की कीमत जिस तरह बढ़ रही है क्या यह अव्यावहारिक है वह भी तब जब यह कीमत विस्थापन के बाद सामाजिक संतुलन में मदद करेगी?

5. स्पष्टï है कि बड़ी परियोजनाओं को बेहद सचेत अंदाज में महंगे इलाकों से समुचित कीमत वाले भीतरी क्षेत्रों में जाना होगा। यह देश के विकास के लिहाज से अहम है।

6. देश के आर्थिक इतिहास में यह पहला मौका है जब भूमि अधिग्रहा को पुनर्वास और पुनस्र्थापन से सांविधिक तौर पर जोड़ा गया हो। यह प्रावधान केवल भू स्वामियों के लिए नहीं बल्कि उन लोगों के लिए भी है जिनकी आजीविका इससे प्रभावित हो रही है।

7. सार्वजनिक उपयोग, सहमति, हर्जाना और पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन जैस्ी बातों के शामिल होने के बाद अब उर्वर कृषि भूमि के एकदम विचारहीन तरीके से अधिग्रहण पर रोक लगेगी।

8.मशहूर अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन की पुस्तक 'आर्गुमेंटेटिव इंडियनÓ की धारणा को ख्याल में रखा जाए तो मसौदा विधेयक के प्रावधानों पर अंशधारकों और सत्ताधारी तथा विपक्षी दल के बीच चार साल तक चर्चा चतली रही। ऐसे में कोई सरकार पर यह इल्जाम नहीं लगा सकता है कि उसने पर्याप्त सलाह-मशविरा नहीं किया। 119 साल पुराने कानून में दोनों सदनों में भारी बहुमत से तब्दीली की गई।

9. अधिग्रहण का मूल्य तय करने के लिए स्पष्टï और व्यावहारिक तरीका अपनाया गया है। इस क्रम में जिला प्रशासन के विवेकाधिकार को खत्म कर दिया गया।
10. पांच वर्षों तक चली इस कानून को बनाने की प्रक्रिया के बाद इसके प्रावधानों की जटिलता को लेकर चिंताएं उचित ही हैं।

ऐसे में सरकार को भूमि अधिग्रहण के दौरान उद्योग जगत को होने वाली समस्याओं को ध्यान में रखते हुए समस्या निवारण की एक केंद्रीय व्यवस्था करनी चाहिए।
कारोबारी जगत अगर 1,000 करोड़ रुपये लागत वाले राष्टï्रीय भूमि रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम के क्रियान्वयन के लिए सरकार पर जोर देता रहे तो यह बेहतर होगा। इसके तहत भूमि रिकार्डों का कंप्यूटरीकरण किया जाएगा। अकेले इस कदम से ही पारदर्शिता में काफी इजाफा होगा और निजी क्षेत्र के जमीन के सौदे आसान होंगे। उद्योग जगत को इस बात पर भी जोर देना चाहिए कि राज्य सरकार भूमि बैंक निगम स्थापित करे ताकि बुनियादी सुविधाओं वाली भूमि के बड़े टुकड़े विकसित किए जा सकें। कुछ कुछ दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर की तर्ज पर। ऐसी पूर्वविकसित जमीन को विभिन्न प्रकार की आर्थिक गतिविधियों के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इतिहास नए भूमि अधिग्रहण कानून को एक ऐसे व्यापक कानून के तौर पर याद रखेगा जिसके जरिये आर्थिक, समाजशास्त्रीय और विकस संबंधी गतिविधियों में एक किस्म का संतुलन कायम करने की कोशिश की गई। जानकारी के मुताबिक अनेक अन्य विकासशील देश अब भारत के भूमि अधिग्रहण कानून को अपने यहां भूमि समस्याओं के निवारण के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। हमें इस कानून पर गर्व होना चाहिए।

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