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लालू की सदस्यता समाप्त
भाषा /  October 22, 2013

जुलाई में उच्चतम न्यायालय के फैसला सुनाने के बाद से इस तरह के दूसरे मामले में चारा घोटाले में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में बंद राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) नेता जगदीश शर्मा को लोकसभा की सदस्यता से अयोग्य ठहराया गया है।

लोकसभा महासचिव एस बाल शेखर द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार बिहार के सारण संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित 65 वर्षीय प्रसाद को कुल 11 साल के लिए अयोग्य ठहराया गया है। इसमें पांच साल के कारावास की सजा और रिहा होने के बाद छह साल तक चुनाव लडऩे पर रोक शामिल है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रसाद को झारखंड की एक अदालत ने इस महीने की शुरुआत में पांच साल के कारावास और 25 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

शेखर की ओर से जारी एक अलग अधिसूचना के अनुसार बिहार के जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले शर्मा 10 साल के लिए अयोग्य ठहराए गए हैं। उन्हें चार साल का कारावास और उसके बाद चुनाव कानूनों के अनुसार छह साल के लिए चुनाव लडऩे से वंचित किया जाएगा।  शर्मा को भी चारा घोटाला मामले में चार साल के कारावास की सजा सुनाई गई है। चुनाव आयोग को भी लालू और शर्मा को अयोग्य ठहराए जाने और लोकसभा में पैदा हुई रिक्तियों के बारे में सूचित किया जा चुका है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा उच्चतर अदालतों में अपील लंबित होने के आधार पर अयोग्यता से दोषी सांसदों को संरक्षण प्रदान करने संबंधी प्रावधान को गत 10 जुलाई को निरस्त किए जाने के बाद प्रसाद और शर्मा को अयोग्य ठहराया जाना ऐसा दूसरा मामला है जिसमें सांसदों को सदस्यता खोनी पड़ी है।

 लोकसभा की सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराए जाने का लालू और शर्मा का पहला मामला है। राज्यसभा में कांग्रेस के सदस्य रशीद मसूद का मामला पहला था जिन्हें कल अयोग्य ठहराया गया था। उन्हें सितंबर में भ्रष्टाचार और अन्य अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था।

राज्यसभा की अधिसूचना में कहा गया कि मसूद 19 सितंबर से संसद सदस्यता से अयोग्य हैं। उसी दिन सीबीआई ने उन्हें दोषी ठहराया था। जन प्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए इसमें कहा गया कि वह अपनी सजा की अवधि और रिहाई के बाद और छह साल के लिए अयोग्य रहेंगे। सांसदों और विधायकों को तत्काल अयोग्यता से बचाने वाले चुनाव कानून के प्रावधान को उच्चतम न्यायालय द्वारा निरस्त किए जाने के बाद मसूद दोषी ठहराए जाने वाले पहले संसद सदस्य थे।

उच्चतम न्यायालय ने अपने 10 जुलाई के फैसले में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (4) को निरस्त कर दिया था। इसके तहत सांसद, विधायक और विधान पार्षद उूपरी अदालतों में दोषसिद्धि के खिलाफ अपील के लंबित रहने तक अयोग्यता से बच जाते थे। अपील दोषसिद्धि के तीन महीने के भीतर की जानी है। उच्चतम न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए सरकार ने संसद के मॉनसून सत्र के दौरान एक विधेयक पेश किया था। लेकिन विपक्ष के विरोध के बाद विधेयक पारित नहीं किया जा सका।

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