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व्हिसलब्लोअर या षड्यंत्रकारी
सुधीर पाल सिंह /  October 18, 2013

करीब 68 वर्षीय प्रकाश चंद्र पारेख किसी अन्य सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी की तरह ही हैं, जो प्रशासनिक तंत्र में बिताए गए अपने जीवन के अनुभवों को एक किताब का रूप देने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन इससे पहले कि उनकी यह किताब पूरी हो पाती यह पूर्व कोयला सचिव ऐसे विवाद में फंस गए, जिससे सरकार के अस्तित्व पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साफ छवि को भी गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है कि पिछले तीन-चार दिन से पारेख सभी अखबारों की सुर्खियों में छाए हुए हैं। यह पूरा विवाद खनिजों के मामले में देश के समृद्ध राज्यों में से एक ओडिशा स्थित तालाबीरा 2 कोयला ब्लॉक आदित्य बिड़ला समूह की प्रमुख कंपनी हिंडाल्को को आवंंटित किए जाने को लेकर है। दरअसल 2005 में कोयला ब्लॉक जांच समिति के चेयरमैन के तौर पर पारेख ने ही हिंडाल्को को यह आवंटन किया था। कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले की जांच कर रहे केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने मंगलवार को इस मामले की 14वीं प्राथमिकी दर्ज की जिसमें उसने पारेख और आदित्य बिड़ला समूह के गैर कार्यकारी चेयरमैन और दिग्गज उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला को भी आरोपी बनाया है। सीबीआई ने इन दोनों पर धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र करने का आरोप लगाया है। 

सीबीआई के अनुसार जांच समिति ने यह ब्लॉक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी नेयवेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन को आवंटित करने की सिफारिश की थी लेकिन पारेख ने बिड़ला के साथ हुई बैठक के बाद 'अपने आधिकारिक पद का गलत इस्तेमाल करते हुएÓ समिति के फैसले को पलटकर हिंडाल्को को भी इसमें हिस्सेदार बना दिया। इससे पहले सीबीआई की ओर से दर्ज 13 प्राथमिकी में उसने कांग्रेस के सांसद और जिंदल स्टील ऐंड पावर के चेयरमैन नवीन जिंदल, पूर्व सांसद विजय दर्डा और झारखंड इस्पात के चेयरमैन आर एस रूंगटा जैसे कई दिग्गजों को नामजद किया है। लेकिन कोयला ब्लॉक आवंटन में अनियमितताओं से जुड़ी इस प्राथमिकी के बाद आया राजनीतिक भूचाल फिलहाल थमने का नाम नहीं ले रहा है क्योंकि पारेख ने प्राथमिकी में प्रधानमंत्री को भी शामिल करने की बात कही है। पारेख का कहना है कि नवंबर 2005 में जब यह आवंटन किया गया, तब प्रधानमंत्री ही कोयला मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे थे।

हालांकि अदालत में इस मामले के नतीजों पर सभी की नजर होगी क्योंकि साफ सुथरी छवि वाले पारेख को चौतरफा समर्थन मिल रहा है। नाम नहीं छापने की शर्त पर पारेख के साथ काम करने वाले एक वरिष्ठï आईएएस अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'पारेख बेहद ईमानदार अधिकारी के रूप में जाने जाते थे।Ó

पारेख के साथ काफी करीब से काम कर चुके एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी बताते हैं, 'इसमें कोई शक नहीं है कि वह बेहद ईमानदार और स्पष्टï व्यक्तित्व वाले व्यक्ति हैं। हकीकत यह है कि वह पहले व्यक्ति थे, जिसने कोयला भंडारों के आवंटन के लिए जांच समिति को हटाकर नीलामी प्रक्रिया शुरू करने की मुखरता से वकालत की थी।Ó इस बारे में पारेख को भेजे गए एसएमएस का कोई जवाब नहीं आया।

पारेख का जन्म जोधपुर में हुआ। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की से इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद उन्होंने ब्रिटेन के बाथ विश्वविद्यालय में आगे की पढ़ाई की। उन्होंने 1969 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से जुडऩे से पहले एनएमडीसी और हिंदुस्तान कॉपर में में एक खनन भूवैज्ञानिक के तौर पर काम किया। उन्हें आंध्र प्रदेश कैडर दिया गया, जहां वह भूमि प्रशासन के मुख्य आयुक्त भी रहे।

वह हैदराबाद में लोक आपूर्ति और कर प्रशासन विभाग से भी जुड़े रहे। 1983 में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में निदेशक के तौर पर वह केंद्र में पहुंचे लेकिन फिर उन्होंने आंध्र प्रदेश के उद्योग विभाग में वापसी की। पारेख ने 2004 में कोयला मंत्रालय के सचिव का प्रभार संभाला और दिसंबर 2005 में सेवानिवृत्त होने तक वह लगातार 21 महीने इसी पद पर रहे।

भारतीय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने कोयला आवंटन पर सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पारेख ने चयन समिति के जरिये ब्लॉक आवंटित करने की संदेहास्पद प्रक्रिया को समाप्त करने की सिफारिश की थी। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में पारेख को एक 'व्हिसलब्लोअरÓ बताया है क्योंकि पारेख ने ही लिंकेज से निकले कोयले और निजी इस्तेमाल के लिए हो रहे खनन से मिले कोयले की कीमतों में अंतर पर प्रमुखता से बात की थी। दिलचस्प है कि सीएजी ने जिसे व्हिसलब्लोअर करार दिया सीबीआई ने उसे ही षड्यंत्रकर्ता बना दिया। 

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