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जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिम और हम
श्याम सरन /  October 16, 2013

जलवायु परिवर्तन की समस्या मुंह बाये खड़ी है और हम हैं कि उससे निगाहें मिलाने को तैयार ही नहीं हैं। आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट के बहाने हमें सचेत कर रहे हैं श्याम सरन

गत 27 सितंबर को स्टॉकहोम में जलवायु परिवर्तन पर पांचवें अंतररसरकारी पैनल (आईपीसीसी) के कार्य समूह 1 ने नीतिनिर्माताओं के लिए अपनी अनुमोदित संक्षेपिका जारी की। इस संक्षेपिका में जलवायु परिवर्तन को लेकर अद्यतन वैज्ञानिक आकलन पेश किए गए थे। यह दस्तावेज वर्ष 2007 में आए आईपीसीसी के चौथे दस्तावेज के बाद जलवायु परिवर्तन पर सबसे महत्त्वपूर्ण दस्तावेज है।

उस दस्तावेज ने ही संयुक्त राष्टï्र के जलवायु परिवर्तन समझौते के तहत जलवायु परिवर्तन पर एक बहुपक्षीय बातचीत की पृष्ठïभूमि तैयार की थी जो आज भी चल रही है। एक ओर जहां आईपीसीसी की पूरी रिपोर्ट की प्रतीक्षा है वहीं मौजूदा दस्तावेज इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जिन निष्कर्षों पर सहमति दी गई है वे वैज्ञानिक तरीकों से निकाले गए हैं और डरबन प्लेटफार्म पर तय बातचीत की दशा और दिशा को प्रभावित करेंगे। डरबन में हुई बातचीत के मुताबिक वर्ष 2015 तक एक ऐसा प्रोटोकॉल तैयार करना है जो सभी पक्षों पर वैधानिक तरीके से लागू किया जाएगा।

अनुमोदित संक्षेपिका में कहा गया है कि जलवायु व्यवस्था में व्याप्त होती गर्मी का प्रभाव जानने के लिए किसी खास दक्षता अथवा वैज्ञानिक अनुभव की आवश्यकता नहीं है और वर्ष 1950 के बाद से अब तक विभिन्न दशकों में मौसम संबंधी कई बदलाव दर्ज किए गए हैं। इनमें से कुछ तो अप्रत्याशित है। हमारा वातावरण और हमारे महासागर गर्म हुए हैं, बर्फ बड़ी मात्रा में पिघली है, समुद्र का जल स्तर बढ़ा है और ग्रीन हाउस गैसों का घनत्व भी बढ़ा है।

रिपोर्ट में इस बात का भी विशेषतौर पर उल्लेख किया गया है कि कैसे धरती के गर्म होने में इंसान की बहुत बड़ी भूमिका है। खासतौर पर 200 साल पहले औद्योगिक क्रांति की शुरुआत होने के बाद जीवाश्म ईंधन अर्थात पेट्रोलियम पदार्थों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने, आबादी बढऩे के कारण धरती के इस्तेमाल के बदलते स्वरूप ने, कृषि क्षेत्र और आबादी के विस्तार तथा इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक वनों के घनत्व में आ रही कमी और कार्बन डाइ ऑक्साइड के अवशोषण में कमी ने धरती को गर्म किया है। धरती पर मौजूद महासागरों में कार्बन का स्तर बढ़ता जा रहा है और उनकी अवशोषण क्षमता पर इसका असर पड़ रहा है।

इस प्रक्रिया में वे धीरे-धीरे गर्म होते जा रहे हैं। इस सदी के अंत तक समुद्री जल स्तर अपने मौजूदा स्तर से एक मीटर तक ऊपर हो जाएगा। ग्रीनलैंड की बर्फ पूरी तरह पिघल जाए तो समुद्री जल स्तर सात मीटर तक और ऊंचा हो जाएगा। ये सभी बदलाव मौसम के रुझान पर असर डाल रहे हैं। इस आकलन में भारत के काम की बातें भी शामिल हैं।

एक ओर जहां मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं वहीं वातावरण में आर्दता बढऩे के कारण मॉनसूनी बारिश और जोर पकड़ सकती है। मॉनसून के समय में बहुत अधिक बदलाव नहीं होगा हालांकि यह थोड़ा जल्दी आ सकता है। मॉनसून के लौटने में जरूर देरी हो सकती है। इससे अनेक क्षेत्रों में मॉनसून का दौर लंबा हो जाएगा। सवाल यह हे कि क्या दिल्ली में इन दिनों जो बारिश हो रही है उसे देर से हो रही मॉनसूनी बारिश करार दिया जा सकता है? संक्षेपिका में अनुमान जताया गया है कि मौसम की अतिरंजित घटनाओं का घटित होना जारी रहेगा और लू चलने की घटनाओं में भी बढ़ोतरी होगी। हाल ही में देश के पूर्वी तट पर आया फाइलीन तूफान भी जलवायु में निरंतर हो रहे परिवर्तन का उदाहरण है।

रिपोर्ट का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा कार्बन और गैर कार्बन ग्रीनहाउस गैसों के घनत्व से जुड़ी ङ्क्षचताओं पर हँै। वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्घि को औद्योगिक युग से दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की संभावनाओं को जीवित रखने के लिए यह आवश्यक है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 800गीगाटन कार्बन के स्तर तक सीमित रखा जाए। वर्ष 2011 तक हम 530 गीगाटन गैस का प्रयोग कर भी चुके हैं ऐसे में हमारे पास केवल 270 गीगाटन ही बकाया है। जाहिर है अगले 20 से 25 सालों के दौरान हम इस बकाया का भी प्रयोग कर ही लेंगे।

यह बात ध्यान दिए जाने लायक है कि अगर किसी जादू से जीएचजी उत्सर्जन शून्य भी हो जाता है तो भी जलवायु में बदलाव जारी रहेगा क्योंकि अभी हो रहा उत्सर्जन भी वातावरण में देर तक ठहरा रहता है। संक्षेपिका में कहा गया कि है कि अब तक वातावरण में छोड़ी जा चुकी कार्बन डाय ऑक्साइड वहां अगले 1000 सालों तक बरकरार रह सकती है।

पहली बार हमारे पास एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें मौजूदा प्रवाह के बजाय अब तक हो चुके उत्सर्जन पर इस तरह ध्यान दिया गया है। यह दस्तावेज दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन का ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से भी अनिवार्य संबंध है। यह स्टॉक मुख्यरूप से विकसित औद्योगिक देशों की देन है जबकि इसमें हालिया इजाफे के लिए भारत और चीन जैसे देशों को दोषी ठहराया जा सकता है। ऐसे में जाहिर है जिम्मेदारी का अधिक बोझ विकसित देशों को ही वहन करना चाहिए तथा विकासशील देशों के साथ सहयोग करना चाहिए कि वे भी ऐसा ही कर सकें।

इस संक्षेपिका में जलवायु परिवर्तन के आसन्न संकट के महत्त्व को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया गया है और नीति निर्माताओं के समक्ष हालात को एकदम स्पष्टï कर दिया गया है। अब यह उनकी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि वे इससे निपटने के लिए किस तरह एकजुट होते हैं। कुछ वक्त से यह बात एकदम स्पष्टï हो चुकी है कि जबतक वैश्विक स्तर पर उत्पादन और खपत के तौर तरीके में बदलाव नहीं किया जाएगा और उसे जीवाश्म ईंधन से इतर वैकल्पिक माध्यमों पर नहीं ले जाया जाएगा तब तक इस दिशा में कोई खास प्रगति कर पाना संभव नहीं नजर आता है।

इन तमाम बातों के बीच भी ओईसीडी की वर्ष 2012 की रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया की शीर्ष 200 तेल, गैस एवं खनन कंपनियों ने नए तेल एवं गैस क्षेत्र खोजने में 674 अरब डॉलर की रकम खर्च की। उसी वर्ष नवीकरणीय ऊर्जा में होने वाले निवेश में भी कमी आती देखी गई। इसके अलावा अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) दुनिया भर में हर साल तकरीबन 19 खरब डॉलर की राशि ऊर्जा सब्सिडी पर खर्च की जाती है। ऐसे में यह सोचना बहुत मुश्किल है कि इस समस्या से कैसे निजात पाई जा सकेगी?

भारत ने यह घोषणा की है कि धरती का वातावरण पूरी दुनिया के नागरिकों की साझा संपत्ति है और इस पर उनका बराबरी का हक है। वास्तव में जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए वैश्विक और सहयोगपूर्ण कदम की आवश्यकता है। भारत को समता के सिद्घांत पर जोर देने के लिए इस नवीनतम विश्लेषण का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि विकसित देश लगातार इसे हाशिए पर डालने की कोशिश कर रहे हैं। इस वर्ष के अंत में पोलैंड में होने वाली यूएनएफसीसीसी की बैठक में हमें इस रिपोर्ट के सहारे अपनी बात रखनी चाहिए।

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