बिजनेस स्टैंडर्ड - तमाम पंचाटों के गठन के बाद भी नहीं सुधरे हालात
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तमाम पंचाटों के गठन के बाद भी नहीं सुधरे हालात
अदालती आईना
एम जे एंटनी /  October 13, 2013

पिछले कुछ सालों के दौरान हर क्षेत्र में पंचाटों की स्थापना का रुझान देखने को मिला है। उम्मीद थी कि पंचाटों के जरिये मामलों को जल्दी और सस्ते में निपटाने में मदद मिलेगी। सामान्य न्यायालयों के मुकाबले पंचाट मामलों को जल्दी निपटाने में मददगार साबित होंगे। लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगी क्योंकि पंचाटों का रवैया भी आम न्यायालयों की ही तरह रहा। जैसे ढेरों बकाया, सैकड़ों रिक्तियां, बुनियादी ढांचे की कमी और कोषों की अनुपलब्धता। कई न्यायविदों का मानना है कि पंचाट बनाना एक प्रयोग था जो सफल नहीं हो सका। जहां तक बात ऋण वसूली की है पंचाटों की वजह से बैंक और वित्तीय संस्थान कमजोर ही हुए हैं। न्यायालयों ने ऐसे कई मामलों में दखल कर चुका है। हालिया मामला उच्चतम न्यायालय का है।

गृह ऋण वसूली के आठ साल पुराने एक मामले में न्यायालय ने कुछ बहुत ही जरूरी सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने कहा, 'बैंकों में निहित आर्थिक अधिकारों, उधार लेने वालों को मिले सुरक्षा के अधिकारों के नाम पर बकाएदारों को कब तक सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। अगर यह बात मान भी ली जाए कि न्यायिक प्रक्रिया में कुछ दिक्कतें हैं फिर भी सांविधिक पंचाट कब तक ऐसे मामलों में ढील देते रहेंगे और इस बात की अनदेखी करते रहेंगे कि ढील देने की बात पूरी तरह संपत्ति के मूल्यांकन से जुड़ा है।Ó स्टैंडर्ड चार्टर्ड बनाम धर्मेंद्र के मामले में सुनवाई करते हुए न्यायालय ने भागवत गीता के श्लोक को भी दोहराते हुए कहा, 'हे पार्थ, उठो और जागो।Ó

इस साल जनवरी में उच्चतम न्यायालय ने ऋण वसूली पंचाटों पर काफी समय दिया और अपने फैसले में सरकार को स्थिति में सुधार करने के निर्देश दिए। न्यायालय ने यह फैसला डीआरटी बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ के मामले में दिया।

हालांकि ताजा फैसले से एक बात साफ है कि निर्देशों का पालन नहीं किया गया और सुधार की गुंजाइश अभी भी बाकी है। दरअसल अर्थव्यवस्था में आई मंदी की वजह से ऐसे मामलों में अनिर्णय की स्थिति करीब 70 फीसदी तक इजाफा हुआ है। चालू वित्त वर्ष के दौरान देशभर के कुल 33 ऋण वसूली पंचाटों में चल रहे करीब 43,000 मामलों में 1.43 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए। वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक अकेले मुंबई क्षेत्र की तीन पंचाटों में 3,632 मामलों के लिए करीब 43,401.37 करोड़ रुपये खर्च किए गए। उम्मीद थी कि दो जरूरी कानूनों के पारित होने से गैर निष्पादित संपत्तियों में कमी आएगी। रिकवरी ऑफ डेट ड्यू टू बैंक ऐंड फाइनैंशियल इंस्टीट्शन ऐक्ट, 1993 और सिक्योरिटाइजेशन ऐंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनैंशियल ऐसेट्स ऐंड इनफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट ऐक्ट, 2002, इन दोनों ही कानूनों की कार्यप्रणाली से उधार लेने वाले और ऋणदाता दोनों को ही निराश किया है। ऐसे में स्टैंडर्ड चार्टर्ड से संबंधित हालिया निर्णय इस मामले में स्पष्टï संकेत देने वाला है। अपीलीय पंचाट ने इस मामले पर फैसला देने में करीब पांच वर्ष का समय लिया। फैसले में कहा गया है, 'कानून द्वारा इसमें निहित जिम्मेदारियों को वह पंचाट भूल ही गया।Ó साथ ही न्यायालय ने कहा इस बात पर गौर करना भी जरूरी है कि पंचाट ने इस मामले में बिना किसी कारण स्थगन आदेश दिए और इसे बहुत संक्षिप्त आदेश देकर निपटा दिया।

वर्ष 2010 के यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया बनाम सत्यवती मामले में न्यायालय ने कहा कि पंचाटों की कार्यपद्घति आम अदालतों की ही तरह हो गई और वकील मामले को जल्द रफादफा करने की हरसंभव तरीके अपनाते हैं। नियुक्ति का दोषपूर्ण तरीका देरी की एक प्रमुख वजह है। ट्रांसकोर बनाम भारत संघ मामले में अदालत ने मूल दावे पर महंगाई के प्रभाव और पंचाटों के समक्ष पेश किए गए प्रतिवादों का भी जिक्र किया।

पिछले दस महीनों में सर्वोच्च न्यायालय ने कर्ज वसूली पंचाटों की कार्यपद्घति को सुधारे जाने को लेकर कई निर्देश जारी किए हैं। इनमें से कई निर्देशों का जिक्र करना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सरकार का ध्यान इन मामलों की ओर आकर्षित किया जा सके। हालांकि सोने का अभिनय करने वालों को नींद से जगाना बहुत ही मुश्किल होता है।

पंचाटों के तंगहाल भवनों में काम करने की ओर इशारा करते हुए न्यायालय ने कहा कि अगर सरकारी भवनों में पर्याप्त स्थान है तो संबंधित विभाग को पंचाट के लिए स्थायी जगह मुहैया करानी होगी। अगर सरकारी भवन में जगह की कमी है तो ऐसी स्थिति में पंचाट को किसी सरकारी कंपनी के भवन में पट्टïे या किराये पर स्थायी जगह मुहैया कराई जाएगी। अगर यह दोनों स्थितियां संभव नहीं हो तो ऐसे में किसी सरकारी प्राधिकरण जमीन लेकर भवन का निर्माण कराया जाए या उचित प्रकार से बनी इमारत पंचाट के लिए मुहैया कराई जाए।

कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण सुझाव देते हुए न्यायालय ने कहा कि संभावित वरिष्ठï अधिकारियों की रिक्तिओं की जरूरत के मुताबिक भरा जाए, जल्दी से जल्दी पंचाट सेवाओं को सुधारने और उसे स्वचालित बनाने के लिए सूचना प्रौद्योगिक सेवाओं का इस्तेमाल करते हुए ई-डीआरटी परियोजना लागू की जाए, साथ भर्तियों और पदोन्नतियों का भी खयाल रखा जाए। केंद्र सरकार ने इनमें से कुछ सुझाव पर अमल शुरू किया और न्यायालयों के सभी सुझावों से सहमति भी जाहिर की है। न्यायालय का कहना है कि अगर सुझावों को इस मामले में लागू नहीं किया गया तो यह मामला एक फिर से न्यायालय के समक्ष पेश किया जाएगा। लेकिन फिर भी इन्हें लागू करने और न ही पंचाटों की कार्यपद्घति को लेकर अदालत का ध्यान फिर से आकर्षित करने को लेकर कोई काम किया गया है। हालांकि उच्च न्यायालयों को पंचाटों पर निगरानी का अधिकार दिया गया है लेकिन फिर भी उच्च न्यायालय ज्यादा कुछ कर पाने में असमर्थ रहे हैं क्योंकि अधिकार देते वक्त अदालत यह मानकर चल रही थी कि उच्च न्यायालयों को फैसलों और निर्देर्शों के बारे में पता होगा। ऐसे में न्यायिक उपचार अब मुश्किल का सबब बन चुके हैं और दोनों ही पक्ष यानी लेनदार और देनदार एक दूसरे को संदेह की नजर से देखने लगे हैं और इसका सीधा असर हमारी आर्थिक वृद्घि पर पड़ रहा है।

Keyword: Tribunals, Debt, Recovery,
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