बिजनेस स्टैंडर्ड - कारोबारी माला के मोदी
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कारोबारी माला के मोदी
बीएस संवाददाता /  October 02, 2013

जब नरेंद्र दामोदरदास मोदी को 2014 में होने वाले आम चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो ज्यादा लोगों को हैरानी नहीं हुई। हालांकि मोदी की उम्मीदवारी पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपना विरोध जताया लेकिन मोदी की प्रभावशीलता के सामने उनकी आवाज कमजोर पड़ गई। अगर कारोबारी जगत के हस्तियों की चली होती तो 63 वर्षीय मोदी काफी पहले ही प्रधानमंत्री बन गए होते।

दूरसंचार क्षेत्र के दिग्गज सुनील मित्तल ने काफी पहले जनवरी 2009 में ही उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए काबिल उम्मीदवार करार दे दिया था। उन्होंने कहा था, 'वह राज्य चला रहे हैं तो देश भी चला सकते हैं।Ó इस साल जनवरी में अनिल अंबानी ने मोदी को 'सबमें बेहतरीन, नेताओं का नेता, राजाओं में राजाÓ कहा था। आनंद महिंद्रा ने तो पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि वह दिन अब दूर नहीं जब 'लोग चीन में वृद्धि के गुजरात मॉडल के बारे में बात करेंगेÓ। वर्ष 2001 में जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने उससे पहले ही धीरुभाई अंबानी ने उनसे मुलाकात करने के बाद कहा था, 'लंबी रेस नो घोड़ो छेÓ (मोदी लंबी रेस का घोड़ा हैं)।

दि इकनॉमिक टाइम्स के लिए हाल में नील्सन ने 100 मुख्य कार्याधिकारियों का सर्वेक्षण कराया जिसमें 80 फीसदी ने कहा कि वह मोदी को प्रधानमंत्री के रुप में देखना चाहते हैं। मोदी के लिए दुर्भाग्य की बात यह है कि इन मुख्य कार्याधिकारियों की तादाद चुनाव को प्रभावित करने के लिए नगण्य है। नई दिल्ली की वास्तविक लड़ाई वातानुकित बोर्डरूम के बजाय भारतीय गांवों की गर्मी और धूल से भरी सरजमीं पर होगी। लेकिन एक बात तो तय है कि मोदी के पास ऐसे कारोबारियों का समर्थन जरूर है जो उनके इशारे पर कुछ भी कर सकते हैं। हालांकि इस साल जनवरी में सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा, '1930 के दशक में जर्मनी के कॉरपोरेट जगत को भी अपने शासक के प्रति कुछ इसी तरह का सम्मोहन था।Ó
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इस वक्त मोदी को लेकर जिस तरह का माहौल दिखाया जा रहा है वैसी स्थिति पहले नहीं थी। गुजरात में फरवरी और मार्च 2002 में हुए मुस्लिम विरोधी दंगे ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। देश की जनता के साथ-साथ कारोबार जगत की प्रमुख शख्सियतों ने भी अपना रोष जाहिर किया था। एचडीएफसी के अध्यक्ष दीपक पारेख ने कहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष देश के तौर पर भारत की छवि को आघात पहुंचा है।

इन्फोसिस के एन आर नारायणमूर्ति और विप्रो के अजीम प्रेमजी ने भी गुजरात में हुई हिंसा की निंदा की थी। उसी साल अप्रैल में भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के एक कार्यक्रम में अनु आगा (थर्मेक्स) ने जब गुजरात पर बेहद जोशीला और भावुक भाषण दिया तो लोगों ने खड़े होकर इसका समर्थन किया था। उन्होंने अपने भाषण में यह आरोप लगाया था कि मोदी ने दंगाइयों को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया।

मोदी के पास भी अपनी छवि सुधारने के लिए सीमित विकल्प थे। उनमें से एक तरीका था कारोबार जगत से जुड़े लोगों को रिझाने का जो बेहद व्यावहारिक होते हैं और वे किसी विचारधारा को बोझ भी नहीं ढोते हैं। 'नरेंद्र मोदी: दि मैन, दि टाइम्सÓ के लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय का कहना है कि मोदी के पक्ष में वोट मिलने से यह बात सामने आई है कि लोगों की दिलचस्पी आगे बढऩे में है।

उनका कहना है, 'उन्हें यही सुराग मिला।Ó ïफरवरी 2003 में सीआईआई ने नई दिल्ली में अपने सदस्यों के साथ मोदी का संवाद कराने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन कराया। मंच पर मोदी के साथ राहुल बजाज, जमशेद गोदरेज और तरुण दास (सीआईआई के तत्कालीन महासचिव) मौजूद थे। वहां मौजूद कारोबारी हस्तियां मोदी से बड़ी बेरहमी से मुश्किल सवाल पूछ रही थीं और मोदी कुपित हो रहे थे। सीआईआई से जुड़े एक सूत्र जो इस कार्यक्रम से जुड़े थे उनका कहना है कि उस दिन जिन वक्ताओं (बजाज) को चुना गया था वे ऐसे थे जिन नियंत्रण नहीं किया जा सकता था। पिछले साल अगस्त में कारवां पत्रिका में छपी एक खबर के मुताबिक गुजरात के करीब 100 सीआईआई सदस्यों को इस मुद्दे पर इस्तीफा देने के लिए धमकाया गया। मोदी के करीबी चुनिंदा गुजराती कारोबारियों गौतम अदाणी, करसन पटेल (निरमा) और अनिल बाकेरी (बाकेरी इंजीनियर्स) ने एक प्रतिस्पद्र्धी संगठन रिसर्जेंट ग्रुप ऑफ गुजरात की स्थापना की। दिल्ली में भी भाजपा नेतृत्व वाले सरकार तक सीआईआई की पहुंच कम हो गई।

इस तरह लॉबिइंग करने की सीआईआई की रफ्तार भी थोड़ी धीमी पड़ गई। जब दास ने अरुण जेटली से संपर्क किया तब तत्कालीन कानून मंत्री ने समझौते के लिए हामी भरी। लेकिन बात सिर्फ इतने ही तक सीमित नहीं थी। सीआईआई के सामने औपचारिक तौर पर माफी मांगने की बात सामने आई और फिर पत्र भेजना पड़ा। अगले साल मोदी ने दिल्ली में सीआईआई के दूसरे कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए हामी भर दी। वह कार्यक्रम अच्छा था लेकिन टेलीविजन चैनलों की वजह से खटास वाली बातें फिर सामने आईं जो इससे पिछले साल की कटुतापूर्ण बैठक का टेप चला रहे थे और कह रहे थे कि  'मोदी उस बैठक में बेहद नाराज थे।Ó

अक्टूबर 2008 में बदलाव का एक मोड़ आया। पश्चिम बंगाल के सिंगुर में नैनो कार बनाने के लिए टाटा मोटर्स की फैक्टरी काम शुरू करने वाली थी वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी इसका विरोध कर रही थीं। उस वक्त टाटा समूह की कमान रतन टाटा के हाथों में थी। वह ममता बनर्जी के विरोध से इतने उत्तेजित हुए कि उन्होंने यह घोषणा कर दी कि वह अपनी फैक्टरी को बंगाल से हटाने के लिए तैयार हैं। नैनो कार तैयार करने की यह बेहद प्रतिष्ठित परियोजना थी ऐसे में दूसरे अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने नौकरशाहों को यह परियोजना अपने राज्य में लाने के लिए सक्रिय कर दिया जिनमें उत्तराखंड, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य थे। लेकिन इस रेस के विजेता मोदी रहे जिन्होंने दुनिया के सबसे तेज धावक उसैन बोल्ट के माफिक अपनी रफ्तार दिखाई।

अहमदाबाद के नजदीक साणंद में एक जगह चुनी गई। केविन और जैकी फ्रेबर्ग ने अपनी किताब 'नैनोवेशनÓ में यह लिखा कि टाटा ने सिंगुर छोडऩे की घोषणा की उसके 96 घंटे के भीतर ही फैक्टरी के लिए समझौता ज्ञापन तैयार करा लिया गया। बाद में टाटा ने यह टिप्पणी भी की, 'आमतौर पर किसी राज्य में जमीन और दूसरी मंजूरियों के लिए 90 से 180 दिन लगते हैं।

वहीं गुजरात में इसके लिए सिर्फ तीन दिन लगे। ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ था।Ó उसके बाद ही रतन टाटा ने मोदी को 'गुड एमÓ और सिंगुर विवाद को 'बैड एमÓ कहा था। मोदी के विरोधियों और टाटा मोटर्स के प्रतिद्वंद्वियों का कहना है कि गुजरात ने उस परियोजना को हासिल करने के लिए हजारों-करोड़ों रुपये की कर छूट दी थी। गुजरात के एक सरकारी अधिकारी इस बात का खुलासा करते हैं कि स्टैंप शुल्क और रजिस्ट्रेशन शुल्क में छूट देने के अलावा टाटा मोटर्स को 20 सालों तक (निवेश से जुड़ा) वैट रिफंड की इजाजत दी गई। उनका कहना है कि यह सब कुछ इसलिए किया गया क्योंकि मोदी जानते थे कि उनके इस कदम से गुजरात निवेशकों के लिए एक अहम राज्य बन सकता है और उनके मन में इस राज्य में निवेश करने के प्रति सकारात्मक रुझान रहेगा।

उसके बाद की राह आसान थी। उस वक्त से लेकर अब तक दूसरी वाहन कंपनियां मसलन फोर्ड और मारुति सुजूकी ने गुजरात में बड़ी मात्रा में निवेश करने की घोषणा की है। टाटा ने  'वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलनÓ में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मोदी निवेशकों के लिए इस मेले का आयोजन दो साल में एक बार कराते हैं।

नैनो करार पूरा होते ही जनवरी 2009 में एक रिपोर्ट में लिखा गया, 'टाटा ने मुख्यमंत्री (गुजरात) को गौरवान्वित किया है।Ó टाटा ने जैसे ही अपना भाषण खत्म किया ठीक उसी क्षण मोदी चलकर उनके पास आए और मंच पर ही उन्हें गले लगा लिया। यह भी गौर करने वाली बात है कि इस साल जनवरी महीने में टाटा के उत्तराधिकारी साइरस मिस्त्री ने भी अहमदाबाद में आयोजित वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में पहली दफा सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज कराई।
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कारोबारियों को मोदी इसलिए भाते हैं क्योंकि मोदी वहीं बोलते हैं जो ये कारोबारी सुनना चाहते हैं। मसलन रेलवे में निजी निवेश, रक्षा क्षेत्र को खोलने आदि। हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी के अजित गुलाबचंद का कहना है, 'वह बाजार, कारोबार के पक्षधर होने के साथ आर्थिक सुधार के हिमायती भी है।Ó लेकिन मोदी के आर्थिक सुधार विरोधी कदमों मसलन मोदी के बहुब्रांड रिटेल क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के विरोध को राजनीतिक अनिवार्यता की दलील देकर खारिज कर दिया जाता है। उनके बारे में यह राय होती है कि वह सोच-समझ कर फैसला लेते हैं लेकिन कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मोदी विभाजन की नीति पर अमल करते हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विपरीत बेहद दबंग हैं। एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि उनकी तानाशाह वाली छवि क्यों है तो मोदी ने जवाब दिया, 'आरोपों से आपको नतीजे नहीं मिलेंगे बल्कि प्रेरणा से आपको हमेशा नतीजे मिलेंगे।Ó

हालांकि एक बात पर सबकी सहमति होती है कि मोदी काम को पूरा कराने में माहिर हैं। एक बड़ी कंपनी के सीईओ का कहना है, 'एक बार अगर किसी परियोजना को उनके दफ्तर से मंजूरी मिल जाती है तो उसमें नौकरशाही, पुलिस या स्थानीय राजनेताओं की तरफ से कोई अड़चन नहीं आ सकती है।Ó एक अन्य कंपनी के प्रमुख का कहना है कि उन्होंने जब सौराष्ट्र में किसी परियोजना के अटकने  की शिकायत मोदी से की तो उन्होंने खुद ही इसका उपाय करने के लिए टेलीफोन किया। उनका कहना है, 'वह मसला तुरंत ही सुलट गया।Ó

गुजरात की एक मझोली दवा कंपनी के मालिक का कहना है, 'आपको अपना काम कराने के लिए नौकरशाहों के साथ बैठकर चाय पीने की जरूरत नहीं है।Ó इन कामों के बदले मोदी कारोबारियों से जो भी मांग करें उन्हें इससे कोई दिक्कत महसूस नहीं होती। अपोलो टायर्स के ओंकार कंवर ने जब गुजरात में एक इकाई स्थापित करने के लिए मोदी से मुलाकात की तो मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें जनजातियों के बीच रबर के नमूने वितरित करने होंगे और उनके उत्पादन का इस्तेमाल भी फैक्टरी में जरूर करना पड़ेगा।

मोदी किसी बड़े कारोबारी के कॉल का जवाब 24 घंटे के भीतर देते हैं और किसी आपात स्थिति में तीन घंटे के भीतर भी जवाब दिया जाता है। अगर किसी मसले में कुछ नहीं भी किया जा सकता है तो मोदी बिना किसी भूमिका के भी उस बात को कह देते हैं। मुंबई के एक बड़े कारोबारी कहते हैं, 'आपको बस यह पता होना चाहिए कि आप कहां खड़े हैं और आपको बार-बार आग्रह करने की जरूरत नहीं है। वह आपके पास हमेशा अपने जवाब के साथ आएंगे।Ó

कई अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों में बैठकों के दौरान ज्यादा आत्मविश्वास नजर नहीं आता है और वे कम से कम आधे दर्जन नौकरशाहों से घिरे होते हैं वहीं मोदी खुद ही बात करते हैं। एक दूसरे कारोबारी का कहना है, 'मोदी के बारे में दिलचस्प बात यह है कि अगर वह कहते हैं कि कोई चीज नहीं हो सकती है तो वह काम भाजपा के बड़े नेता या आरएसएस (भाजपा की वैचारिक संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) भी नहीं करा सकती है। जैसा कि कांग्रेस में अगर कोई मंत्री किसी काम से इनकार करता है तो आप 10 जनपथ (कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का आवास) या अहमद पटेल (राजनीतिक सचिव) के पास जा सकते हैं।Ó

वाइब्रेंट गुजरात के दौरान वरिष्ठ नौकरशाहों को दिग्गज कारोबारी हस्तियों के साथ रहने के कहा जाता है जो उनके प्रोटोकॉल अधिकारी की तरह काम करते हैं। मोदी भी व्यक्तिगत तौर पर देश के प्रमुख उद्योगपतियों को आमंत्रित करते हैं। इस सम्मेलन में नियमित रूप से शिरकत करने वाले एक शख्स का कहना है, 'इनकार करने का तो सवाल ही नहीं उठता। अगर आपने कोई विदेश यात्रा भी तय कर रखी है तो वह आपको इसे रद्द करने के लिए कहेंगे।Ó एक कारोबारी का कहना है कि इस सम्मेलन से तीन दिन पहले उन्होंने तीन वक्ताओं को कॉल कर पूछा कि वे सम्मेलन में क्या कहेंगे, अगर वे कुछ ऐसा कहेंगे जिसकी स्वीकृति मोदी नहीं देना चाहेंगे तो वह उनसे उसमें बदलाव की बात कहेंगे। कई दफा वह आयोजन स्थल पर आधी रात में भी तैयारी का जायजा लेने के लिए आ धमकते हैं।

मोदी ने मुखोपाध्याय को बताया था कि उन्होंने सांगठनिक दक्षता आरएसएस के दिनों में ही सीखी है। हालांकि उनकी सांगठनिक दक्षता के बावजूद कुछ कारोबारी हस्तियों को इस बात पर संदेह है कि अगर वह चुने भी जाते हैं तो वह नई दिल्ली में ज्यादा कुछ कर पाएंगे। पहली बात तो यह है कि राज्य के मुकाबले केंद्र में अलग तरह के मुद्दे होंगे। दूसरी बात यह भी है कि मोदी पर गठबंधन धर्म निभाने का दबाव होगा। सभी संकेतों की मानें तो भाजपा को लोकसभा में बहुमत हासिल करने में बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा। इस साल जनवरी में इकनॉमिस्ट पत्रिका ने कहा, 'मोदी की कार्यशैली गुजरात में रंग ला रही है। लेकिन इस तरह के निरंकुश तरीके को  राष्ट्रीय स्तर पर अमल में लाना मुश्किल होगा। खासतौर पर गठबंधन सरकार के दौर में तो स्वेच्छाकारी नीति मुश्किल होगी।Ó

कई कारोबारी आपको यह गोपनीय तरीके से बता सकते हैं कि मोदी के पास भी अपने पसंदीदा उद्योगपतियों की फेहरिस्त है। उन्हें अदाणी का बेहद करीबी समझा जाता है। यह महज एक इत्तफाक हो सकता है लेकिन मोदी जब से सत्ता में आए हैं उसी वक्त से अदाणी ने असाधारण रूप से तरक्की की है। वर्ष 2000 में उनकी हैसियत 3,300 करोड़ रुपये थी लेकिन अब यह 47,000 करोड़ रुपये हो गई है।

अदाणी ने वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन का प्रायोजक बनने के साथ ही राज्य द्वारा आयोजित पतंग और नवरात्र महोत्सव का आयोजन भी किया है। कुछ महीने पहले जब वॉर्टन इंडिया इकनॉमिक फोरम में मोदी मुख्य वक्ता के तौर पर शिरकत करने वाले थे और अचानक उनका कार्यक्रम वॉर्टन की ओर से रद्द कराया गया तो अदाणी ने भी इस इस कार्यक्रम से हाथ खींच लिया जो इसके प्रायोजन पर अच्छी-खासी रकम खर्च करने वाले थे। मोदी गोवा में अदाणी के बेटे करण की शादी और रिसेप्शन में भी गए जो अहमदाबाद में हुआ था। जून में अदाणी ने कहा था कि उन्हें न केवल गुजरात बल्कि कई राज्यों से सकारात्मक समर्थन मिल रहा है। हालांकि उन्होंने इस बात पर तवज्जो दी कि गुजरात सरकार की नीतियां बेहद सकारात्मक और स्पष्ट हैं।

मुंबई की कारोबारी बिरादरी के बीच यह चर्चा होती रहती है कि मोदी के करीबी होने की वजह से ही पर्यावरण मंत्रालय ने अदाणी पर 200 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। इसके अलावा चर्चा का बिंदु यह भी है कि मुकेश अंबानी के कृष्णा-गोदावरी बेसिन के गैस क्षेत्र पर सरकार इतनी सख्ती इसलिए दिखा रही है क्योंकि अंबानी गुजरात में 24 अरब डॉलर का निवेश करने जा रहे हैं। मुकेश अंबानी नियमित तौर पर वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में जाते रहते हैं। मोदी ने कभी कृष्णा-गोदावरी बेसिन से निकलने वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज की गैस की ज्यादा कीमतों पर या इस क्षेत्र से घट रहे उत्पादन पर कोई टिप्पणी नहीं की है।

करीब 10 साल पहले सीआईआई की एक बैठक हुई थी जो मोदी के लिए बहुत खराब साबित हुई थी। लेकिन अब तस्वीर बिल्कुल  बदल चुकी है। कुछ महीने पहले कोलकाता के एक कारोबारी मोदी से मिलने गए और 3 करोड़ रुपये का एक चेक बतौर सहायता राशि या चंदा लेकर गए। जब वह लौट रहे थे तो मोदी ने उनसे कहा, 'अगर आप यह राशि चंदे के तौर पर दे रहे तो तब तो ठीक है। लेकिन अगर आप यह सोच रहे हैं कि इसके बदले आपको कुछ हासिल हो जाएगा तो इसे अपने पास ही रखें।Ó इससे साफ हो जाता है कि अब बहुत कुछ मोदी के इशारों पर ही चलता है।
(साथ में विनय उमरजी और रुतम वोरा )

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