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चारा घोटाले से लालू के राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण!
सत्यव्रत मिश्रा / पटना 10 01, 2013

इतिहास में जब भी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद का नाम आएगा तो उसके साथ चारा घोटाले का भी जिक्र होगा। इस घोटाले ने न सिर्फ लालू प्रसाद के राजनीतिक भïिवष्य को खतरे में डाला है बल्कि इस घटना ने बिहार के राजनीतिक समीकरण भी बदल दिया है। लालू के लिए यह घोटाला काफी दुखद रहा है जिसने  प्रधानमंत्री बनने के उनके ख्वाब पर पानी तो फेरा ही साथ में उनसे मुख्यमंत्री की कुर्सी भी छीन ली थी।

यह घोटाला करीब 10 साल तक बेरोकटोक चलता रहा। इस घोटाले की शुरुआत 80 के दशक के मध्य में हुई थी, जब राज्य सरकार ने समाज के वंचित तबके के लिए दुधारू पशु योजना शुरू की थी।  इस योजना के तहत राज्य सरकार ने अनुसूचित जाति व जनजाति के प्रत्येक परिवार को एक दुधारू पशु और पशु के लिए हर महीने चारा देने का ऐलान किया था।

शुरुआत में यह घोटाला मवेशियों और चारे के फर्जी वितरण तक ही सीमित था। लेकिन 1990 में बिहार की सत्ता लालू के हाथ में आते ही इस घोटाले के मुख्य आरोपी श्याम बिहारी सिन्हा और अन्य अफसरों ने राज्य के मुख्यमंत्री के साथ अपनी नजदीकियों का फायदा उठाना शुरू कर दिया। उन्होंने बड़े पैमाने पर मवेशियों, चारे और वाहनों की फर्जी खरीद दिखानी शुरू कर दी। साल 1993-94 और 1995-96 के बीच अविभाजित बिहार के रांची, दुमका, चाईबासा, जमशेदपुर, गुमला और पटना जिला प्रशासन ने 253 करोड़ रुपये के चारे की खरीद की जबकि उनका आवंटन महज 10 करोड़ रुपये का था। जांच में यह खरीद भी फर्जी पाई गई। यह पैसा दागी अधिकारियों और राजनेताओं की जेब में गया।

नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) ने भी अपनी रिपोर्ट में ऐसी ही एक घटना का उल्लेख किया, जिसमें रांची में राज्य सरकार के एक फार्म में भैंसों के सींगों को चमकाने के लिए महज एक साल में 50 हजार लीटर सरसों का तेल खरीदा गया था। उस समय कैग के मुताबिक इससे राज्य सरकार को 15 लाख रुपये का घाटा हुआ था। इसके अलावा कैग ने अपनी रिपोर्ट में मवेशियों के परिवहन में इस्तेमाल होने वाले वाहनों को किराए पर लेने में फर्जीवाड़े का भी खुलासा किया।

राज्य सरकार ने कैग के सामने किराए पर लिए गए ट्रकों के जो बिल पेश किए गए थे, उनमें वाहनों का रजिस्ट्रेशन नंबर भी थे। हालांकि जांच में वे नंबर कार, ऑटोरिक्शा और कुछ मामलों में तो स्कूटर के पाए गए। जैसे जैसे लालच बढ़ा दागी अधिकारियों ने सीधे कोषागार से बड़े पैमाने पर अवैध निकासी शुरू कर दी। इनमें भी रांची, दुमका, चाईबासा, जमशेदपुर, गुमला और पटना कोषागारों से सबसे ज्यादा निकासी की गई।

लूट का आलम यह था कि 1990-91 के बीच अधिकारी 600 करोड़ रुपये से ज्यादा डकार गए थे। यह पशुपालन विभाग के 6 साल के कुल बजट का दोगुना था। इसमें भी तीन चौथाई रकम तो 1993-94 से 1995-96 के बीच निकाली गई। मुख्यमंत्री के सीधे आदेश की वजह से ही ऐसा मुमकिन हो सका जबकि राज्य के वित्त सचिव और मुख्य सचिव ने इन निकासियों पर बार-बार सवाल उठाए थे। 

उन दिनों राज्य के वित्त विभाग का कामकाज भी लालू प्रसाद के पास ही था।   इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने भी इस घोटाले में अहम भूमिका
निभाई थी। सीबीआई के मुताबिक मिश्रा ने पैसों के बदले सिन्हा और अन्य दागी अधिकारियों के लिए सिफारिशी पत्र लिखे थे। 

रशीद मसूद को 4 साल की सजा
दिल्ली की एक अदालत ने भ्रष्टाचार के एक मामले में राज्यसभा सदस्य एवं कांग्रेस नेता रशीद मसूद को आज 4 साल जेल की सजा सुनाई। ऐसे में उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले के बाद मसूद अपनी सीट गंवाने वाले वह पहले सांसद होंगे। फैसला सुनाए जाने के बाद 67 वर्षीय मसूद को हिरासत में ले लिया गया। विशेष सीबीआई न्यायाधीश जे पी एस मलिक ने मसूद को स्वास्थ्य मंत्री के पद पर रहते केंद्रीय पूल से मेडिकल कॉलेजों में त्रिपुरा को आवंटित सीटों पर जालसाजी कर अयोग्य छात्रों को नामित करने के जुर्म में सजा सुनाई।

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