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सरकारी खर्च में कटौती से होगा फायदा पर दिक्कतें भी मुमकिन
दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 23, 2013

पिछले सप्ताह केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने जोरशोर से सरकार की ओर से खर्चों में कटौती संबंधी घोषणाएं कीं। मंत्रालय के मुताबिक इन कटौतियों का मकसद विकास के मद से इतर होने वाले खर्चों में कटौती और प्राथमिक योजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधनों का इस्तेमाल करना है। इस वित्त वर्ष में की गई यह ऐसी पहली घोषणा है क्योंकि राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.8 फीसदी के स्तर तक सीमित रखना मुश्किल होता दिख रहा था।

ध्यान रहे कि वर्ष 2012-13 में भी वित्त मंत्रालय ने गैर-जरूरी खर्चों को कम करने के लिए तीन परिपत्रों के जरिये कुछ ऐसे ही दिशा-निर्देश जारी किए थे। पहला परिपत्र मई में जारी किया गया था और उसके बाद दो परिपत्र 1 और 14 नवबंर को जारी किए गए थे। गौर करने वाली बात यह है कि पहला परिपत्र पी चिदंबरम के वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभालने के पहले ही जारी किया जा चुका था। सरकार के राजकोष पर इन परिपत्रों का सामूहिक असर गौर करने लायक था। पिछले वर्ष के बजटीय अनुमान के मुताबिक सरकार का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.1 फीसदी तक रखने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन साल के दौरान की गई समीक्षा के मुताबिक परिस्थितियों के जस के तस रहने पर यह अनुमान लगाया गया कि साल के अंत तक राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.6 फीसदी के स्तर तक पहुंच सकता है। लेकिन उन परिपत्रों और सरकार की सख्ती की वजह से साल के अंत में सरकार का राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.9 फीसदी रहा।

पिछले साल पूरे किए गए लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2013-14 के लिए पेश किए गए खर्चों में कटौती के प्रस्ताव को लेकर भी सकारात्मक रुख रखना चाहिए। दरअसल इस प्रस्ताव के कुछ विशेष प्रावधानों पर गौर करने से सरकार के बचत के लक्ष्यों को लेकर स्पष्टï संकेत मिल सकते हैं। गैर-योजनागत खर्च में 10 फीसदी कटौती करने के प्रस्ताव पर नजर दौड़ाते हैं, जिसके अंतर्गत ब्याज भुगतान, रक्षा पर होने वाले पूंजी खर्च, वेतन, पेंशन और वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक राज्यों को दिए जाने वाले अनुदान शामिल हैं।

इन परिपत्रों में शामिल कटौती के प्रावधानों के तहत करीब 11 लाख करोड़ रुपये के कुल गैर-योजनागत खर्च का लगभग दो तिहाई हिस्सा करीब 10 फीसदी की कटौती से बच जाएगा। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वास्तविक बचत 37,800 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगी। यह माना जा रहा है कि गैर-योजनागत खर्च का सिर्फ 3.78 लाख रुपये ही कटौती के दायरे में आएगा। लेकिन फिर भी खास बात यह है कि इतनी बचत काफी मायने रखती है। इस बचत की मदद से राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 0.33 फीसदी तक कम करने में मदद मिलेगी।

बात यहीं खत्म नहीं होती है। हाल ही में जारी किए गए इस परिपत्र में कुछ दूसरे महत्त्वपूर्ण कदम भी उठाए गए हैं। किसी योजना या गैर योजना कार्यक्रम के तहत किसी भी तरह की नियुक्तियों पर रोक लगाने से भी वेतन पर होने वाले सरकारी खर्च को थामने में मदद मिलेगी। सरकार ने यह फैसला मई, 2014 में होने वाले आम चुनावों से कुछ महीने पहले ही किया है, वित्त मंत्रालय के इस कदम से कुछ केंद्रीय मंत्रियों के उस अधिकार पर रोक लग जाएगी जिसके तहत वे राजनीतिक फायदे के लिए नई योजनाएं और नौकरियां पैदा करने की कोशिश करते हैं।

इसके अलावा एक साल से अधिक समय से खाली पड़ीं रिक्तियों को भरने की भी मनाही कर दी गई। हालांकि विशेष और न टाले जा सकने वाली परिस्थितियों में छूट का भी प्रावधान है। ऐसी विशेष परिस्थिति में व्यय विभाग की मंजूरी जरूरी होगी। साल की आखिरी तिमाही में एकमुश्त खर्च करने से सरकारी वित्त के प्रबंधन और परियोजनाओं में वित्तीय संसाधनों के इस्तेमाल की गुणवत्ता पर ध्यान देने में दिक्कत होती है। यह बात और भी मुश्किल तब हो जाती है जब साल चुनावी हो। इस बात को ध्यान में रखते हुए पिछले हफ्ते जारी किए गए परिपत्र में एक सिद्घांत लागू करने की बात की गई है।

इस सिद्घांत के तहत वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही में बजट अनुमानों में घोषित कुल खर्च के एक तिहाई से अधिक हिस्से को खर्च करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वित्त वर्ष के आखिरी महीने यानी मार्च में बजट में आवंटित कुल खर्च का 15 फीसदी से अधिक खर्च करने की अनुमति नहीं होगी। इस प्रावधान के लागू होने से आवंटित संसाधनों को जल्दबाजी में खर्च करने के लिए फैसले नहीं लिए जाएंगे। सबसे जरूरी बात यह है कि खर्चों पर लगाई गई ये पाबंदियां सभी योजनाओं और खर्च के प्रत्येक मद पर लागू होंगी। साफ है कि वित्तीय अनुशासन को लागू करते वक्त किसी भी तरह का भेदभाव नहीं बरता गया है।

खर्चों में कटौती के इस प्रस्ताव में प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा की जाने वाली यात्रा से जुड़े प्रावधानों में समस्या नजर आती है। अधिकारियों को घरेलू यात्राओं के लिए इकनॉमी क्लास में उड़ान भरने को कहा गया है। लेकिन सचिव या विशेष सचिव या फिर प्रत्यक्ष कर, अप्रत्यक्ष कर बोर्ड के सदस्य, वन और पुलिस संगठनों के मुखिया इस प्रावधान से प्रभावित नहीं होंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि घरेलू यात्रा में इकनॉमी क्लास की उड़ानों का इस्तेमाल करने का प्रावधान प्रशासनिक सेवा में उच्च स्तर पर कार्यरत अधिकारियों पर लागू नहीं होंगे। क्या अधिकारियों के बीच इस तरह का विभेद जरूरी था? सचिव या विशेष सचिव और अतिरिक्त सचिवों के बीच किए गए इस विभेद कई ऐसी समस्याएं उभर सकती हैं जिन्हें टाला जा सकता था।

परिपत्र में अधिकारियों की अंतरराष्टï्रीय यात्राओं पर भी मामूली पाबंदियां लगाई हैं। सभी अधिकारियों को उनके लिए तय किए गए मानक के मुताबिक क्लास चुनने की अनुमति दी गई है लेकिन उच्च स्तर पर काम कर रहे अधिकारियों को सिर्फ बिजनेस क्लास में यात्रा करने के लिए कहा गया है।  एक बात साफ कर दी गई है कि घरेलू और अंतरराष्टï्रीय उड़ानों में अधिकारी अपने साथी का मुफ्त टिकट नहीं ले सकेंगे। इस परिपत्र ने एक बार फिर से अधिकारियों की पात्रता व्यवस्था को पूरी तरह दुरुस्त करने की जरूरत की ओर इशारा किया है, इस काम को कटौती का काम पूरा होने के बाद किया जा सकता है।

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