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सरकारी बेरुखी से दम तोड़ रहा बनारसी काष्ठ कला उद्योग
अजय मिश्र / वाराणसी September 20, 2013

एक समय था जब वाराणसी के छोटे-बड़े रेलवे स्टेशनों पर रेलगाड़ी रुकते ही लकड़ी के खिलौने बेचने वाले उसमें पहुंच जाते थे। लेकिन अब यह गुजरे जमाने की बात हो गई है। दरअसल सरकारी अनदेखी और बिचौलियों की कारगुजारी से 'बनारसी काष्ठï कला उद्योगÓ आखिरी सांसें गिन रहा है। यूं तो वाराणसी की पहचान धार्मिक नगरी के तौर पर है लेकिन लकड़ी के खिलौने और अन्य कलात्मक वस्तुओं ने भी इस शहर की ख्याति को बढ़ाया है। इसके कारीगरों को फख्र है कि उनकी सदियों पुरानी कला को दुनिया जानती है।

वाराणसी के कश्मीरीगंज, खोजवां इलाके लकड़ी के खिलौनों के अड्डïे हैं। यहां कारीगर बेजान लकड़ी को तराशकर खूबसूरत शक्ल बख्शते हैं, जो देश-विदेश में सजाई जाती हैं। लेकिन आज यह उद्योग सरकारी नीतियों और प्लास्टिक के खिलौनों (खासकर चीन से आयातित) के कारण अपनी पहचान खो रहा है। खिलौनों की मांग घटने से कारीगर रोटी को भी मोहताज होने लगे हैं। आलम यह है कि गिने-चुने लोग ही इसमें जुटे हैं और निर्यात भी नाम मात्र का है।

बेजान लकडिय़ों मूर्त रूप देने वाले कारीगर विजय कुमार को यह हुनर अपने पूर्वजों से मिला है। वह तीसरी पीढ़ी से हैं, जो इस धंधे से पेट पाल रही है। लेकिन पिछले कुछ सालों से इनके व्यवसाय पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। विजय को दुख इस बात का भी है कि नए लोग अब इस धंधे में नहीं आ रहे हैं। ऐसे में उनके बाद इस कला को संभालने वाला कोई नहीं होगा।

इस कुटीर उद्योग की साख गिरने के पीछे कई कारण हैं। पहला झटका इस उद्योग को तब लगा जब 1981 में तत्कालीन सरकार ने इसमें उपयोग होने वाली कोरैया लकड़ी के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी। उस समय इस इलाके में करीब 1000 से 1500 मशीनें हुआ करती थीं और 2000 से ज्यादा कारीगर खिलौने बनाकर देश-विदेश में बेचा करते थे। लेकिन अब इस कला को 500 से भी कम करीगर जिंदा भर रखे हुए हैं। कारीगरों के हितों को लेकर संघर्ष करने वाले लकड़ी खिलौना कारीगर रोजगार अधिकार मंच से जुड़े स्वतंत्र सिंह पवन के अनुसार सरकार पिछले 5-6 वर्षों से इस कला को बचाने का प्रयास कर रही है लेकिन इसका फायदा कारीगरों को नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि कारीगरों के कल्याण के लिए दी जाने वाली सुविधाएं कुछ स्वयंसेवी संगठनो के हाथों में सिमट कर रह गई है।

सुविधाओं के अभाव से दो-चार हो रहे इस उद्योग पर महंगाई की मार भी कम नहीं पड़ी है। इस उद्योग में कई पीढिय़ों से जुड़े 75 वर्षीय मास्टर रामखेलावन सिंह कुंदेर उदास मन से बताते हैं कि वे लोग रस्सी खींचकर सात मशीन चलाते थे और खिलौने बनाते थे। लेकिन अब केवल एक मशीन चलती है और मुनाफा नहीं होने के कारण उनके 10 में से 7 बेटे दूसरा काम करने लगे हैं।

उन्होंने बताया कि पहले जहां 5 से 7 रुपये सैकड़ा कोरैया की लकड़ी मिलती थी, वहां अब यूकेलिप्टस की लकड़ी भी आसानी से नहीं मिलती। सरकार मिर्जापुर, सोनभद्र और चित्रकूट के जंगलों से साल-छह महीने में 20 से 25 क्विंटल कोरैया की लकड़ी उपलब्ध कराती है, जिसे बिचौलिये दबा लेते हैं। यूकेलिप्टस की लकड़ी भी 400 रुपये से बढ़कर 1100 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है।

खिलौनों पर चित्रकारी में काम आने वाले चपड़े और लाख की कीमत 400 रुपये किलो से बढ़कर 1500 रुपये किलो हो गई है। कभी कोरैया की लकड़ी से बने खिलौने की चमक और गुणवत्ता चीनी खिलौनों को भी मात देते थे। लेकिन सस्ते प्लास्टिक का चलन बढऩे से लकड़ी के खिलौनों की पूछ कम होने लगी। बिजली की किल्लत ने भी इस उद्योग को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज कोई कारीगर 500 रुपये जमा कर थोड़ी-बहुत लकड़ी, रंग आदि का बंदोबस्त करता है और 100 से 150 रुपये रोजाना किराये पर देकर किसी और के मशीन पर काम कर खिलौने तैयार करता है।

बिजली चली गई तो उसके किराये का पैसा भी डूब जाता है। मदद के नाम पर स्वयंसेवी संस्थाएं कारीगरों से काफी कम कीमत पर खिलौने लेकर दिल्ली-मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में थोक विक्रेताओं को ऊंची कीमत पर बेच देते हैं, जहां से तगड़े मुनाफे के साथ इनका निर्यात फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका को हो जाता है।

कभी विदेशी बाजार यहां के खिलौनों से पटे रहते थे लेकिन अब देसी बाजारों में भी लकड़ी के खिलौने कभी-कभार ही दिखते हैं। यही हाल रहा तो बनारस की पहचान रहा यह उद्योग इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा।

Keyword: खिलौने, वाराणसी, धार्मिक नगरी,
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