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कांग्रेस को मिल सकता है 'आधार'
मिहिर शर्मा /  September 20, 2013

एक जमाने में इन्फोसिस के कर्ताधर्ता और अब भारतीय विशिष्टï पहचान प्राधिकरण के मुखिया नंदन नीलेकणी का खबरों से पुराना नाता है। अगर आप लोकप्रियता से बचना चाहते हैं तो आप एक बेस्टसेलिंग किताब नहीं लिखेंगे और न ही भारत सरकार के सबसे बड़ी और विवादास्पद परियोजना के मुखिया का पद स्वीकार करेंगे। नीलेकणी इस बात को बखूबी समझते हैं कि राजनीति की दुनिया में वह एक बाहरी ही हैं। जितना ही वह सुर्खियों में रहेंगे, जाने-माने लोग उनकी ओर उतना ही ध्यान देंगे।

जब नीलेकणी ने वर्ष 2009 में इन्फोसिस के निदेशक मंडल से इस्तीफा दिया तो उन्होंने कंपनी से 28 साल पुराना नाता तोड़ा था। नीलेकणी उन दो लोगों में से हैं जिन्होंने वर्ष 1981 में इन्फोसिस की नींव रखी थी। दूसरे व्यक्ति हैं एन आर नारायणमूर्ति, जिन्होंने इन्फोसिस को उबारने के लिए एक बार फिर से कंपनी का हाथ थाम लिया है। बेंगलूर की इस दिग्गज आईटी कंपनी में नीलेकणी ने कई अहम पदों पर रहते हुए काम किया। इसमें वर्ष 2002 में कंपनी के सीईओ के तौर पर उनकी पारी भी शामिल है। उन्होंने बोर्ड का चेयरमैन रहते हुए कंपनी का साथ छोडऩे का फैसला किया और सफेद ऐंबेसडर कारों और लुटियंस बंगलों के शहर दिल्ली का रुख किया। कुल मिलाकर उन्होंने खुद को इन्फोसिस से दूर कर लिया ताकि इन्फोसिस के बारे में कुछ भी कहने से बच सकें। वर्ष 2009 में जब उनके जीवन में यह बदलाव आया तब उन्होंने कुछ ऐसा करने की अपनी इच्छा को जता दिया कि वह कुछ परिवर्तनकारी काम करना चाहते हैं।

यूआईडी के लिए भी अक्सर परिवर्तनकारी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। उनकी बेहतरीन किताब इमेजनिंग इंडिया वर्ष 2008 में प्रकाशित हुई, उस दौरान 2009 के चुनावों की गहमागहमी शुरू हो चुकी थी। किताब के बाजार में आने के बाद जब मैंने उनसे मुलाकात की तो उनके पास तमाम तरह के विचार थे और उनके भीतर जबरदस्त ऊर्जा देखने को मिली। उस मुलाकात में उन्होंने भारतीय पूंजीवाद की खामियों और विकृतियों और कमजोर श्रम कानूनों की वजह से हुए नुकसान पर जमकर चर्चा की। उसी दौरान दुनिया को मंदी का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने पहले ही इस बारे में चेतावनी दे दी थी कि भारत की 8 फीसदी की विकास दर सुधारों पर नहीं बल्कि आसान नकदी पर आधारित है और इसकी कमी होने पर देश को संघर्ष करना होगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सुधार को बेहतर तरीके से पेश करना होगा ताकि उसे सामान्य कामगारों तक पहुंचाया जा सके।

चार सालों तक उन्होंने यूआईडी के लिए अकेले ही काम किया, इस दौरान उनकी ऊर्जा कुछ हद तक भले ही कम हुई हो लेकिन विचार अभी भी उनके लिए काफी मायने रखते हैं। इस बात में कोई दोराय नहीं है कि यूआईडी परियोजना आसान नहीं थी। सामान बेचने के मामले में भले ही नीलेकणी पारंगत हों लेकिन यूआईडी को लोगों तक पहुंचाने में कई तरह की दिक्कतें थीं। राज्य स्तरीय नेताओं को इस बात की चिंता थी कि यूआईडी से उनके विवेकाधीन अधिकारों पर आंच आएगी, कार्यकर्ताओं को इस बात का डर था कि नकद हस्तांतरण के लिहाज से यूआईडी पहला कदम साबित हो सकता था। निजता की वकालत करने वाले लोगों ने इस काम को सबसे अधिक प्रभावित किया।

नीलेकणी ने उन लोगों तक पहुंचने की लाख कोशिशें कीं लेकिन जो लोग यह मानते हैं कि यूआईडी निजता पर राज्य द्वारा किया जाने वाला अतिक्रमण उन्हें समझा पाना नामुमकिन था।  इसके अलावा आंतरिक स्तर पर जारी कुछ लड़ाइयों से भी उन्हें लोहा लेना था। बहुत से लोगों की भौंहें तब तन गईं जब उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया गया, हालांकि यूआईडीएआई योजना आयोग के अंतर्गत काम करता है और योजना आयोग के मुखिया को भी कैबिनेट मंत्री का ही दर्जा प्राप्त होता है। योजना आयोग में भी चीजें सामान्य नहीं थीं, विभाग के सचिव ने यूआईडी के वित्त के बारे में काफी सवाल उठाए और वित्तीय मामलों की देखरेख के लिए विशेष वित्तीय सलाहकार की नियुक्ति करने के लिए भी कहा। वित्त मंत्रालय ने भी प्राधिकरण की वित्तीय मांगों को मानने से इनकार कर दिया, वह भी तब जबकि धन की कोई कमी नहीं थी।  लेकिन गृह मंत्रालय के साथ राष्टï्रीय जनसंख्या रजिस्टर को लेकर उनकी जंग काफी लंबी चली।

उस वक्त मंत्रालय की कमान पी चिदंबरम के हाथों में थी। राष्टï्रीय जनसंख्या रजिस्टर की शुरुआत राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने सभी भारतीय नागरिकों की जानकारी जुटाने के लिए किया था। इसका मकसद बांग्लादेश से होने वाले आव्रजन से बचाव था। रजिस्टर का मुख्यालय गृह मंत्रालय में था। यूआईडी और राष्टï्रीय जनसंख्या रजिस्टर के बीच छिड़ी जंग के चलते आधार का काम महीनों पिछड़ गया। लेकिन नीलेकणी ने बुद्घिमानी दिखाते हुए सार्वजनिक रूप से कुछ भी नहीं कहा। नीलेकणी ने कुछ समझौते भी किए लेकिन नीलेकणी इस लड़ाई को जीतने में कामयाब रहे।

यूआईडी के विचार से नीलेकणी का जुड़ाव भले ही कितना भी गहरा हो लेकिन वह हमेशा इससे जुड़े नहीं रहेंगे। बदलाव के विचार की वजह से नीलेकणी का आकर्षण इस परियोजना से था। अब आधार का मूल काम पूरा हो चुका है। शायद यही वजह है कि नीलेकणी के बेंगलूर दक्षिण से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतरने की खबरें भी रही हैं। तकनीक की दुनिया में नीलेकणी एक जाना-माना नाम है। उनकी मदद से कांगेे्रस को मध्यमवर्गीय लोगों को लुभाने में भी मदद मिलेगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर 2014 में संप्रग सरकार वापसी करती है तो नीलेकणी को क्या दायित्व सौंपा जाएगा? शायद इस बात का जवाब सिर्फ गांधी परिवार ही दे सकता है।

Keyword: UID, आधार', भारतीय विशिष्टï पहचान प्राधिकरण, नंदन नीलेकणी , इन्फोसिस,
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