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भाजपा का नया नेतृत्व पार कर पाएगा जादुई आंकड़े की बाधा?
दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 18, 2013

पिछले हफ्ते भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अगले साल मई में होने वाले आम चुनावों के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने की औपचारिक घोषणा की और उसके बाद घटित राजनीतिक घटनाक्रम से दो स्पष्टï संकेत मिले हैं। इन संकेतों या उनके प्रभाव को नजरअंदाज करने का मतलब होगा अगले कुछ महीनों के दौरान भारतीय राजनीति की संभावित चाल का पता नहीं लगाना। पूरे घटनाक्रम में प्रमुख बात मोदी की ताजपोशी है लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि इससे जो दो संदेश मिले हैं वे बेहद अहम हैं।

पहला संदेश मोदी के समर्थकों के इस विश्वास से मिलता है कि गुजरात के मुख्यमंत्री को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने का उनका सपना महज भाजपा के चुनावी गणित से हासिल नहीं किया जा सकता। वह इस तथ्य से भलीभांति वाकिफ हैं कि भाजपा का मौजूदा चुनावी गणित उसे इतनी सीटें नहीं दिला पाएगा, जितनी मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए जरूरी हैं। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें सीटों की संख्या में खासा इजाफा करना होगा और इसमें उनकी मदद करेगी 'मोदी लहरÓ। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो उन्हें उम्मीद है कि केंद्र में सरकार और अपने नेता को प्रधानमंत्री बनाने का दावा पेश करने की खातिर भाजपा की सीट बढ़ाने के लिए उन्हें इस लहर को मजबूत बनाना होगा।

दूसरा मोदी खेमे में इस बात पर आम सहमति है कि पिछले कुछ साल के दौरान राज्यों में हुए चुनावों में यह देखने को मिला है कि भारतीय मतदाताओं का
रुझान फैसले करने वाले नेताओं की ओर बढ़ा है। मतदाताओं ने एक दल या समूह को स्पष्टï बहुमत देकर उसे सरकार बनाने का अधिकार दिया है, जिससे
उसे गठबंधन राजनीति की मजबूरियों का हवाला देते हुए प्रशासन पर किसी तरह का समझौता नहीं करना पड़े। उत्तर प्रदेश, गुजरात या कर्नाटक में जो कुछ भी हुआ वह इस बात को सही साबित करता है। इन सभी राज्यों में मतदाताओं ने स्पष्टï बहुमत देकर स्थिर सरकार चुनी है। मोदी खेमे को यकीन है कि आठ महीने बाद होने वाले आम चुनावों में भी यही चलन देखने को मिलेगा।

मोदी खेमे की सकारात्मक सोच का आधार बने इन दोनों संकेतों का और विश्लेषण करने की जरूरत है। पहला सवाल जो दिमाग में आता है कि क्या ये दोनों संकेत परस्पर विरोधाभासी हैं। अगर चलन यह है कि मतदाता स्पष्टï बहुमत देकर स्थिर सरकार चुन रहे हैं तो फिर यह तर्क मोदी की अगुआई में भाजपा को लोकसभा में स्थिर सरकार बनाने में मदद क्यों नहीं करेगा? आखिर भाजपा को लोकसभा में 273 सीटों के जादुई आंकड़े को हासिल करने के लिए मोदी लहर की क्या जरूरत है?
यह भी मुमकिन है कि राज्य विधानसभा चुनावों में जो चलन देखने को मिले वह आम चुनावों में भी रहे। आमतौर पर विधानसभा चुनावों और आम चुनावों में मतदाता का व्यवहार बिल्कुल अलग होता है। इसमें कोई शक नहीं कि सरकार की निष्क्रियता 2014 में आम चुनावों का अहम मुद्दा रहेगा। दस साल के लंबे समय तक केंद्र में काबिज रहने के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) को मतदाताओं के गुस्से का सामना करना पड़ेगा।

लेकिन प्रक्रियागत निष्क्रियता के मामले में भी कई अपवाद हैं। दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार, ओडिशा में नवीन पटनायक और गुजरात में खुद मोदी ने साबित किया है कि प्रशासनिक क्षमता वाला नेता प्रक्रियागत निष्क्रियता से पार पा सकता है। लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या संप्रग सरकार दीक्षित, पटनायक और मोदी द्वारा उनके राज्य में हासिल सफलता को केंद्र में दोहरा पाएगी।

इस पूरे घटनाक्रम में जिस बात को नजरअंदाज किया गया है वह यह कि संप्रग सरकार ने देश के ग्रामीण इलाकों में काफी काम किया है मसलन रोजगार गारंटी योजना के जरिये ग्रामीण आय बढ़ाना, रियायती दरों पर अनाज मुहैया कराना और उद्योगों या बड़ी परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण के एवज में किसानों को ज्यादा मुआवजा दिलाना। सरकार के इन कदमों के असर को अभी तक शहरी भारत के ड्रॉइंग रूम में होने वाले कमरे या टेलीविजन स्टूडियों में हो रही किसी भी बहस में शामिल नहीं किया गया है। इसलिए काफी हद तक मुमकिन है कि निष्क्रियता का फायदा होने या मतदाता से स्पष्टï बहुमत को चुनने की अधिक उम्मीद कर रहे लोगों को निराशा भी हाथ लग सकती है।

अब अहम सवाल यह खड़ा होता है कि क्या भाजपा का नया नेतृत्व मोदी लहर पर सवार होकर वह जादुई आंकड़ा हासिल कर सकेगा। इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी की लहर भाजपा के लिए एक घातक हथियार भी बन सकती है। जरा 1971 और 1980 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी और 1984-85 में राजीव गांधी को मिली जीत याद कीजिए। ये चुनाव कांग्रेस ने एक लहर पर सवार होकर जीते थे।

मोदी लहर का असर भी कुछ ऐसा ही हो इसके लिए भाजपा को एक रणनीति बनानी होगी। मुजफ्फरनगर के दंगों ने भाजपा को एक बेहतरीन अवसर दिया है कि वह उन भावनाओं को भड़का दे, जो देश को बांटते हैं और मतों के ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में कर ले। विकास और वृद्घि अच्छे नारे बन सकते हें लेकिन इस लहर को मजबूत बनाने में उनकी भूमिका सीमित है।

लोकसभा चुनावों में जरूरी सीटों की संख्या के रूप में चुनावी गणित द्वारा पेश की गई इस बड़ी चुनौती से पार पाने के लिए मोदी खेमा बहुत हद तक मोदी की लहर पर भरोसा करेगा। भाजपा का नया नेतृत्व किस तरह और किस तरीके से इस लहर को बनाता है इस पर काफी ध्यान देने की जरूरत है। क्योंकि 2014 के बाद देश की राजनीतिक दिशा क्या होगी यह फैसला काफी हद तक इसी बात पर
निर्भर करता है।

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