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वक्त के साथ कदमताल करता हिंदी वेब मीडिया
विकास कुमार राव / नई दिल्ली September 13, 2013

हिंदी के अखबारों में जहां स्थानीय भाषा का प्रयोग होता है,वहीं वेब माध्यम ऐसी सीमा में बंधे नहीं होते, जाहिर है उनमें अधिक विविधता है तथा वे तेजी से अपने पाठक तैयार कर रहे हैं।

इंटरनेट और तकनीक के तेजी से बढ़ते प्रसार ने मीडिया के कई आयाम स्थापित किए हैं। विशेष तौर पर वेब मीडिया का दायरा और व्यापक हुआ है। अब हर किसी के हाथ में इंटरनेट है और वे खबरों के लिए अखबारों के पन्ने कम पलटते हैं जबकि किसी वेबसाइट पर नजर डालना ज्यादा उचित समझते हैं। खास बात यह है कि इसमें हिंदी वेब मीडिया ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। चूंकि यह आधुनिक मीडिया है, यही कारण है कि इसने समय में आए बदलाव के साथ कदम ताल किया है। बहरहाल हाल के वर्षों में हिंदी की ऐसी ढेरों वेबसाइटें शुरू हुई हैं और इनके पाठकों की संख्या भी दिनोदिन बढ़ रही है। ऐसे में यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वेब मीडिया का भविष्य काफी उज्ज्वल दिखाई दे रहा है।

सवाल यह उठता है कि हिंदी अखबारों की तुलना में वेब मीडिया की सामग्री किस तरह से भिन्न है। खास तौर पर हिंदी वेब मीडिया में भाषा का स्तर क्या है। वैसे इस बात में कोई संदेह नहीं कि चाहे कोई भी माध्यम हो उसकी भाषा बेहद सरल, सुगम और स्पष्ट होनी चाहिए। फिर भी दोनों माध्यमों में कुछ बुनियादी फर्क है। इस बारे में अध्ययन करने के पहले हमें यह देखना होगा कि अखबार और वेब मीडिया की क्या-क्या सीमाएं हैं?
भौगोलिक सीमा
अखबार का दायरा किसी खास भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित रहता है। यानी किसी विशेष क्षेत्र या प्रांत को ध्यान में रखकर अखबार निकाला जाता है। ऐसे में अखबार की भाषा पर उस क्षेत्र की बोली या भाषा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता है। दूसरे शब्दों में कहें तो हर क्षेत्रीय अखबार में स्थानीय भाषा का पूरा घालमेल रहता है।

दूसरी तरफ, वेब मीडिया को किसी भौगोलिक सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। इस पर किसी स्थानीय भाषा या बोली का प्रभाव नहीं दिखता। इसका प्रसार व्यापक है और इसे दुनिया के किसी भी कोने में पढ़ा जाता है। जाने-माने मीडिया विश्लेषक और प्रभासाक्षी डॉट कॉम के संपादक बालेंदु शर्मा दधीच का कहना है कि इंटरनेट के पाठक देश-विदेश में फैले होते हैं। इनमें से कुछ पाठक ऐसे भी हैं जिन्हें हिंदी बहुत अच्छी तरह से नहीं आती है। ऐसे में वेब मीडिया के लिए इस तरह की भाषा का चयन करना चाहिए जो सभी को बेहद आसानी से समझ में आ सके।
पाठकों का स्तर
अखबार और वेब मीडिया के पाठक अलग-अलग होते हैं। इंटरनेट के पाठक आमतौर पर युवा हैं और वे आधुनिक विचारों के होते हैं। उनकी भाषा का स्तर अलग है। वे संस्कृतनिष्ठ हिंदी की जगह अंग्रेजी मिश्रित हिंदी बोलते और समझते हैं। यही कारण है कि आजकल ज्यादातर हिंदी वेबसाइटों में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होने लगा है जबकि हिंदी के मुख्य धारा के अखबार अभी तक इस तरह के प्रयोगों से बचे हैं। वैसे युवा पाठकों को लुभाने के लिए कुछ सांध्यकालीन एवं टैबलॉयड अखबारों ने भी अंग्रेजी शब्दों को प्रमुखता से छापना शुरू कर दिया है। दधीच का कहना है कि वेब मीडिया की भाषा को अपने जमाने के साथ तालमेल बिठाकर चलना पड़ता है। एक तरीके से कहें तो यहां हिंदी भाषा में हो रहे बदलावों का साफ असर दिखाई देता है।
कटाक्ष की भाषा
युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार भाषा को लेकर एक अन्य पहलू की ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि वेब मीडिया पर कटाक्ष की भाषा लिखी जा रही है। और यह लोगों को खूब भा भी रही है। कुमार कहते हैं कि दरअसल इंटरनेट की पहुंच आम आदमी तक होने से मीडिया में एक बड़ा बदलाव आया है। हाल के वर्षों में अचानक ढेरों वेबसाइटें शुरू हो गई हैं। मुख्य धारा की वेबसाइटों के अलावा सूचना और संप्रेषण के लिए ब्लॉग एवं सोशल नेटवर्किंग साइट ने भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। इन्हें भी वेब मीडिया से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

इनमें से ज्यादातर लोग व्यक्तिगत तौर पर वेबसाइट चला रहे हैं। कुमार के मुताबिक चूंकि वेबसाइटों की तादाद बहुत ज्यादा है और राजस्व के लिहाज से यह अभी उतना अहम नहीं हुआ है। ऐसे में लोगों का मुख्य उद्देश्य दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ष्टï करना है। इसके लिए वे कटाक्षपूर्ण और लोगों को आकर्षित करने वाली भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। वे बेबाक तरीके से अपने मन की बात लिखते हैं। खासकर सोशल मीडिया पर तो इसी तरह की भाषा का चलन बढ़ गया है। ऐसा देखा गया है कि इस तरह की कटाक्ष या व्यंग्य वाली भाषा को काफी पसंद भी किया जा रहा है।
निवेश की भाषा
विनीत कुमार की मानें तो अखबारों की भाषा निवेश की भाषा हो गई है। अखबारों में जो कुछ भी लिखते हैं, उसकी एक लागत होती है। इसका एक बिजऩेस मॉडल है, जो कहीं न कहीं भाषा को प्रभावित करता है।

कम शब्द बातें ज्यादा
अखबारों की तुलना में वेबसाइट पर जगह की दिक्कत नहीं है, लेकिन यहां लोगों के पास समय का अभाव है। लोग सरसरी निगाह से सबकुछ एक नजर में देख लेना चाहते हैं। जाहिर है भाषा ऐसी होनी चाहिए जो कम से कम शब्दों में ज्यादा से ज्यादा बातें कह दे। वाक्य छोटे हों मूल रूप से तथ्यात्मक बातें की जाए। दूसरी तरफ अखबार पढऩे के लिए लोगों के पास अपेक्षाकृत ज्यादा समय रहता है और वे आराम से सारी चीजें पढ़ सकते हैं।

तेजी से बढ़ रहा दायरा
हमारे देश में इंटरनेट की पहुंच तेजी से बढ़ रही है। इस समय करीब 75 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं और दिनोदिन यह संख्या बढ़ रही है। ऐसे में लोगों का झुकाव वेब मीडिया के प्रति बढ़ रहा है। कुल मिलाकर यह कहना ठीक होगा कि वेब मीडिया समय में आए बदलाव के साथ बदल रहा है।

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