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पुलिस अफसर का फूटा असंतोष
प्रेमल बालन /  September 06, 2013

गुजरात के निलंबित पुलिस उप महानिरीक्षक 59 वर्षीय दाह्याभाई वंजारा डी जी वंजारा नाम से जाने जाते हैं। उन्हें 'सुपरकॉपÓ और 'एनकाउंटर स्पेशलिस्टÓ भी कहा जाता है। इसी सप्प्ताह उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) से नरेंद्र मोदी पर यह आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया कि वह 'पाकिस्तान प्रेरित आतंकवादÓ के खिलाफ सरकार की नीति के तहत काम करने वाले पुलिस अधिकारियों को बचाने में नाकाम रहे। पत्र गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर बुनियादी सवाल खड़े करता है।

कानूनी दस्तावेज के तौर पर मुख्यमंत्री और उससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण गृह मंत्री के प्रति निराशा में लिखे गए वंजारा के पत्र की उपयोगिता देखना मुश्किल है। छह साल (इस दौरान बंबई उच्च न्यायालय ने जमानत पर फैसला सुरक्षित कर लिया था) से भी ज्यादा वक्त बीतने के बाद यह कहना मुश्किल है कि वंजारा को केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) द्वारा न्याय के लिए सरकारी गवाह बनाया जा सकता है।

दूसरी तरफ इस पत्र ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को यह संकेत दिया है कि वंजारा जैसे शख्स को उनके तथाकथित आकाओं ने धोखा दिया जबकि उन्होंने वही किया था जो उनके राजनीतिक आकाओं ने उनसे कहा। ऐसे में उन कार्यकर्ताओं का क्या होगा जो मोदी और शाह को अपने 'भगवानÓ के रूप में देखते हैं।  1980 में पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) के रूप में गुजरात पुलिस से जुडऩे वाले वंजारा फिलहाल आपराधिक साजिश और तीन फर्जी मुठभेड़ों के मामले में मिलीभगत के आरोप में जेल में हैं।

वंजारा और उनकी टीम के कई सदस्यों पर कथित तौर पर शोहराबुद्दीन शेख व उसकी पत्नी कौसर बी (2005), तुलसीराम प्रजापति (2006) और मुंबई की 19 वर्षीय मुस्लिम लड़की इशरत जहां और तीन अन्य (2004) को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने का आरोप है।

एक समय मोदी के करीबी समझे जाने वाले वंजारा ने 1 सितंबर को लिखे अपने इस्तीफे में कहा कि कथित फर्जी मुठभेड़ों में लिप्त पुलिस अधिकारियों ने सरकार की 'नीति को ही लागू किया।Ó

पत्र में वंजारा ने अपनी गिरफ्तारी के लिए शाह को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने अपने इस्तीफे में लिखा, 'मैंने लंबे समय से अपनी चुप्पी को सिर्फ इसलिए बरकरार रखा, क्योंकि मुझे श्री नरेंद्रभाई मोदी में सबसे ज्यादा भरोसा था, जिनकी मैं भगवान की तरह पूजा किया करता था। लेकिन मुझे यह कहते हुए दुख है कि अमितभाई शाह के प्रभाव में मेरा भगवान सामने नहीं आ सकता, जो उनके आंख और कान बने हुए हैं।Ó

2000 की शुरुआत से वंजारा चर्चा में आने लगे जब उन्हें और उनकी टीम को 'आतंकवादियोंÓ के खात्मे के लिए कई मुठभेड़ों को अंजाम देने का श्रेय दिया गया। वह उन पुलिस मुठभेड़ों की अगुआई कर रहे थे, जिनमें आधा दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए और संवाददाता सम्मेलन में इन लोगों को मोदी की हत्या की साजिश रचने वाला बताया गया। अलबत्ता वंजारा के करियर का पतन अप्रैल 2007 में शुरू हुआ जब उन्हें और दो अन्य आईपीएस अधिकारियों जिन्होंने उनके अधीन काम किया था, को फर्जी मुठभेड़ में शोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी कौसर बी को मारने के आरोप में 24 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया। यह कार्रवाई शोहराबुद्दीन के भाई की शिकायत के आधार पर राज्य अपराध जांच शाखा विभाग (सीआईडी) ने की थी। तब से ही वह जेल में हैं।

वंजारा की गिफ्तारी के बाद ऐसी शिकायतों की बाढ़ आ गई, जिनमें दावा किया गया कि वंजारा और उनकी टीम द्वारा किए गए एनकाउंटर फर्जी थे, उन्होंने निर्दोष लोगों की हत्याएं की थीं। गुजरात उच्च न्यायालय ने इस तरह की चार मुठभेड़ों की जांच सीबीआई को सौंपी। इनमें से तीन मामलों में वंजारा का नाम मुख्य आरोपी के रूप में सामने आया और उन पर आपराधिक साजिश व हत्या के आरोप लगाए गए।

इस बीच उनकी गिरफ्तारी के बाद कई अन्य मामलों पर भी सवालिया निशान लग गया। 2002 में अहमदाबाद के उस्मानपुरा में समीर खान को मारा गया था। 2003 में भावनगर के सादिक जमाल को मार दिया गया और उसके माता-पिता ने इसके फर्जी मुठभेड़ होने का आरोप लगाया था। सादिक जमाल के मामले की जांच सीबीआई कर रही है।

जेल में होने के बावजूद वंजारा का व्यवहार सुपरकॉप जैसा ही रहा है। वह हमेशा प्रेस की हुई पतलून, कमीज और साथ ही स्पोट्र्स शूज पहनकर आते हैं। वंजारा अदालत की पूरी कार्यवाही को ध्यान से सुना करते हैं।

निलंबित पुलिस अधिकारी के अपने समुदाय में चाहने वालों की बड़ी संख्या है, जो विमुक्त जनजाति में आते हैं। वंजारा उत्तरी गुजरात के साबरकांठा जिले के इलॉल गांव से ताल्लुक रखते हैं, जहां उनके खिलाफ तमाम आरोपों के बावजूद वह एक मशहूर हस्ती हैं। 2007-08 में अदालत में पेशी के दौरान नियमित तौर पर उनके समुदाय के लोग उनका उत्साह बढ़ाने और उनसे आशीर्वाद लेने आया करते थे।

वंजारा ने जेल में भी खुद को व्यस्त रखा और वहां की तमाम गतिविधियों में हिस्सा लेते रहे। दो साल पहले जेल परिसर में हुए श्रीमद् भागवद् सप्ताह (भागवद् गीता पाठ) में भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव की भूमिका भी निभाई।

वासुदेव की ऐतिहासिक कहानी की तरह कृष्ण को अपने मामा कंस से बचाने के लिए यमुना नदी पार करते हुए उन्होंने सिर पर एक टोकरी में छिपा कर लेकर गए थे। विचाराधीन कैदी के रूप में बिताए गए छह साल के दौरान उन्होंने अन्नामलाई विश्वविद्यालय की दूरस्थ शिक्षा इकाई से आध्यात्मिक शिक्षा में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा भी कर लिया।

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