बिजनेस स्टैंडर्ड - इन्फोसिस में फिर 'मूर्ति' स्थापना
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इन्फोसिस में फिर 'मूर्ति' स्थापना
इंदुलेखा अरविंद /  September 05, 2013

मुश्किलों से जूझ रही इन्फोसिस को उबारने के लिए एन आर नारायण मूर्ति एक बार फिर कंपनी में लौट आए हैं। इंदुलेखा अरविंद ने उनके पहली तिमाही के कार्यकाल का जायजा लिया...

एन आर नारायण मूर्ति बीती 9 अगस्त को अपराह्न में विश्लेषकों से मुलाकात के लिए इन्फोसिस के इलेक्ट्रॉनिक सिटी स्थित मुख्यालय में कॉरपोरेट ब्लॉक के कॉन्फ्रेंस रूम में दाखिल हुए। उस समय मूर्ति को 2006 में सीईओ के रूप में सेवानिवृत्ति के बाद कार्यकारी चेयरमैन के रूप में इन्फोसिस में दोबारा लौटे हुए दो महीने से कुछ ज्यादा वक्त ही हुआ था और 50 से ज्यादा फंड प्रबंधक उनकी बात सुनने के लिए वहां इकट्ठे हुए थे। कार्यकारी वाइस चेयरमैन 'कृषÓ गोपालकृष्णन जो उनके बिल्कुल दाएं बैठे हुए थे (सीईओ एस डी शिबुलाल अमेरिका में थे) के साथ ही कम से कम 10 शीर्ष अधिकारियों की मौजूदगी में मूर्ति ने अपराह्न में ठीक तीन बजे बोलना शुरू किया। अगले 90 मिनट तक उन्होंने कंपनियों की गलतियों पर खुलकर चर्चा की और इन्फोसिस को पटरी पर लाने के लिए रणनीति तैयार की। सत्र में मौजूद रहे एक फंड मैनेजर कहते हैं, 'माहौल काफी सकारात्मक था। वास्तव में वह समस्याओं के बारे में जानते थे और उन्होंने सभी सवालों के जवाब दिए।Ó बैठक में शामिल रहे एक अन्य विश्लेषक ने कहा कि चुनौतियों से पार पाने के लिए उनके पास स्पष्ट योजना थी और इस काम के लिए उन्होंने खुद को 36 महीनों का वक्त दिया है।

उनका नया कार्यकाल 2018 में खत्म हो जाएगा और उन्होंने खुद को इससे दो साल पहले तक का वक्त दिया है। लेकिन 67 वर्षीय मूर्ति ने उस दिन कहा, 'मैं जल्दी में रहने वाला बुजुर्ग हूं।Ó तीन महीने पहले 1 जून को मूर्ति के दोबारा कंपनी से जुडऩे की हकीकत गले नहीं उतरती  है। वह 1981 में इन्फोसिस की स्थापना के वक्त सह संस्थापक के रूप में जुड़े थे।

उनके करीबी सूत्रों के मुताबिक इन दिनों मूर्ति सुबह 6.40 बजे दफ्तर आ रहे हैं और रात 9 बजे तक रुककर यह जानने के लिए फाइलों और डाटा-शीट को खंगालते रहते हैं कि क्या गलत हुआ। वह उसी तरह दफ्तर में आते हैं और बैठते हैं, जैसा पिछली बार कार्यकारी की भूमिका में आया करते थे। अपनी दूसरी पारी में मूर्ति उन मुद्दों जिनसे इन दिनों कंपनी जूझ रही है और जिनके कारण कंपनी इस प्रतिस्पर्धी बाजार में प्रतिद्वंद्वी कंपनियों से पिछड़ रही है, के समाधान में मदद के लिए अपने साथ सहायक कार्यकारी के रूप में बेटे रोहन मूर्ति को भी लेकर आए हैं।

एक समय कंपनी अपने प्रदर्शन के अनुमान लेकर गर्व महसूस किया करती थी, लेकिन छह तिमाहियों में से पांच में लक्ष्य से पिछडऩे के कारण कंपनी ने जून 2012 से आमदनी के तिमाही अनुमानों को जारी करना बंद कर दिया है। मई में एक अनुसंधान कंपनी गार्टनर ने अपनी एक रिपोर्ट में पुष्टि की कि आमदनी के मामले में उसकी नई-नई प्रतिद्वंद्वी कॉग्निजेंट ने इन्फोसिस को पछाड़ते हुए भारत के आईटी सेवा बाजार की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी बन गई  है।

मूर्ति को यह बताने की जरूरत नहीं है कि इन्फोसिस की सबसे बड़ी चुनौती उसके हतोत्साहित कर्मचारी हैं। इस साल जून तिमाही में इन्फोसिस की पलायन दर बढ़कर 16.9 फीसदी हो गई, जबकि एक साल पहले समान तिमाही के दौरान यह आंकड़ा 14.9 फीसदी था। इसी अवधि में उसकी प्रतिद्वंद्वी टीसीएस की पलायन दर उसके सर्वकालिक न्यूनतम स्तर पर 10.5 फीसदी पर थी, जबकि विप्रो की पलायन दर 13.2 फीसदी पर आ गई थी जो एक साल पहले की समान अवधि में 15.6 फीसदी थी।

उनके मनोबल को बढ़ाने के लिए मूर्ति ने पहले दिन ही ईमेल पर अपने 1,50,000 कर्मचारियों से संपर्क किया। उन्होंने लिखा, 'हमें बहुत कुछ करना है। यह आज की जरूरत है।Ó दो सप्ताह से भी कम समय बाद उन्होंने 'टाउन हॉलÓ में एक बैठक का आयोजन किया, जहां उन्होंने कहा, 'इन्फोसिस दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ रही है, पहली प्रतिस्पर्धा और दूूसरी अपने कर्मचारियों के साथ। हम एक बार में एक लड़ाई लड़ सकते हैं और यह अपने कर्मचारियों के साथ नहीं होनी चाहिए।Ó सभा स्थल जिसमें एक बार में 4,000 लोग आ सकते हैं, सत्र शुरू होने से पहले ही भर गया था। बाहर खड़े बाकी लोग अंदर आने के लिए चिल्ला रहे थे, यह दृश्य धमाकेदार संगीत कार्यक्रम से अलग नहीं था, और आखिरकार उन्हें कैंपस के अन्य सभागारों में ले जाया गया, जहां सभा का वेबकास्ट से सीधे प्रसारण किया जा रहा था।

वहां मौजूद रहे इन्फोसिस के कर्मचारियों के मुताबिक टाउन हॉल में उठ रहे सभी मुद्दों पर वे बेबाकी से जवाब दे रहे थे। एक था 'ड्रेस कोडÓ जिसे उन्होंने कई साल पहले पेश किया था, जिसके तहत कर्मचारियों के लिए सप्ताह में तीन दिन टाई पहनना जरूरी था या हर बार नियम तोडऩे पर 200 रुपये का जुर्माना निर्धारित किया गया था। बाहरी लोगों को यह अटपटा लग सकता है, लेकिन हमेशा कंपनी में रहने वाले कर्मचारियों के लिए यह परेशान करने वाला नियम था। इन्फोसिस में मध्यम स्तर के एक कर्मचारी जिन्हें लगता है कि मूर्ति का संदेश आसानी से समझ में आने वाला था, ने कहा, 'उन्होंने बताया कि एक बार वह अमेरिका में एक ग्राहक के साथ बैठक कर रहे थे, जहां यह देखा गया कि उनके (वहां पर तैनात) कर्मचारी अन्य की तुलना में साधारण परिधान पहना करते थे। तब उन्हें महसूस हुुआ कि कर्मचारियों को पेशेवर की तरह कपड़े पहनने चाहिए और मैं ऐसा ही करना चाहता हूं।Ó

बेंगलूर के बाद मूर्ति ने इन्फोसिस के हैदराबाद और चंडीगढ़ के कैंपसों का दौरा किया, जहां उन्होंने उसी तरह टाउन हॉल में कर्मचारियों को संबोधित किया। उन्होंने बेंगलूर मुख्यालय के एक फूड कोर्ट में 'खुली बैठकÓ भी की, जहां कोई भी आ सकता था और उनसे सवाल पूछ सकता था। दूसरे फूड कोर्टों की बड़ी स्क्रीनों पर भी इस खुली बैठक का प्रसारण किया गया।

मूर्ति जानते थे कि वे लोग उन्हें क्या लौटा सकते हैं। इसलिए समय बरबाद किए बगैर उन्होंने कंपनी में वेतन बढ़ोतरी और भत्तों के पुनर्गठन की घोषणा की। बेंगलूर के टाउन हॉल में हुई सभा का हिस्सा रहे इन्फोसिस के मध्यम स्तर के कर्मचारी ने कहा, 'निश्चित रूप से परिसर में ज्यादा सकारात्मक माहौल बन गया है। मैं खुद ज्यादा सुरक्षित महसूस करता हूं, क्योंकि मुझे अब अच्छा महसूस हो रहा है।Ó
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जो लोग मूर्ति को जानते हैं वे कहते हैं कि वह एक सशक्त वक्ता, एक अच्छे प्रेरक और इन सबसे आगे एक शानदार सेल्समैन हैं। शायह यही वजह है कि वह अमेरिका में खासा वक्त बिता रहे हैं जहां से कंपनी को 60 फीसदी आमदनी होती है, प्रमुख ग्राहकों से मिल रहे हैं और बिक्री व विपणन के कौशल का वहां खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। मूर्ति के साथ रहकर काम कर चुके एक पूर्व कार्यकारी कहते हैं, 'वह ग्राहकों को भरोसा दिलाने में कामयाब होंगे। साथ ही एक रणनीति साझेदार के रूप में इन्फोसिस की बिक्री की संभावनाओं को भी बढ़ाएंगे।Ó एक शीर्ष कार्यकारी के मुताबिक उन्होंने कंपनी कैंपस में कुछ बड़े ग्राहकों से भी मुलाकात की। मूर्ति ने इस रिपोर्ट के लिए साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया।

मूर्ति की दोबारा आमद आला स्तर पर कुछ फेरबदल की वजह बनी है। जब से उन्होंने कार्यभार संभाला है तीन बड़े इस्तीफे हो चुके हैं, हाल में बुधवार को प्रमुख (वैश्विक विनिर्माण और अमेरिका), बोर्ड सदस्य और 2015 में होने वाली शिबुलाल की सेवानिवृत्ति के चलते सीईओ पद के एक तगड़े दावेदार अशोक विमूरी ने इस्तीफा दे दिया।
वैश्विक बिक्री प्रमुख बासव प्रधान ने मूर्ति के ज्वाइन करने के एक महीने बाद इस्तीफा दे दिया, वहीं वित्तीय सेवा प्रमुख (अमेरिका) सुधीर चक्रवर्ती ने भी इसी महीने की शुरुआत में इस्तीफा दे दिया।

ऊपर उल्लिखित एक अधिकारी कहते हैं कि मूर्ति ने लागत घटाने और बिक्री में सुधार की रणनीति पर अमल करने के लिए पहले ही नई टीम की पहचान कर ली थी, फिलहाल वह इसी पर काम कर रहे हैं। घटनाक्रम से जुड़े एक अन्य सूत्र ने कहा, 'फिलहाल उनका सबसे ज्यादा ध्यान बिक्री टीम को पटरी पर लाना है और वह उसको ज्यादा जिम्मेदार बनाने की कोशिश कर रहे हैं।Ó इसका मतलब बिक्री टीम कई लोगों को हटाने से है। वह कहते हैं, 'इन्फोसिस की हर इकाई के लिए अलग बिक्री टीम है जो संबंधित इकाई के प्रमुखों को रिपोर्ट करती हैं। सभी इकाइयों में निचले स्तर पर भी कटौती की गई है।Ó ऐसी भी खबरें हैं कि प्रधान के अधीन तैयार की गई टीम को खत्म कर दिया गया है, हालांकि कंपनी ने इस मसले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

अगले कदम के रूप में रणनीतिक वैश्विक सोर्सिंग टीम को भी खत्म किया जा सकता है, जिसका बिक्री टीम के साथ फिर से टकराव हुआ और इसके अधिकांश सदस्य बाहरी थे। अधिकारी कहते हैं, 'वह विदेश में लगने वाली अनावश्यक लागत में कटौती करना चाहते हैं। मूर्ति एक कड़ा संदेश देने की भी कोशिश कर रहे हैं कि यदि आला अधिकारी योगदान नहीं कर रहे हैं तो उनके कंपनी में काम करने के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है।Ó

रणनीतिक और सुधार के लिए उन्हें मदद करने के वास्ते मूर्ति ने चेयरमैन का कार्यालय भी तैयार किया है, जिसमें रोहन मूर्ति भी एक सदस्य के रूप में होंगे। उनकी ए-टीम के अन्य लोगों में रंगनाथ डी माविनाकेरे, बिनोद रंगाडोरे और नित्यानंदन राधाकृष्णन को कार्यकारी परिषद में सदस्य के तौर पर नियुक्त किया गया है। जुलाई तक कंपनी के मुख्य जोखिम अधिकारी माविनाकेरे अब लागत अनुकूलन इकाई की अगुआई कर रहे हैं, जो मूर्ति की प्राथमिकता वाला एक अन्य क्षेत्र है। रंगाडोरे एक नई वैश्विक डिलिवरी मॉडल इकाई की अगुआई करेंगे, जबकि राधाकृष्णन वरिष्ठ उपाध्यक्ष के रूप में सेवाएं देंगे।
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जब इन्फोसिस ने मूर्ति की बोर्ड के आमंत्रण पर कार्यकारी चेयरमैन के रूप में कंपनी में वापसी की घोषणा की गई थी तो कई ने इस पहल की आलोचना की थी। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर थी कि मूर्ति जिनका हमेशा ही सेवानिवृत्ति की उम्र पर जोर रहा था और ऐसी स्थिति में संस्थापक सदस्यों को कंपनी में शामिल होने को मंजूरी नहीं दी थी, ने अपनी ही बातों को पलट दिया था। लेकिन ऐसा लगता है कि इन आलोचनाओं से निवेशक व्यथित नहीं हुए, क्योंकि उनके 1 जून में कार्यभार संभालते ही इन्फोसिस का शेयर 20 फीसदी तक चढ़ गई। ब्रोकिंग कंपनी सीएलएसए ने अपनी रिपोर्ट में यह तक कहा कि अगर मूर्ति कंपनी को वर्तमान चुनौतियों से उबारने मं कामयाब रहते हैं तो अगले तीन साल में निवेशकों की रकम लगभग दोगुनी हो सकती है।

भले ही मूर्ति की वापसी से ही शेयर की कीमतों में इतना उछाल हकीकत से परे लगता है, लेकिन इन्फोसिस के शेयरधारकों ने 3 अगस्त को हुई असाधारण आम बैठक में मूर्ति की वापसी को अपना खूब समर्थन दिया। लगभग 200 शेयरधारक बेंगलूर के कोरामंगला में क्राइस्ट कॉलेज में 15 मिनट के लिए इकट्ठा हुए। माहौल काफी हद तक उत्सव जैसा उत्साहजक था। 74 वर्षीय एक सेवानिवृत्त इंजीनियर राधाकृष्ण राव ने कहा, 'वह (मूर्ति) कंपनी का सम्मान वापस लौटाने और शेयरधारकों की सुरक्षा के लिए लौट आए हैं।Ó हुबली से आए एक अधिवक्ता विनायक शिरालकर ने कहा, 'जब एक शख्स सक्षम है और उसके पास तजुर्बा है तो उम्र कोई बाधा नहीं होती है।Ó स्पष्ट रूप से मूर्ति इस आकर्षण को जानते हैं।

इन्फोसिस मूर्ति के संवाद कौशल का इस्तेमाल कर सकती है, जिस बिंदु पर सीईओ शिबुलाल को कमजोर समझा जाता है। बार्कलेज निवेशक सम्मेलन में मौजूद रहे कार्यकारियों में से एक का कहना है, 'उन्होंने कहा कि आगे बढ़ो, बुरी खबरें लिफ्ट की तरह आती हैं और अच्छी खबरों के लिए सीढिय़ों से जाना होता है।Ó इन्फोसिस के एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि न तो शिबुलाल और न ही गोपालकृष्णन का सार्वजनिक संपर्क इतना अच्छा है और 'इसीलिए उनकी आलोचना होती थी, जो पूरी तरह से उनके प्रति निष्पक्ष नहीं थे।Ó

इसके बावजूद मूर्ति को कंपनी का सुनहरा दौर वापस लाने के लिए अभी तक तमाम चुनौतियों से पार पाना बाकी है। सलाहकार कंपनी ऑफशोर इनसाइट्स के संस्थापक और सीईओ सुदीन आप्टे कहते हैं, 'ग्राहकों के लिए इन्फोसिस के साथ काम करना मुश्किल हो गया है। यह ऊंची बिलिंग दरें हीं नहीं हैं, बल्कि उन्हें काम करने में भी ज्यादा वक्त लगता है और अनुबंध शर्तों के मामले में इन्फोसिस अन्य कंपनियों की तुलना में कम लचीली है।Ó इसके साथ ही आप्टे कहते हैं कि कंपनी की ये नीतियां मूर्ति के अधीन ही बनाई गई थीं और उनके उत्तराधिकारियों को उन्हीं पर अमल करना था, इसलिए बिल्कुल अलग बाजार में बदलाव के लिए उनकी नियुक्ति वाजिब है।

तमाम खामियों के अलावा मूर्ति खुद बड़े आउटसोर्सिंग अनुबंधों, परिचालन लागत में बढ़ोतरी और कर्मचारियों के मनोबल से संबंधित चुनौतियों पर बात कर चुके हैं। अपने बेटे की उपाध्यक्ष पद पर ताजपोशी की खबरों को लेकर पिछली कुछ तिमाहियों से आलोचनाओं का सामना करने के साथ ही मूर्ति के लिए अब काफी कुछ दांव पर लगा है, ऐसा पहले कभी नहीं था। जैसा इन्फोसिस के पूर्व सीएफओ मोहनदास पई ने मूर्ति की वापसी (पई ने इस रिपोर्ट के लिए टिप्पणी से इनकार कर दिया) के बाद बिज़नेस स्टैंडर्ड में लिखा था, 'यदि मूर्ति इसको (इन्फोसिस) को पटरी पर ले आते हैं, नए नेतृत्व से काम कराने में कामयाब रहते हैं और फिर तीन साल तक अपने बेटे रोहन के साथ काम करने के बाद हट जाते हैं तो उनका यह कदम आने वाले कई साल तक हमें गौरवान्वित करेगा।Ó सवाल यह है कि क्या वह ऐसा कर सकते हैं?

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