बिजनेस स्टैंडर्ड - विदेशी निवेशक आखिर क्यों बन गए हैं बिकवाल
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विदेशी निवेशक आखिर क्यों बन गए हैं बिकवाल
आकाश प्रकाश /  August 30, 2013

तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की ओर विदेशी संस्थागत निवेशकों का ध्यान अभी भी है, लेकिन कुछ निवेशक अब नाउम्मीद होकर भारत से जाने लगे हैं। क्या किए जाएं उपाय, बता रहे हैं आकाश प्रकाश

विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली साफ तौर पर बढ़ गई है। पिछले तीन महीनों में हमारे शेयर बाजारों से विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 4 अरब डॉलर निकाले हैं। बीते दो दिनों के भीतर ही वैश्विक निवेशकों ने शेयर बाजारों में 40 करोड़ डॉलर से भी अधिक की बिकवाली की है। सिर्फ हेज फंडों ने शेयरों में शार्ट सेलिंग या ईटीएफ आधारित बिकवाली नहीं की है। हम देख रहे हैं कि बड़े और लंबी अवधि के निवेशकों ने भी भारत में अपनी हिस्सेदारी की बिक्री की है। एचडीएफसी बैंक और एचडीएफसी, आईटीसी और सन फार्मा जैसे शेयरों की कीमतों में आई गिरावट से यह बात साफ हो चुकी है कि लंबी अवधि के निवेशक भी बिकवाल बन गए हैं।

आखिर क्यों विदेशी निवेशक भारत का मोह त्याग रहे हैं? वे इस समय क्यों निकासी का रुख कर रहे हैं जब इस साल के लिए डॉलर की कीमतों के मुकाबले बाजार में 30 फीसदी से भी अधिक की गिरावट आ चुकी है। इसलिए नहीं कि यह ऐसी उडऩछू पूंजी है जो खतरे का पहला संकेत मिलते ही बाहर निकलने के लिए फडफ़ड़ाने लगती है। ऐसा लगता है कि निवेशकों ने अब भारत से अपनी पूंजी बाहर निकालने का इरादा कर लिया है क्योंकि वे भारत में उतार-चढ़ाव झेलनेे में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। निवेशकों को भय है कि संकट बढ़ रहा है और नीति निर्माता इससे नहीं निपट पा रहे।

सबसे पहले तो रुपये के लिहाज से राजकोषीय घाटे को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। भारत के कच्चे तेल की बास्केट (आयात) इस समय सर्वोच्च स्तर पर है। यह बात गले नहीं उतर रही कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम किसी भी सूरत में राजकोषीय घाटे को 4.8 फीसदी के स्तर तक सीमित रख पाएंगे। तेल एवं उर्वरक पर सब्सिडी का खर्च बढ़़ चुका है।

अर्थव्यवस्था की मंदी के चलते राजस्व प्राप्ति के लक्ष्य भी हकीकत से दूर ही नजर आ रहे हैं। कर से प्राप्त होने वाले राजस्व की बढ़त दर पहले ही इकाई अंक में रह गई है। विनिवेश और स्पेक्ट्रम की बिक्री से होने वाले राजस्व पर दूर-दूर तक कोई चर्चा नहीं हो रही है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा विधेयक सरकार के खजाने पर अतिरिक्त बोझ ही बढ़ाएगा। लेकिन इन सबके बावजूद रेटिंग कम किए जाने के खतरे से बचने के लिए वित्त मंत्री को राजकोषीय लक्ष्य पूरे करने ही होंगे। रेटिंग डाउनग्रेडिंग एक ऐसी मुसीबत है जिसके बारे में कोई भूलकर भी सोचना नहीं चाहेगा।

उनके पास घाटे के इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए एकमात्र रास्ता यही बचा है कि वे एक बार फिर से सभी तरह के योजनागत खर्चों में कटौती कर दें, जैसा उन्होंने 2012-13 में किया था। पर अगर उन्होंने योजना खर्च में कटौती की तो वे कैसे निवेश को बढ़ावा दे पाएंगे। निश्चित ही देश में नया निवेश करने के लिए निजी क्षेत्र न तो इच्छुक है और न ही उसका भरोसा है। ऐसे में निवेश चक्र की शुरुआत केवल सरकार ही कर सकती है।

अगर हम योजना खर्च घटाते हैं तो इससे निवेश को बढ़ावा मिलने से रहा। विकास का यह असंतुलन (निवेश की कीमत पर खपत) बरकरार रहेगा और निश्चित ही इसकी यह सीमा है कि कब तक यह असंतुलन जारी रहेगा। भारत का संकट मांग पक्ष की समस्या से ज्यादा आपूर्ति पक्ष से जुड़ा है और योजना खर्च में भारी कटौती से आपूर्ति पक्ष के मसलों का कोई उपचार नहीं होगा। बिना सार्वजनिक क्षेत्र की मदद के हम 5 फीसदी विकास दर के आंकड़े पर ही अटके रहेंगे।

निवेशकों की दूसरी ङ्क्षचता बढ़ती महंगाई है। ईंधन सब्सिडी में कटौती की कोई भी कोशिश महंगाई को हवा देगी। हमने डीजल की कीमतें वैश्विक स्तर पर लाने की पहल की है और आयातित कोयले की बढ़ती कीमतें भी बोझ बनती जा रही हैं। भगवान न करे अगर चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार शुरू हो गया और जिंस की कीमतें बढऩे लगीं तो मुश्किलों में इजाफा हो सकता है। आयातित चीजों की कीमतों से जुड़ी महंगाई एक बड़ा मसला है और इससे केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरें घटाने की कोई गुंजाइश बाकी नहीं रह जाती है। तो फिर दरों में बिना कटौती के अर्थव्यवस्था कैसे आगे बढ़ पाएगी?

बैंकिंग तंत्र खुद एक बड़ी समस्या है। पिछले तीन हफ्तों में वित्तीय कंपनियों के शेयरों की खासी पिटाई हुई है। किसी भी बैंक को यह उम्मीद नहीं थी कि रुपये की गिरावट थामने के लिए रिजर्व बैंक लघु अवधि की तरलता पर सख्ती का चाबुक चलाएगा और ब्याज दरों में बढ़ोतरी का चक्र शुरू हो जाएगा। नतीजा यह है बैंकिंग प्रणाली के पास मौजूद सरकारी प्रतिभूतियों पर कम से कम 40,000 करोड़ रुपये का मार्क-टू-मार्केट नुकसान हो चुका है। इसके अलावा कंपनियों के बॉन्ड पोर्टफोलियो को भी खासा नुकसान पहुंचा है। परिसंपत्तियों की गुणवत्ता लगातार गिर रही है और रुपया जिस तरह 70 की दहलीज के पास पहुंच गया है उससे कुछेक बड़ी कंपनियों को छोड़ दें तो ज्यादातर को बिना सुरक्षा वाले विदेशी मुद्रा का कर्ज भारी पड़ रहा है।

रिजर्व बैंक ने कुछ छूट दी है पर उसे बैंकों को यह राहत और देनी पड़ेगी कि वे मार्क-टू-मार्केट बॉन्ड के भारी भरकम घाटे को न दिखाएं। यह उम्मीद भी की जा सकती है कि फंसे हुए कर्जों के पुनर्गठन के मामले में रिजर्व बैंक नरम रवैया अपनाएगा। बैंकों का शुद्घ ब्याज मार्जिन भी दबाव में है क्योंकि थोक रकम की लागत 10.5 से 11 फीसदी तक पहुंच गई है। कर्ज की बढ़त 12 से 13 फीसदी पर बहुत अच्छी है। लेकिन निवेशकों की नजर में सरकार की विश्वसनीयता घटी है। वित्त मंत्री अकेले अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार में मौजूद दूसरे लोगों को इस बात की कोई चिंता भी नहीं है।

यह अजीब बात है कि देश की किसी भी सरकारी उपक्रम ने अभी तक पूंजी बाजारों के दोहन की कोशिश नहीं की। हम किस चीज के इंतजार में हैं? अगर रुपया गिरता ही रहा तो भारतीय मुद्रा के लिए बाजार के दरवाजे बंद हो जाएंगे। हम बोर्ड बैठकों के लिए हफ्तों इंतजार नहीं कर सकते। इनमें सरकार बहुमत की मालिक है और उसे कदम उठाने चाहिए। हम अदला-बदली प्रणाली, प्रवासी भारतीयों के लिए बॉन्ड और आईएमएफ से मदद जैसे कदम में देरी क्यों कर रहे हैं? रुपये को कम अवधि में स्थिर बनाने के लिए हमें विश्वास बहाली और इन सब कदमों की जरूरत है।

पूंजी बाजारों के दरवाजे भारत के लिए अभी भी खुले हुए हैं। राजनीति की बात करें तो यह अजीब बात है कि संसद के मॉनसून अधिवेशन में अभी तक महज खाद्य सुरक्षा विधेयक पर ही बात बनी है। राजनीतिक दल जीएसटी, कोयला ब्लॉकों की नीलामी, पेंशन और बीमा सुधारों, पर्यावरण संबंधी मामलों या विदेयाी निवेश, न्यायिक, पुलिस और प्रशासन सुधार पर भले ही एकमत न हों लेकिन खाद्य सुरक्षा विधेयक पर वे एक साथ हैं। भाजपा और नरेंद्र मोदी इसे सबके लिए लागू करने और गरीबों को 35 किलो अनाज देना चाहते हैं। निवेशक राजनेताओं की प्राथमिकता और किसी भी कीमत पर लोकप्रिय बनने की इच्छा पर सवाल उठा रहे हैं। 

ऐसे में निवेशकों की उम्मीदें टूटने लगी हैं और सिर्फ कारोबारी ही नहीं बल्कि लंबी अवधि के निवेशक भी जाने लगे हैं। धीमा विकास, बढ़ती महंगाई और भारी घाटा, ऐसा लगता है कि रुपये की मुसीबतों का अंत नहीं है। हमको पश्चिम में फिर किसी संकट की उम्मीद करनी चाहिए ताकि हमें थोड़ी राहत मिल जाए।

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