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'किसानों के साथ नाइंसाफी रोकना है मकसद'
श्रीलता मेनन /  August 29, 2013

भूमि अधिग्रहण विधेयक पर ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने श्रीलता मेनन को बताया कि विधेयक अधिग्रहण में तेजी लाने पर नहीं, बल्कि यह पूरी प्रक्रिया के दौरान होने वाले किसी भी तरह के अन्याय को रोकने पर केंद्रित है। मुख्य अंश : 

निजी और पीपीपी परियोजनाओं के लिए क्यों सरकार को भूमि अधिग्रहण करना चाहिए? राज्य अक्सर जमीन गंवाने वालों के समर्थन में रहने के बजाय उनके खिलाफ नजर आते हैं। ऐसा क्यों?
बड़ी कंपनियों और किसानों के बीच मोलभाव की क्षमता में भारी असमानता और अन्य समूहों का दखल बढऩे से अन्यायपूर्ण समझौतों की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। अनुबंध उस पार्टी के पक्ष में होते हैं, जो मोलभाव के दौरान मजबूत स्थिति में होती है। इसीलिए संबंधों में इस असंतुलन को पाटने की जरूरत है। विभिन्न समूहों के निहित स्वार्थों को कमजोर करने के लिए खुद (सड़क, स्कूल और अस्पताल जैसे सार्वजनिक निर्माण के लिए) राज्य को भी एक कानून बनाने की जरूरत है।

क्या विधेयक उद्योग की जमीन के त्वरित अधिग्रहण की जरूरत के बजाय मुआवजे पर केंद्रित है?
पुराने कानून का मुख्य उद्देश्य तेज अधिग्रहण था। लेकिन नए विधेयक से व्यापक ऐतिहासिक अन्याय की समस्या के निपटारे पर संप्रग सरकार के दृढ़ संकल्प का पता चलता है। इसीलिए  सख्त कानून बनाया जा रहा है।

ऐसी आशंका हैं कि मुआवजे में बाजार मूल्य नहीं दिया जाएगा?
अलग-अलग सर्किल दरों को देखते हुए विधेयक में ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार मूल्य की तुलना में चार गुने और शहरी क्षेत्रों के लिए दोगुने मुआवजे का प्रस्ताव किया गया है।

पिछली तारीख वाला प्रावधान कैसे लागू किया जाएगा?

ऐतिहासिक अन्याय के निपटारे के लिए विधेयक में उन मामलों को पिछली तारीख से लागू करने का प्रावधान है, जहां अधिग्रहीत जमीन का आवंटन नहीं हुआ है। ऐसे मामलों में जहां अधिग्रहण पांच साल पहले हुआ था, लेकिन कोई मुआवजा नहीं दिया गया है या कब्जा नहीं लिया गया है तो भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया इस कानून के प्रावधानों के तहत नए सिरे से शुरू की जाएगी।

क्या विधेयक से भविष्य में किसानों के साथ विवादों में कमी आएगी?
इसमें पुरानी तारीख से लागू करने का प्रावधान है। किसानों के समर्थन में एक अन्य धारा है कि पीपीपी परियोजनाओं और निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण पर जहां सरकार काम कर रही हो, वहीं जमीन गंवाने वालों की 70 से 80 फीसदी सहमति जरूरी है। इस सहमति में मिलने वाले मुआवजे पर सहमति भी शामिल होगी। अगर सरकार फैसला करे तो वह जमीन मूल खरीदारों को लौटाई जा सकती है, जिसका इस्तेमाल नहींं किया जा सका हो। अगर किसान की जमीन का शहरीकरण के लिए अधिग्रहण किया जा रहा है, तो उसकी 20 फीसदी विकसित जमीन आरक्षित रखी जाएगी और किसानों को उनसे ली गई जमीन के अनुपात में अधिग्रहण मूल्य के बराबर कीमत में जमीन लेने पेशकश की जाएगी। सिंचाई या बिजली परियोजनाओं के मामले में प्रभावित परिवारों को जलाशयों में मछली पालन का अधिकार दिया जा सकता है।

पुनर्वास और पुनस्र्थापन के  लाभ?
इस अधिनियम के अंतर्गत लाभ के योग्य होने के लिए  निर्भरता (खरीदी गई जमीन पर) की अवधि 5 साल से घटाकर तीन साल कर दी गई है। इसमें हर उस प्रभावित परिवार को एक मकान उपलब्ध कराया जाता है, जो विस्थापित होता है। यदि वे मकान नहीं लेने का विकल्प चुनते हैं तो उन्हें एकमुश्त वित्तीय सहायता दी जाती है। सभी प्रभावित परिवारों को सालाना रकम या नौकरी का विकल्प दिया गया है। यदि रोजगार उपलब्ध नहीं है तो वे प्रति परिवार 5 लाख रुपये के एकमुश्त अनुदान के पात्र हैं। वैकल्पिक तौर पर उन्हें प्रति परिवार हर महीने 2,000 रुपये का सालाना आधार पर 20 साल तक भुगतान किया जाएगा, जिसे महंगाई दर के साथ जोड़ा गया है। एक साल के लिए मासिक 3,000 रुपये के बराबर भत्ता मिलेगा। उन्हें कौशल विकास के अलावा 50,000 रुपये का परिवहन भत्ता, 50,000 रुपये का पुनस्र्थापन भत्ता और 25,000 रुपये की एकमुश्त सहायता दी जाएगी।

आर ऐंड आर पात्रता के प्रावधान की समय सीमा क्या है?
ढांचागत पात्रताओं से संबंंधित पुनर्वास और पुनस्र्थापन पैकेज आवंटन के 18 महीनों के भीतर दिया जाएगा।

अनुसूचित क्षेत्रों में अधिग्रहण के बारे में क्या कहना है?
ऐसा आखिरी उपाय के रूप में किया जाएगा। यह स्थानीय संस्थानों की स्वीकृति/सहमति के साथ होगा। प्रभावित जनजातीय परिवारों को प्राथमिकता के आधार पर समान अनुसूचित क्षेत्रों में बसाया जाएगा। उनके जिले से विस्थापित होने के मामले में उन्हें ज्यादा जमीन और ज्यादा मुआवजा दिया जाएगा। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मामले में शुरू में एक तिहाई मुआवजे का भुगतान किया जाना है।

क्या यह सही है कि विधेयक में सब कुछ राज्यों पर छोड़ दिया गया है?
विधेयक सिर्फ मुआवजे की न्यूनतम सीमा बताता है और ऐसे पैमाना तैयार किया गया है जो राज्यों को शहरी केंद्रों से दूरी के आधार पर गुणक (जो अंतिम आवंटन तय करेगा) तय करने की अनुमति देता है। जहां बिना इस्तेमाल वाली जमीन लौटानी है, वहां राज्य मूल मालिक को लौटाने या उसे भूमि बैंक में देने पर फैसला कर सकता है।

क्या मुआवजे से शहरी क्षेत्रों में अधिग्रहण हतोत्साहित नहीं होगा?
शहरी क्षेत्रों में कोई गुणक नहीं है। इसका मतलब है कि बाजार मूल्य में कोई वृद्धि नहीं होती है। हालांकि 100 फीसदी क्षतिपूर्ति बाजार मूल्य के आधार पर निकाली गई है। 'क्षतिपूर्तिÓ की यह रकम जबरन अधिग्रहण का दर्द बढ़ाती है।

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