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बीमारी से निजात के लिए जरूरी है वैश्विक भागीदारी
खेती-बाड़ी
सुरिंदर सूद /  August 27, 2013

गेहूं की पैदावार में क्या जड़ता आ गई है? इस सवाल का जवाब सीधे हां या ना में देना वाकई बहुत ही मुश्किल है। गेहंू वैज्ञानिक नियमित रूप से नई और बेहतर गुणवत्ता वाली विभिन्न प्रजाति

गेहूं उत्पादन में नाटकीय तेजी तब आई जब 1960 की शुरुआत में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नॉर्मल ई बोरलॉग ने उच्च उत्पादकता वाले गेहूं की छोटी प्रजाति की मदद ली और अब तक दोबारा इसे दोहराया नहीं जा सका है। पौधों की लंबाई कम करके और उत्पादकता बढ़ाने वाली इस प्रजाति को डॉ. बोरलॉग ने खोजा था। बीते सालों में इस प्रजाति की तलाश कर पाना बहुत ही मुश्किल हो गया है।

हालांकि गेहूं वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी है। उन्होंने गेहूं की उस स्तर की या फिर से उससे भी बेहतर उत्पादकता हासिल करने के लिए दूसरे तरीकों पर विचार करना शुरू कर दिया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके लिए गेहूं के पौधे की फोटोसिंथेटिक क्षमता को बढ़ाना होगा। फोटोसिंथेटिक क्षमता बढऩे से सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करने की पौधे की क्षमता में इजाफा होगा जिसकी मदद से पौधा पहले से बड़े और अधिक संख्या में अनाज के दाने पैदा कर सकेगा।

मैक्सिको स्थित इंटरनैशनल मेज ऐंड व्हीट रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआईएमएमवाईटी) वही संस्थान है जहां करीब पचास साल पहले बोरलॉग को अपनी नायाब खोज को अंजाम देने में मदद मिली थी। यह संस्थान फिलहाल उत्पादकता बढ़ाने के लिए इसी सिद्घांत पर काम कर रहा है। इस संस्थान के महानिदेशक थॉमस ए लंपकिन इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि उनकी रणनीति गेहूं की उत्पादकता करीब 50 फीसदी तक बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है।

वह कहते हैं, 'लेकिन काम काफी बड़ा है क्योंकि गेहूं के पौधों पर फिर से काम करना होगा और उसमें सुधार करना होगा ताकि वह फोटोसिंथेटिक क्षमता के साथ तालमेल बिठा सके। अधिक उत्पादन के लिए अधिक ऊर्जा की जरूरत होगी जिसके लिए फोटोसिंथेटिक क्षमता का बढऩा आवश्यक है।Ó यह किसी कार को बेहतर क्षमता के इंजन के मुताबिक फिर से डिजाइन करने जैसी ही प्रक्रिया है। मैक्सिको स्थित यह संस्थान इस परियोजना से संबंधित कुछ काम को दुनिया के इस हिस्से के साथ साझा करने के लिए बोरलॉग ग्लोबल रस्ट इनीशिएटीव (बीजीआरआई) को भी अपने साथ जोड़ चुका है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) का बीजीआरआई के साथ अहम गठजोड़ है। बीजीआरआई फिलहाल मुख्य रूप से दुनिया भर में फफूंदी या कीटों की समस्या पर ध्यान दे रही है। पिछले कई सालों से दुनिया भर में उत्पादन की बड़ा हिस्सा कीटों की समस्या के चलते बरबाद हो जाता है। सच कहें तो गेहूं की फसल के लिए यह एक अभिशाप से कम नहीं है। बिल ऐंड मेलिंडा फाउंडेशन और ब्रिटेन का अंतरराष्टï्रीय विकास विभाग इस प्रयास में बीजीआरआई की मदद करते हैं।
सतहों पर फैलने वाले नए प्रकार की फंफूदी ने संक्रमण को और भी खतरनाक बना दिया है। नए प्रकार के संक्रमणों में यूजी99 सबसे अधिक खतरनाक है। इसका नाम यूजी99 इसलिए रखा गया क्योंकि इसकी पहचान सबसे पहले युगांडा में वर्ष 1999 में की गई थी।

यह दूसरे देशों तक काफी तेजी से फैला और फिलहाल पूर्वी अफ्रीका, यमन, इराक और कुछ हद तक ईरान के गेहूं के खेतों को भी प्रभावित करता है। फंफूदी संक्रमण की कुछ घटनाएं हाल ही में भारत के दो पड़ोसी मुल्कों पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी सुनने को मिली हैं। अमेरिकी देशों, एशिया और अफ्रीका में पैदा होने वाली गेहूं की पैदावार में 85 फीसदी उत्पादन के यूजी99 से संक्रमित होने का खतरा है। हालांकि बुआई कीटरोधी गेहूं की प्रजातियों का प्रयोग करके भारत ने खुद को इस खतरे से पिछले कई दशकों से बचा रखा है। लेकिन फिर भी खतरे की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है।

इसलिए भारतीय गेहूं वैज्ञानिक गेहूं के बुआई के क्षेत्र में यूजी99 के प्रभाव से सुरक्षित प्रजातियों का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। आईसीएआर के महानिदेशक एस अयप्पन के मुताबिक यूजी99 संक्र मित होने की शंका होने की वजह से पीबीडब्ल्यू-343 प्रजाति का प्रयोग पिछले पांच सालों के दौरान काफी कम कर दिया गया है। पहले इसका प्रयोग देश में करीब आधे गेहंू क्षेत्र में होता था वहीं अब इसे चौथाई तक सीमित कर दिया गया है।

बीजीआरआई की मदद से सभी प्रजातियों की यूजी99 रोधी क्षमता की जांच केन्या और इथियोपिया जैसे प्रभावित देशों में की जाती है। इसलिए फोटोसिंथेटिक क्षमता बढ़ाकर भी गेहंू की प्राकृतिक उत्पादकता बढ़ाने का फायदा तब तक नहीं होगा जब तक वैज्ञानिक साथ-साथ कीड़ों, फफूंदों और जलवायु परिवर्तन से उपजी विभिन्न चुनौतियों का तोड़ नहीं निकाल लेते हैं। वैज्ञानिकों को विशेष रूप से दक्षिण एशिया के भारत, पाकिस्तान और नेपाल जैसे उत्पादक देशों की ओर ध्यान देना होगा।

गेहूं उत्पादन की बाधाओं को दूर करने के इन वैश्विक प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए सभी गेहंू उत्पादक देशों को अबाध वैज्ञानिक सहयोग की जरूरत होगी। लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है। सभी देश इस लड़ाई में एक दूसरे की मदद नहीं कर रहे हैं। दुनिया भर के कृषि वैज्ञानिकों ने आईसीएआर की मदद से बीजीआरआई द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक बैठक में शिरकत की। इस बैठक में वैज्ञानिकों ने जैव वैज्ञानिक शोध सामग्री के मुक्त प्रवाह में आ रही बाधाओं पर चिंता व्यक्त की। भारत ने ऐसी सामग्री को दूसरे देशों के साथ साझा करने की बात का समर्थन किया। लेकिन जब तक दूसरे देश भी ऐसा नहीं करते तब तक गेहूं की समस्या से निपटने के कृषि वैज्ञानिकों के तमाम प्रयास बेकार ही रह जाएंगे।

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