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बेहतर हालत में आईटी उद्योग पर अभी सुधार बाकी
विभु रंजन मिश्रा और सुरभि अग्रवाल / बेंगलूर August 23, 2013

पिछले पांच वर्षों के मुकाबले भारत का निर्यातोन्मुख आईटी (सूचना और प्रौद्योगिकी) आउटसोर्सिंग सेवा उद्योग अब आईटी क्षेत्र के विकास को लेकर कहीं ज्यादा आशावादी और उम्मीदों से भरा हुआ है। अमेरिका जैसे महत्वपूर्ण बाजारों में हुए सुधार और डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी जैसे हालातों के बीच हालिया तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन से इस आशावाद को और अधिक बल मिला है।

तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाना चाहिए कि बुरा वक्त गुजर गया? उद्योग जगत के कई आंतिरक सूत्रों की माने तो इसका जवाब नहीं में है। उनका मानना है कि वर्ष 2008 के पहले की हालत में पहुंचने में अभी कुछ सालों का वक्त और लगेगा या फिर यह भी हो सकता है कि वह मंदी पूर्व विकास की हालत में पहुंच ही न पायें। उनके पास इस बात को मानने का पर्याप्त कारण भी है।

निश्चित तौर पर अमेरिकी बाजार में मांग में तेजी आई है जो कि उनके कुल कारोबार का करीब 60 फीसदी से अधिक हिस्सा है। वहीं यूरोप को अभी आर्थिक अनिश्चितता के दौर से बाहर निकलना है। भारतीय घरेलू बाजार की हालत बिलकुल भी ठीक नहीं है और इसमें गिरावट के ही संकेत मिले हैं। आईटी उद्योग की प्रमुख हस्ती और विप्रो के आईटी कारोबार के पूर्व संयुक्त मुख्य कार्याधिकारी गिरीश परांजपे ने कहा, '2008 तक सभी भौगोलिक क्षेत्रों का प्रदर्शन बेहतर था और इसमें यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यहां तक कि भारतीय बाजार भी शामिल था। लेकिन अगर आप आज के हालातों पर नजर डालेंगे तो भारत की हालत ठीक नहीं है लेकिन अमेरिकी बाजार में तेजी आई है। इसलिए अगर 60 फीसदी बाजार बेहतर हालत में है तो ऐसी परिस्थिति में कुछ उम्मीद नजर आती है। लेकिन इसके बावजूद आप इसकी तुलना 2008 के पूर्व से नहीं कर सकते क्योंकि उस समय पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बेहतर कर रही थीं।Ó

उद्योग जगत के विश्लेषकों के मुताबिक सभी महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्रों में अधिकांश भारतीय सूचना और प्रौद्योगिकी सेवा प्रदाता कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किया है और साथ ही उन्हें डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी से भी फायदा हुआ है और इसकी मदद से कंपनियों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। आईएसजी में एशिया प्रशांत के अध्यक्ष सिड पइ ने कहा, 'दूसरी तिमाही में भारतीय आईटी कंपनियों ने बेहतर विकास किया है। यह निश्चित तौर पर बाजार की ताकत की तरफ संकेत देता हैऔर इसे कुछ हद तक रुपये में आई गिरावट से भी मदद मिली है।Ó उन्होंने कहा, 'रुपये की कमजोरी से हालांकि उन्हें अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। ग्राहकों को हमेशा उम्मीद रहती है कि विक्रेता उन्हें खरीद पर छूट दे। इससे उनके अंतरराष्टï्रीय विस्तार कार्यक्रम पर भी असर पड़ेगा क्योंकि भारत के बाहर नियुक्ति लागत और कंपनियों की अधिग्रहण लागत में इजाफा होगा।Ó

इन्फोसिस के निदेशक वी बालाकृष्णन ने कहा कि रुपये की कमजोरी से बेशक ही भारतीय सूचना और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों को फायदा हुआ है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी से आने वाले समय में आईटी उद्योग पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इससे कंपनियों की लागत संरचना पर असर पड़ेगा क्योंकि मुद्रास्फीति अभी भी काफी अधिक है।

उन्होंने कहा, 'आईटी उद्योग पर इसका (भारतीय अर्थव्यवस्था की मंदी) असर बहुत अधिक नहीं होगा क्येकि पूरे उद्योग के लिए घरेलू बाजार का योगदान काफी कम है। हालांकि चुनावों के नजदीक आने से किसी नई परियोजना की न तो घोषणा होगी और न ही उसे मंजूरी मिलेगी। इसका मतलब हुआ कि इंक्रिमेंटल ग्रोथ पर असर नहींं होगा।Ó भारतीय आईटी सेवा कंपनियों के कुल राजस्व में घरेलू बाजार की हिस्सेदारी करीब 2 से 10 फीसदी के बीच है। भारत की सबसे बड़ी सूचना और प्रौद्योगिकी सेवा प्रदाता कंपनी टीसीएस को भारत से करीब 1 अरब डॉलर का राजस्व हासिल होता है।

 परांजपे के मुताबिक जब भारतीय अर्थव्यवस्था विकास की राह पर थी तब कई सारे मौके और अवसर हासिल हो रहे थे। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी के बावजूद पिछले पांच वर्षों के मुकाबले भारत का आईटी आउटसोर्सिंग सेवा उद्योग काफी बेहतर हालत में है। शायद यह एकमात्र वैसा क्षेत्र है जिसने वित्त वर्ष 2014 के दौरान 10 से 15 फीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है जबकि अन्य क्षेत्रों की स्थिति शून्य से पांच फीसदी के बीच है।

Keyword: IT Company, IT Industry, Infosys, Rupee, आईटी, आउटसोर्सिंग सेवा उद्योग इन्फोसिस के संस्थापक और कार्यकारी चेयरमैन एन आर न,
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