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पिच बनी पाताल
आभास शर्मा और जोएल राय /  August 23, 2013

दुनिया भर में क्रिकेट  इस वक्त पाताल में  नजर  आ रहा है। इसकी दिग्गज हस्तियां मैदान को अलविदा कह चुकी हैं। भद्रजनों का खेल कहलाने वाले क्रिकेट के पतन की पड़ताल कर रहे हैं आभास शर्मा और जोएल राय

जरा कुछ आंकड़े देखिए: 72, 47, 96, 45, 49, 82ï? आपको क्या लग रहा है? कोई बल्लेबाज जबरदस्त फॉर्म में रन बना रहा है, यही न? नहीं जनाब, सच तो यह है कि टेस्ट क्रिकेट में कुछ टीमों के सारे बल्लेबाज मिलकर पारी में कुल इतने ही रन बना पाए हैं। अब आपको लगेगा कि वे टीमें केन्या, बांग्लादेश और जिंबाब्वे होंगी। आप फिर गलत हैं। असल में पिछले तीन साल में टेस्ट क्रिकेट की कई धाकड़ टीमें ऐसे ही शर्मनाक स्कोर पर सिमटी हैं। टीमों के नाम भी सुन लीजिए- इंगलैंड, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान और श्रीलंका। अब आप शायद यह कहेंगे कि विपक्षी टीमों ने गजब की गेंदबाजी की होगी।

आपसे पूछा जाए कि कौन से गेंदबाज ऐसा कहर बरपा सकते हैं तो आप दक्षिण अफ्रीका के डेल स्टीन, इंगलैंड के जेम्स एंडरसन और उसी टीम के स्टुअर्ट ब्रॉड का नाम लेंगे। आप लसित मलिंगा को भी फेहरिस्त में रख सकते हैं अगर आपको याद न दिलाया जाए कि वह टेस्ट क्रिकेट से कब का संन्यास ले चुके हैं। अब दूसरा सवाल... इस बार की एशेज शृंखला का दूसरा टेस्ट खत्म होने तक ऑस्ट्रेलिया के किस बल्लेबाज ने सबसे ज्यादा रन ठोके हैं या किसका औसत सबसे बेहतर है? आपके दिमाग में माइकल क्लार्क, शेन वाटन या फिल ह्यïूज के नाम ही कौंधेंगे। लेकिन सही जवाब है आखिरी नंबर पर बल्लेबाजी करने वाले एश्टन अगर, जिन्होंने इसी शृंखला से टेस्ट क्रिकेट में कदम रखा। इस एशेज में सबसे अच्छे औसत वाले ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज जेम्स पैटिंसन हैं।

तो क्या सबसे खालिस क्रिकेट यानी टेस्ट क्रिकेट पाताल में पहुंच चुका है? आंकड़े तो यही बोल रहे हैं। मौजूदा बल्लेबाजों में केवल 7 का औसत 50 के ऊपर है, जबकि पांच साल पहले 9 बल्लेबाज ऐसे थे। ये सातों बल्लेबाज 2004 से पहले ही टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण कर चुके थे। इस वक्त किसी के पास ब्रायन लारा, इंजमाम उल हक या रिकी पोंटिंग जैसी कुव्वत नहीं है। गेंदबाजों में केवल स्टीन और एंडरसन के नाम 300 से ज्यादा विकेट हैं। दुनिया में इस वक्त केवल एक खिलाड़ी है, जिसे सही मायनों में हरफनमौला कहा जा सकता है। नाम है जैक कैलिस, जो 18 साल से दक्षिण अफ्रीकी टीम के तारणहार बने हुए हैं।

क्रिकेट में ऐसे कितने सुपरस्टार हैं, जिन्हें देखने के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं या विज्ञापन देने वाली कंपनियां जिन पर जान छिड़कती हैं? इसके जवाब में भी केवल एक नाम है, महेंद्र सिंह धोनी। इस खेल में गिरावट की वजह बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण का गिरता स्तर या स्पॉट फिक्सिंग मामला (जिसमें अब पाकिस्तान के असद रऊफ जैसे अंपायर तक का नाम आ गया है) या शराब पीकर दंगा करना या पक्षपात भरी कमेंटरी वगैरह नहीं है। असल में अब यह भद्रजनों का खेल रह ही नहीं गया है। बिजनेस स्टैंडर्ड ने पिछले हफ्ते इस सिलसिले में एक सर्वेक्षण किया और 63.9 फीसदी लोगों का यही जवाब था कि क्रिकेट इस वक्त पांच साल के निचले स्तर पर है।

कमोबेश हरेक देश में क्रिकेट में गजब की गिरावट आई है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अंतरिम अध्यक्ष नजम सेठी ने हाल ही में मीडिया से कहा था, 'हमारी क्रिकेट सबसे बुरे दौर में है। हम मैच नहीं जीत पा रहे।Ó ग्लेन मैक्ग्रा और शेन वार्न जैसे दिग्गज खिलाड़ी भी सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि ऑस्ट्रेलियाई टीम इस वक्त सबसे बदतर खेल रही है। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व धाकड़ खिलाड़ी मार्क वॉ का कहना है, 'करीब दो दशक तक हम सबसे कद्दावर टीम थे। अब हम औसत टीम दिख रहे हैं।Ó स्तंभकार शील्ड बेरी ने 'द टेलीग्राफÓ अखबार में लिखा, 'इयान बेल या जॉनी बेयरस्टो के कारनामों से गलतफहमी मत पाल लीजिए। यह टीम साल भर से लगातार नाकाम हो रही है।Ó बेरी ने यह भी कहा कि मैच जीतने के बावजूद इंगलैंड कोई धाकड़ टीम नहीं है।

एक टीम वेस्ट इंडीज की भी है। कभी हरेक टीम उससे डरती भी थी। लेकिन आज वह ट्वेंटी-20 मैचों में ही जीत का परचम लहरा पाती है। शायद यही देखकर कैरेबियाई क्रिकेट के इतिहासकार और प्रवक्ता कहे जाने वाले टोनी कोजियर को कहना पड़ रहा है, 'इंडियन प्रीमियर लीग की चकाचौंध छोड़कर कोई भी खिलाड़ी पांच दिन तक मैदान में जूझना क्यों चाहेगा, जबकि उसके बदले उसे कम पैसा, कम शोहरत और कम दुलार मिलता है?Ó श्रीलंका की टीम मुतैया मुरलीधरन और सनत जयसूर्या के जाने से पैदा हुआ खालीपन आज तक भर नहीं पाई है। न्यूजीलैंड पिद्दी टीम लग रही है।

हां, दक्षिण अफ्रीका और भारत की टीमें कुछ ठीकठाक दिख रही हैं। लेकिन अफ्रीका की टीम में से केवल हाशिम अमला और स्टीन को ही सितारों की जमात में रखा जा सकता है। भारत के पास तो कोई स्थापित गेंदबाज ही नहीं है और विराट कोहली ही अकेले ढंग के बल्लेबाज हैं, जिन्हें आला दर्जे का बनने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है। सचिन तेंदुलकर के अलावा इस वक्त 50 से ऊपर टेस्ट औसत केवल चेतेश्वर पुजारा का है। उनका औसत 65.65 का है, लेकिन अभी उन्होंने केवल 13 टेस्ट खेले हैं। कोहली को सब भविष्य का सबसे चमकदार सितारा बताते हैं, लेकिन 18 टेस्ट खेलने के बाद भी उनका टेस्ट बल्लेबाजी औसत केवल 41.96 है।

असल में क्रिकेट के सबसे फटाफट मुकाबलों यानी ट्वेंटी-20 के मेले ने क्रिकेट को उन लड़ाकों से महरूम कर दिया है, जो पूरे जज्बे के साथ खेलते थे, चाहे हालात कैसे भी हों। वार्न और मुरलीधरन, सचिन और स्टीव वॉ, वसीम अकरम और एलन डोनल्ड, डेनियल वेटोरी और केविन पीटरसन ने साल दर साल जुझारू तरीके से खेलते हुए शानदार प्रदर्शन किया है। लेकिन टेस्ट के वैसे सितारे आज कहां हैं? उस मचान पर सबसे ऊपर बैठे लोग अब उम्र के हमले से कुंद हो रहे हैं। 37 साल के कैलिस हों या 35 साल के संगकारा या 39 के मिसबाह उल हक और 34 के ग्रीम स्वान, टेस्ट क्रिकेट के पर्याय बन चुके ये सभी बतौर खिलाड़ी अपने आखिरी दौर में हैं। भारत में भी राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण पहले ही क्रिकेट को अलविदा कह चुके हैं। सचिन अभी जूझ रहे हैं, लेकिन वह भी 40 साल के हो चुके हैं।

किसी वक्त गेंदों की तूफानी रफ्तार के लिए मशहूर रही वेस्ट इंडीज की टीम में आज सबसे ज्यादा विकेट केमर रोश के नाम हैं और उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में अभी महज 85 विकेट लिए हैं। उनके साथ डैरेन सैमी हैं, जिनके खाते में केवल 77 विकेट दर्ज हैं। ये लोग तो 519 टेस्ट विकेट लेने वाले कोर्टनी वाल्श या 405 विकेट लेने वाले कर्टली एंब्रोस के पासंग भी नहीं हैं। श्रीलंका में अच्छा गेंदबाज तलाशेंगे तो आपकी नजर रंगना हेरात पर ठहरेगी, जिनके नाम पर 200 से ज्यादा विकेट दर्ज हैं। लेकिन मुरलीधरन ने उनसे 595 विकेट ज्यादा लिए हैं। चमिंडा वास ने भी उनके मुकाबले 155 विकेट ज्यादा चटकाए थे।

भारत में इस समय सबसे बेहतरीन गेंदबाज इशांत शर्मा हैं। लेकिन वह केवल 144 टेस्ट विकेट ले सके हैं। टीम से बाहर कर दिए गए हरभजन सिंह के नाम भी 413 टेस्ट विकेट दर्ज हैं। यह बात अलग है कि खुद हरभजन भारत के सबसे उम्दा लेग स्पिनर अनिल कुंबले के 619 टेस्ट विकेट के आंकड़े से अभी बहुत पीछे हैं। 400 टेस्ट विकेट का आंकड़ा पहली बार लांघने वाले सर रिचर्ड हैडली की सरजमीं न्यूजीलैंड की टीम में इस वक्त सबसे उम्दा गेंदबाज टिम साउदी दिख रहे हैं, जो अभी 100 विकेट तक भी नहीं पहुंच सके हैं। पाकिस्तान की हालत कुछ अच्छी है, जहां उमर गुल 163 विकेट झटक चुके हैं, लेकिन अकरम के 414 और वकार यूनिस के 376 विकेट के सामने वह भी कहीं नहीं ठहरते।

जिन बल्लेबाजों ने अपने-अपने देश के लिए पिछले चार साल में सबसे ज्यादा रन बनाए हैं, उनका करियर आखिरी दौर में है और उनकी जगह लेने वाला युवा नहीं दिखता। क्लार्क, एलिस्टेयर कुक, सचिन, रॉस टेलर, अमला, कुमार संगकारा, अजहर अली और शिवनारायण चंद्रपाल ने अपनी-अपनी टीम के लिए सबसे ज्यादा रन बटोरे हैं। लेकिन 31 टेस्ट में टेलर का औसत केवल 43.47 रहा है और पाकिस्तान के अली तो 27 मैच में 42.26 का औसत ही दर्ज करा सके हैं। इंगलैंड के कुक ने 48 टेस्ट में 52.77 के औसत से रन बटोरे हैं। सचिन ने 39 टेस्ट में 51.06 के औसत से रन जुटाए हैं।

ऐसे में टीमों का डांवांडोल प्रदर्शन देखकर आपको ताज्जुब नहीं होना चाहिए। खिलाड़ी टीम में आते हैं और चले जाते हैं क्योंकि उनका खेल चयनकर्ताओं और प्रशंसकों को जंचता ही नहीं है। स्तंभकार डेनियला डॉहन ने 'रिपोर्ताज ऑनलाइनÓ में लिखा, 'ऑस्ट्रेलियाई चयनकर्ताओं ने 2000 से 2009 के बीच क्लार्क, वाटसन, मिशेल जॉनसन, ब्रायन हैडिन और पीटर सिडल समेत 29 नए खिलाडिय़ों को टेस्ट क्रिकेट में आजमाया। 2010 और 2013 के बीच 22 नए खिलाड़ी आ चुके हैं। नतीजा यही है कि खिलाड़ी आते हैं, 3 टेस्ट खेलते हैं और खराब प्रदर्शन के नाम पर बाहर कर दिए जाते हैं।Ó

साफ  है कि जिन खिलाडिय़ों को टेस्ट क्रिकेटर का दर्जा दिया गया, वे टीम में अपनी जगह बरकरार रखने में नाकाम क्यों हो गए। पूर्व टेस्ट क्रिकेटर और कमेंटेटर मार्क निकोलस लिखते हैं, 'क्रिकेट ऐसा खेल नहीं है, जो बेहद कम कौशल के साथ खेल लिया जाए। चार या पांच दिन तक खेलने के लिए अलहदा फन चाहिए।Ó अपने बेबाक बयानों के लिए मशहूर पूर्व भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी की टिप्पणी हमेशा की तरह सटीक रही। उन्होंने कहा, 'पिच की लंबाई भी वही है, गेंद का वजन भी उतना ही है और स्टंप की लंबाई भी पहले जितनी ही है। कुछ भी नहीं बदला। बदल तो खेल के निर्माता, निर्देशक और कलाकार गए हैं। अब खेल तमाशा बन गया है और खिलाड़ी देखने की चीज बन गए हैं।Ó यह सूरत जल्द बदलती भी नहीं दिखती।

नए सितारों की पीढ़ी को आदर्श खिलाडिय़ों की जरूरत होती है। उनकी जरूरत होती है, जिनसे वे  प्रेरणा ले सकें, लेकिन ऐसे खिलाड़ी बचे नहीं हैं। वेस्ट इंडीज में नई पीढ़ी को क्रिकेट उतना नहीं सुहाता। वे बास्केटबॉल खेलते हैं, जो अब वहां सबसे लोकप्रिय है। उम्मीद भी नहीं है कि वेस्ट इंडीज की तूफानी चौकड़ी फिर दिखेगी। जवागल श्रीनाथ कहते हैं, 'अच्छे तेज गेंदबाजों की कमी हो गई है।Ó मांस-मछली से कोसों दूर रहने वाले तेज गेंदबाजों में सबसे तूफानी श्रीनाथ को आप माफ कर सकते हैं क्योंकि वे खरी कहने से हमेशा से परहेज करते हैं। असल बात तो यह है कि अच्छे क्रिकेटरों की ही कमी हो गई है।

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