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पहले से चमका या मोदी ने चमकाया?
मयंक मिश्रा /  August 09, 2013

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक चाहे वे पार्टी के दायरे में आने वाले हिमायती हों या फिर सोशल मीडिया पर उनका गुणगान करने वाले नेटीजन। सभी एक सुर में कहते हैं कि देश में मोदी का गुजरात सबसे अच्छा राज्य है। अपने दावे के समर्थन वे पिछले 10 वर्षों के दौरान 10 फीसदी से ज्यादा वृद्घि दर, कृषि क्षेत्र के बेहतर प्रदर्शन, बिजली की स्थिति में सुधार, अच्छा बुनियादी ढांचा और वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलनों से लगातार हो रहे निवेश जैसे तर्क देते हैं।  मगर आंकड़े क्या बयां करते हैं? क्या वर्ष 2001 में नरेंद्र मोदी के राज्य का मुख्यमंत्री बनने के बाद गुजरात में भारी बदलाव आया है? इस अवधि में मोदी के गुजरात का अन्य राज्यों की तुलना में प्रदर्शन कैसा रहा? क्या वृद्धि दर का फायदा निचले तबके तक पहुंचा है?

कितना विकास?
वर्ष 2004-05 से 2011-12 के बीच गुजरात ने 10.08 फीसदी की शानदार औसत वार्षिक वृद्घि दर दर्ज की है। इस लिहाज से 2005-06 रिकॉर्ड वर्ष था, जिसमें राज्य की वृद्धि दर करीब 15 फीसदी रही। हालांकि इस दौरान महाराष्ट्र की वृद्धि दर 10.75 फीसदी, तमिलनाडु की 10.27 फीसदी और बिहार की 11.42 फीसदी रही। यह बात सही है कि बिहार को निम्न आधार का फायदा मिला। मगर महाराष्ट्र और तमिलनाडु लंबे समय से विकसित राज्य रहे हैं।  हालांकि गुजरात की संतुलित वृद्धि दर इसे अन्य राज्यों से अलग करती है। गुजरात की बहुत सी कंपनियों से जुड़े अहमदाबाद के औद्योगिक सलाहकार सुनील पारेख कहते हैं कि वृद्धि दर में अकेले सेवा, विनिर्माण या कृषि क्षेत्र का ही योगदान नहीं रहा। प्रत्येक श्रेणी ने योगदान दिया। कृषि क्षेत्र में गुजरात का प्रदर्शन काबिलेतारीफ रहा है। योजना आयोग के आंकड़ों के मुताबिक कृषि और सहायक क्षेत्रों की वार्षिक वृद्धि 6.47 फीसदी रही है। हां, यह 2005-06 से 2011-12 तक महाराष्ट्र की वृद्धि दर 7.74 फीसदी और बिहार की 15.17 फीसदी से कम रही। हालांकि गुजरात की वृद्धि दर 1996-97 से 2004-05 तक 5.65 फीसदी रही थी। इस अवधि के दौरान महाराष्ट्र की वार्षिक वृद्धि दर महज 2.64 फीसदी और बिहार की 6.76 फीसदी रही।

क्या है वजह?

भारतीय प्रबंध संस्थान, अहमदाबाद के प्रोफेसर अनिल गुप्ता कहते हैं कि गुजरात की वृद्धि दर में तेजी तीन कारकों-बीटी कपास को अपनाने, लघु सिंचाई परियोजनाओं पर ध्यान देने और बांध बनाने से आई है। इसके अलावा कृषि क्षेत्र से संबंंधित छोटी मशीनरी उपकरणों नई-नई खोजों से इसमें मदद मिली है। उनका कहना है कि राज्य में इस्तेमाल होने वाली ऐसी छोटी मशीनरी करीब 10,000 हैं, जिनसे कृषि उत्पादकता को बढ़ाने में मदद मिली है।  नई सिंचाई तकनीकों को अपनाने से न केवल उत्पादकता बढ़ी है, बल्कि इससे किसानों को बिजली बचाने में भी मदद मिली है। राज्य की ग्रीन रिवॉल्यूशन कंपनी इस तकनीक को अपनाने पर किसानों को सब्सिडी देती है। इस योजना के तहत करीब 5,00,000 हेक्टेयर क्षेत्र आता है। इसके अलावा बांधों के निर्माण में भी तेजी आई है। पिछले 10 वर्षों के दौरान करीब 1,50,000 बांध बनाए गए हैं। इन सभी प्रयासों से शुद्ध सिंचित क्षेत्र का दायरा 2006-07 में बढ़कर 44.71 फीसदी हो गया, जो 2000-01 में 31.4 फीसदी था।

नतीजतन कृषि उत्पादकता में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2000 के बाद खाद्यान्न की उत्पादकता करीब 100 फीसदी और कपास की उत्पादकता में करीब 200 फीसदी इजाफा हुआ है। इसके अलावा सरदार सरोवर बांध वर्ष 2001 से पूरी तरह चालू हो गया है। इस बांध पर सहायक नहरों का नेटवर्क 75,000 किलोमीटर है, जिससे गुजरात में करीब 18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है। एक पूर्व कैबिनेट मंत्री जय नारायण व्यास कहते हैं कि गुजरात 10 साल पहले खाद्यान्न की किल्लत से जूझने वाला राज्य था, जो आज खाद्यान्न अधिशेष वाला राज्य बन गया है। गेहूं का उत्पादन 80 लाख टन से बढ़कर 4 करोड़ टन हो गया है। वहीं देश के कुल कपास उत्पादन में राज्य का 40 फीसदी योगदान है। राज्य सरकार ने इन 10 वर्षों में बिजली उत्पादन और वितरण में काफी प्रगति की है। वर्ष 2003-04 में कुल स्थापित विद्युत क्षमता 9,000 मेगावॉट थी और यह मार्च 2013 में बढ़कर 23,887 मेगावॉट हो गई। पारेषण और वितरण नुकसान में कटौती का रिकॉर्ड भी शानदार है। राज्य इसे 35 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी पर लाने में सफल रहा है। इस वजह से गुजरात विद्युत अधिशेष वाले कुछेक राज्यों की जमात में शामिल हो गया है।

 ऐसा नहीं है कि गुजरात केवल इस समय ही विकास कर रहा है। वर्ष 1992 से 1997 तक राज्य की औसत वृद्धि दर 12.9 फीसदी रही। यह नौवीं पंचवर्षीय योजना (1997-2002) में कम हुई लेकिन 10वीं पंचवर्षीय योजना और इसके  बाद के वर्षों में फिर से तेज हुई है। समाजशास्त्री दीपंकर गुप्ता कहते हैं कि मोदी ने उसे बरकरार रखा है, जो उन्हें 2001 से पहले की सरकारों से मिला था। गुजरात हमेशा तीसरे स्थान पर था और आज भी यह उसी पर है। करीब 170 गांवों को छोड़कर अन्य सभी गांवों का विद्युतीकरण, ज्यादातर सड़कों एवं बदरगाहों, सोडा ऐश का उत्पादन और रिफाइनरियों का निर्माण मोदी से पहले हो चुका था। हालांकि यह कहना सही होगा कि उन्होंने अपनी विरासत कम नहीं होने दी। टिप्पणीकारों का कहना है कि हर दो साल में होने वाले वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन ने ब्रांड गुजरात की चमक और बढ़ाई है। यह सम्मेलन वर्ष 2003 से शुरू हुआ था। पहले सम्मेलन में 66,000 करोड़ रुपये निवेश के 76 समझौतों (एमओयू) पर दस्तखत हुए थे। वर्ष 2011 के पांचवें सम्मेलन में 8,380 एमओयू पर हस्ताक्षर हुए। ये एमओयू 21 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों के लिए हुए थे। 

पारेख का कहना है कि हालांकि एक सम्मेलन के कुछ प्रस्ताव ही हकीकत बन सके। होने वाले प्रस्तावों और वास्तविक निवेश की दर करीब 20 फीसदी है। यह कई कारकों पर निर्भर करता है। टिप्पणीकारों का कहना है कि राज्य का बुनियादी ढांचा और व्यवसाय के अनुकूल कारोबारी माहौल निवेशकों को राज्य की तरफ खींचता है। गुजरात में करीब 40 बंदरगाह हैं, जो देश की कुल माल आवाजाही के 20 फीसदी का संचालन करते हैं। पारेख का कहना है कि यह विद्युत अधिशेष वाला राज्य है और इसका सड़कों का बुनियादी ढांचा ऐसा है कि किसी बंदरगाह से राज्य के किसी भी जगह माल पहुंचने में एक दिन से कम समय लगता है।

उन्होंने कहा कि जुड़वां शहरों जैसे अहमदाबाद-गांधीनगर और सूरत -भरूच के विकास से शहरी बुनियादी ढांचे को और बढ़ावा मिलेगा। अनिल गुप्ता का कहना है कि ज्यादा शहरी स्थानीय निकायों की अच्छी वित्तीय स्थिति से राज्य का शहरी बुनियादी ढांचा अन्य राज्यों से बेहतर है। विकास के आंकड़े आकर्षक रहे हैं लेकिन वंचित वर्ग के लिए उतने अच्छे नहीं? ये मुद्दे बहस का विषय बने हुए हैं।

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