बिजनेस स्टैंडर्ड - पूंजी जुटाने के क्रम में जरूरी है आपसी संतुलन
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पूंजी जुटाने के क्रम में जरूरी है आपसी संतुलन
आकाश प्रकाश /  August 09, 2013

सरकार और केंद्रीय बैंक को विदेशी निवेशकों को प्रसन्न रखना होगा और विकास संबंधी अनुमानों को नुकसान पहुंचाने से बचना होगा। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नए गवर्नर और सरकार में शामिल तमाम लोगों के समक्ष अब कुछ सर्वाधिक कठिन महीने और हफ्ते हैं। उनको रुपये का बचाव करने के साथ-साथ विकास की रक्षा करने का बेहद संतुलन साधने वाला काम करना है।

अब तक आरबीआई ने जो भी कुछ किया है वह रुपये के बचाव के पारंपरिक मौद्रिक उपाय के रूप में किया जाता रहा है। उसने नकदी कम करके रुपये की कीमत नियंत्रित करने का जतन किया है जो बाजार प्रतिभागियों को प्रेरित कर रहा है कि वे गैर रुपये वाली संपत्तियों में निवेश करें। अनेक टीकाकारों ने आरबीआई के इस कदम की आलोचना की है और कहा है कि चालू खाता घाटे की बुनियादी समस्या के मद्देनजर रुपये का बचाव करना निरुद्देश्य है। उनका मानना है कि रुपये को थामने के लिए अगर आर्थिक विकास की कीमत चुकानी पड़े तो यह बहुत ज्यादा है।

मुझे लगता है कि आरबीआई के पास कोई विकल्प ही नहीं था। उनको इस दुष्चक्र को तोडऩा ही था। अनेक समझदार बाजार प्रतिभागियों ने आरबीआई के दखल के पहले ही कहा था कि रुपये को 65 प्रति डॉलर के नए दायरे में रखा जाना चाहिए। अगर ऐसा किया जाता तो महंगाई बढ़ती और उद्योग जगत के एक बड़े तबके को नुकसान होता। इससे रेटिंग में और कमी होने का जोखिम बढ़ जाता, नतीजतन देश से पूंजी बाहर जाती। हमें इस पूरे चक्र को तोडऩा था।

एक ओर जहां यह रुपये की कमजोरी के प्रति किताबी प्रतिक्रिया है वहीं रुपये को स्थिर बनाने अथवा बाजार की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोई कोशिश नहीं की गई है। हकीकत यह है कि अल्पावधि में पूंजी जुटाने व सीएडी कम करने के लिए सरकार के पास करने के लिए इससे ज्यादा कुछ था भी नहीं। सीएडी में जल्दी कोई नाटकीय कमी नहीं आएगी और हमें घाटे की भरपाई करने के लिए 75 से 80 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी। आयात संबंधी प्रतिबंध, सोने पर शुल्क वृद्घि, लौह अयस्क का खनन दोबारा शुरू करना, कोयला उत्पादन बढ़ाना आदि तमाम बातें सीएडी को लंबी अवधि में ही प्रभावित करेंगी। इसी तरह सरकार एफडीआई को लेकर जो भी कदम उठा रही है उनका असर 12 से 18 महीनों में ही नजर आएगा। अल्पावधि में हमें वित्तीय साधन जुटाने होंगे, इसके सिवा कोई विकल्प नहीं है।

यहां पर अन्य उभरते बाजारों और भारत के बीच का अंतर स्पष्टï होता है। ऋण से कहीं अधिक पूंजी पर निर्भर हैं। हमने अपने स्थानीय ऋण बाजार को हाल ही में खोला है और वह बहुत सीमित दायरे में। यह शेयर बाजारों से एकदम उलट है जो 1993 से ही विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए खुला हुआ है। हमारे यहां एफआईआई निवेश का 225 अरब डॉलर का भंडार है जबकि ऋण बाजार में इसकी मात्रा 30 -35 अरब डॉलर है।

अगर आरबीआई हालिया मौद्रिक उपायों की मदद से रुपये का बचाव करने में सफल रहता है और मुद्रा में स्थायित्व आ जाता है तो ऋण की आवक दोबारा शुरू हो सकती है। लेकिन फिर भी वह इतना नहीं होगा कि उसकी बदौलत वित्त पोषण की तात्कालिक जरूरतों को पूरा किया जा सके। मुझे लगता है कि हमें इससे अधिक ऋण की आवक की आवश्यकता भी नहीं है। अगर अमेरिकी केंद्रीय बैंक क्वांटिटेटिव ईजिंग में कमी करता है तो भी यह नीति कारगर नहीं साबित होगी। असली द्वंद्व यही है हमें विश्वसनीयता बरकरार रखने के लिए नीतियों को सख्त बनाए रखना होगा लेकिन यह भी ध्यान देना होगा कि विकास पर बहुत अधिक असर नहीं पड़े और पूंजी भी बाहर न जाए।

बढ़ती दरों के साथ समस्या यह है कि इसका असर विकास और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। पिछले कुछ सालों के दौरान भारत ने अन्य उभरते देशों के मुकाबले अधिक पूंजी जुटाई है। निवेशक विकास की तलाश में भारत आते हैं और अगर उनको लगता है कि यहां विकास संभावनाएं लंबे समय तक बाधित रहेंगी तो वे पूंजी निकाल लेंगे। एक अन्य बात यह है कि समूचे उभरते बाजारों के परिसंपत्ति वर्ग में संपत्ति की गुणवत्ता को लेकर चिंता व्याप्त है। बड़े उभरते शेयर बाजारों में सीमित विकल्प होने के कारण भारत को लाभ मिलता रहता है। लेकिन यह भी तय है कि ऐसा हमेशा नहीं होता रह सकता है। ऐसे में हमें निवेशकों को एक बार फिर से यह यकीन दिलाना होगा कि देश में विकास की पर्याप्त संभावनाएं हैं और उन्हें मौजूदा हमीनी हकीकतों की अनदेखी करते हुए भी यहां आना चाहिए।

लंबी अवधि के दौरान यह विश्वास बहाल करने के लिए एक बार फिर हमें तमाम क्षेत्रों में दूसरे दौर के सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। यह सुधार हमारे समूचे प्रशासनिक और सांस्थानिक ढांचे में होना चाहिए। इस तरह के आधारभूत सुधारों से बचा नहीं जा सकता है। इसके अलावा कुछ भी करना केवल तात्कालिक उपाय ही माना जाएगा और वह समस्या का हल नहीं होगा बल्कि उसे टालने की कोशिश भर होगा।

यदि हम बुनियादी सुधार लाने की दिशा में काम नहीं करते हैं तो मुझे नहीं लगता है कि निवेशक दोबारा हमारे देश की ओर रुख करेंगे। ऐसे में भविष्य में गिरावट के सिवा दूसरा कोई नजारा नजर भी नहीं आता। अगर हम आज कड़े फैसले नहीं लेते हैं जबकि हम बाहरी मोर्चे पर अत्यंत संवेदनशील समस्या से जूझ रहे हैं तो फिर आखिर हम ऐसा कब करेेंगे? अभी हाल तक वैश्विक निवेशक इस बात को लेकर पुरयकीन थे कि आर्थिक मंदी चक्रीय प्रकृति की है और हम वापसी करने में कामयाब होंगे। अब वे इस बात पर संदेह जताने लगे हैं क्योंकि नए सुधारों के संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। हालात ये हैं कि अब तो 7 फीसदी की विकास दर हासिल करने को लेकर भी शंका ही है और उससे नीचे की विकास दर पर हम स्थायी रूप से विदेशी पूंजी कैसे आकर्षित कर पाएंगे?

बुनियादी सुधारों के साथ-साथ हमें अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष की शरण लेनी होगी और एक वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में राय मशविरा करना होगा। चूंकि अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व क्वांटिटेटिव ईजिंग कम करने जा रहा है तो ऐसे में दुनिया के बड़े केंद्रीय बैंकों के साथ बातचीत कर विदेशी मुद्रा भंडार तैयार करने की दिशा में कदम उठाने होंगे। इसके अलावा एनआरआई बॉन्ड और सरकारी बैंकों के विदेशी मुद्रा ऋण से भी हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में 25 से 30 अरब डॉलर की राशि आएगी। निवेशकों का विश्वास बहाल करने के लिए हमें कम से कम इतने प्रयास तो करने ही होंगे।

इसके अलावा भी अनेक अन्य साधारण कदम हैं जिन्हें उठाकर भारत को एक बार फिर निवेशकों की नजर में लाया जा सकता है। सरकार द्वारा उठाए गए कुछ आसान उपाय एमएससीआई सूचकांक में बदलाव ला सकते हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था के आकार के अधिक अनुरूप होगा। अगर ऐसा होता है तो अपने आप ही पूंजी की आवक में बढ़ोतरी होगी।

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