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नागपाल का अंजाम, सत्ता का पैगाम!
साहिल मक्कड़ /  08 04, 2013

लगभग एक साल पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन नवनियुक्त मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सार्वजनिक तौर पर नौकरशाहों को चेतावनी दी थी कि या तो वे उनकी सरकार के लिए काम करें या फिर गंभीर नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहें। राज्य सूचना एवं जन संपर्क विभाग ने 15 जुलाई 2012 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में यादव का उल्लेख करते हुए कहा गया, 'उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रदेश सरकार की प्राथमिकताओं के हिसाब से काम नहीं करने पर अधिकारियों को चेतावनी दी है और कहा कि उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।Ó

उस समय कई वरिष्ठ नौकरशाहों ने बिना ज्यादा विचार किए आदेश को खारिज कर दिया था। उनको लगता था कि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, विशेषकर जब नवनियुक्त मुख्यमंत्री को पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों के हस्तक्षेप के कारण सार्वजनिक तौर पर अपनी बात से हटना पड़ा। यादव की पूर्ववर्ती मायावती की मजबूत पकड़ से आजाद होने के बाद नौकरशाहों ने इसे अपने लिए अचानक मिला मौका समझा और उन्होंने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। यादव का बमुश्किल ही उन पर कोई नियंत्रण था, जो एक आज्ञाकारी के रूप में अपने पिता और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के साथ ही अपने प्रभावशाली चाचाओं के निर्देशों का पालन कर रहे थे। लेकिन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के बाद छिड़े विवाद के क्रम में शक्तिशाली नौकरशाहों की उन्मुक्त दौड़ पर संभवत: विराम लग गया है।

लखनऊ के एक राजनीतिक विश्लेषक और अधिवक्ता इंद्र भूषण सिंह ने कहा कि राज्य सरकार पूरी तरह नियंत्रण स्थापित करने के लिए अधिकारियों को धमका रही है। उन्होंने कहा, 'वह इस चेन की एक कमजोर कड़ी थी और इसीलिए आसानी से शिकार हो गई।Ó

सिंह के मुताबिक उत्तर प्रदेश में यह जगजाहिर है कि समाजवादी पार्टी आगामी आम चुनावों में अपने अल्पसंख्यक मतदाताओं को कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के हाथों गंवा देने से डरती है। पार्टी का यह कदम इस मामले को सांप्रदायिक रंग देकर अपने इसी वोट बैंक को बचाने की कवायद भर है। उन्होंने कहा, 'यह आईएएस और आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) को साफ संदेश है कि पार्टी की नीतियों के हिसाब से चलें और लूटपाट की स्थिति में अपनी आंखें मूंद लें।Ó

2012 में अल्पसंख्यकों का खासा समर्थन हासिल करने वाली सपा सरकार राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। सरकार पर अराजकता के आरोप लगे हैं और राज्य में पार्टी की लोकप्रियता खत्म होती जा रही है। राज्य के एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'एक ईमानदार अधिकारी को इसलिए निलंबित किया गया, क्योंकि वह खनन माफिया के खिलाफ काम कर रही थीं। हमारा मानना है कि सरकार ने सांप्रदायिक माहौल से जोड़कर एक तीर से दो निशाने साध लिए हैं। वह प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं सहित उनकी पार्टी के लोगों के खिलाफ भी काम कर रही थीं, जो कथित तौर पर अवैध बालू खनन में शामिल थे।Ó मीडिया में आई खबरों के मुताबिक अवैधन खनन में लगभग 100-200 करोड़ रुपये का लेनदेन होता है और यह पैसा चुनाव प्रचार में व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। बिज़नेस स्टैंडर्ड स्वतंत्र रूप से इन सभी आरोपों की पुष्टि नहीं कर सका। हालांकि इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स की एक रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में अवैध खनन के मामलों के बावजूद राज्य सरकार ने जून 2012 तक कोई भी आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया। जून 2012 के बाद के आंकड़े अभी तक उपलब्ध नहीं हैं। 2012 में (जून तक) उत्तर प्रदेश में 3,266 अवैध खनन के मामलों की खबरें थीं, जबकि 2011 और 2010 में यह आंकड़ा क्रमश: 4,708 और 4,641 ही था। न तो ऐसे किसी मामले में मुकदमा दर्ज किया गया, न ही ऐसी कोई घटना दर्ज की गई। हालांकि सरकार ने 2,433 लाख रुपये का जुर्माना वसूला था।

संयोग से अखिलेश यादव ने दो मामलों में राज्य की मशीनरी को अवैध खनन और उसकी ढुलाई रोकने के आदेश दिए थे। 30 जुलाई 2012 को उन्होंने जिलाधिकारियों को खनन माफिया के खिलाफ कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए थे।

कुछ महीने बाद मुख्यमंत्री ने और भी कड़े शब्द इस्तेमाल किए थे। 16 दिसंबर 2012 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, 'उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी जो अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेंगे।Ó

भले ही मीडिया में आई खबरों से यह अनुमान निकलता है कि यादव ने नागपाल को बालू खनन माफिया के खिलाफ कार्रवाई को लेकर निलंबित किया, लेकिन मुख्यमंत्री ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। संयोग से नागपाल ने 20 मुकदमे दर्ज किए और अवैध बालू से भरे कम से कम 30 ट्रकों को जब्त भी कर लिया। यादव ने लखनऊ में संवाददाताओं को बताया, 'उन्होंने जो कदम उठाए, उसके लिए उन्हें सजा दी गई। सरकार का उनको हटाना सही कदम था।Ó उन्होंने कहा कि उन्हें सांप्रदायिक माहौल बिगाडऩे के लिए निलंबित किया गया।

एक वरिष्ठ अधिकारी दलील देते हैं, 'उन्हें बिना किसी जांच और उनका पक्ष जाने बिना ही निलंबित किया गया था। राज्य पुलिस मुख्यालय से मिली खुफिया रिपोर्ट से भी 25, 26 और 27 जुलाई को की गई उनकी कार्रवाई से क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव के संकेत नहीं दिये गए।Ó उनके सीनियर और गौतम बुद्ध नगर के डीएम की रिपोर्ट से उनके निर्दोष होने का पता चलता है। राज्य में कई का मानना है कि यादव का नागपाल को निलंबित करने की ठोस वजह नहीं थी।

गृह मंत्रालय के मुताबिक अक्टूबर 2012 में समाप्त 10 महीनों के दौरान प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा के 104 मामले हुए, जिनमें 34 लोगों की जान गईं और 456 घायल हुए। इनमें तीन बड़े दंगे भी शामिल हैं। अधिकारी ने सवाल किया कि इन मामलों में काम को सही से करने में नाकाम रहने पर कितने आईएएस और आईपीएस अधिकारियों का निलंबन किया गया?

केंद्र ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांगी रिपोर्ट
केंद्र ने एक आईएएस अधिकारी के निलंबन पर उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी है। यह कदम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे गए एक पत्र के बाद उठाया गया है। इस पत्र में सोनिया ने कहा था कि आईएएस अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल के साथ 'अनुचित व्यवहार नहीं होना चाहिए।Ó

प्रधानमंत्री के पास कार्मिक विभाग का जिम्मा है जो आईएएस काडर के प्रशासनिक मामलों का नोडल विभाग है। एक आधिकारिक सूत्र ने बताया कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए उप्र सरकार को लिखा है और 28 वर्षीय दुर्गाशक्ति के निलंबन मामले में रिपोर्ट मांगी है।

सूत्र ने कहा कि राज्य सरकार के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह किसी आईएएस अधिकारी के निलंबल के मामले में केंद्र को रिपोर्ट सौंपे। उन्होंने कहा कि नागपाल के मामले में उसे उप्र के अधिकारियों की रिपोर्ट की अभी तक प्रतीक्षा है।

उप्र कैडर की दुर्गा शक्ति को 27 जुलाई को एक निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार गिराने का आदेश बिना निर्धारित प्रक्रिया को पूरा किए हुए देने के कारण निलंबित कर दिया गया था। निलंबन के आदेश पर भाजपा एवं बसपा सहित विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया की। विपक्षी दलों का आरोप था कि एसडीएम को इसलिए निलंबित किया गया क्योंकि उन्होंने राज्य के गौतमबुद्धनगर इलाके में काम कर रहे रेत माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई की थी। ऑल इंडिया आईएएस ऑफिसर एसोसिएशन ने नागपाल की बहाली की मांग की। नागपाल को फिलहाल लखनऊ में राजस्व बोर्ड से संबद्ध किया गया है।  

Keyword: अवैधन खनन , Illigal Mining, IAS, Nagpal, दुर्गाशक्ति नागपाल , निलंबन,
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