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आयकर निपटान आयोग के साथ सुलझाएं विवाद
नेहा पांडे देवरस और जयदीप घोष /  August 04, 2013

कर अधिकारियों से निपटना आसान काम नहीं है। मध्य वर्ग के करदाताओं से लेकर बड़े व्यवसायियों को भी विभिन्न वजहों से कर विभाग की जांच के दायरे में आना पड़ता है। आय कर निपटान आयोग की स्थापना का मकसद कर विभाग और करदाता दोनों को मध्यस्थता के मंच पर लाना था।

दिल्ली के वकील एवं आयकर निपटान आयोग (आईटीएससी) के पूर्व चेयरमैन एस आर वाधवा एक ऐसे व्यवसायी का उदाहरण देते हैं जिसने ऑर्डर और मंजूरियां पाने के लिए सरकारी कर्मचारियों को भुगतान किया था। नाम लिए बगैर वाधवा बताते हैं, 'जब उन्होंने आयोग से संपर्क किया तो हमने देखा कि इस व्यक्ति ने दी गई रिश्वत के लिए भी कर कटौती का लाभ उठाया। उसने इस रिश्वत को अपने खातों में कमीशन के तौर पर दिखाया था।Ó चूंकि कमीशन/रिश्वत पर कर छूट का दावा नहीं किया जा सकता, इसलिए यह छूट नहीं दी गई।

हालांकि टैक्स फाइल करने की अवधि के दौरान हर करदाता को महज एक बार यह लाभ मिलता है। इसलिए इस अवसर का अच्छी तरह से इस्तेमाल करें। ऐसे निपटान के योग्य बनने के लिए कई शर्तें हैं। पहली, मामला लंबित होना चाहिए। दूसरी, मुख्य कंपनी या व्यक्ति के लिए संबद्घ रकम कम से कम 10 लाख रुपये होनी चाहिए। सेकंडरी या समूह कंपनियों या लोगों और 'तलाशी और जब्ती मामलोंÓ में यह 50 लाख रुपये हो सकती है। आयोग से संपर्क साधने से पहले करदाता चाहे व्यक्ति हो या कंपनी, उसे आय कर विभाग का मय ब्याज पूरा विवादित कर चुकाना होगा।

करदाता के आयोग से संपर्क करने के 14 दिन के अंदर यह निर्णय लिया जाएगा कि उसके मामले को स्वीकार किया जाएगा या नहीं। मंजूर हो जाने पर इसके समाधान में 18 महीने तक का समय लग सकता है। एक वरिष्ठï अधिकारी ने कहा, 'इससे जुड़े कानूनी मामलों और अदालतों में ऐसे मामलों के निपटारे में कई साल लगने से लोगों ने अब आयोग से संपर्क साधना शुरू कर दिया है। इस तिमाही में हमें पश्चिमी क्षेत्र में 200 से अधिक मामले मिले। देशभर में यह आंकड़ा अधिक ही होगा।Ó

हाल में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता और राज्य सभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने जुर्माने और अभियोजन से मुक्ति के लिए आईटीएससी का दरवाजा खटखटाया था। खबरों में कहा गया था कि गणना में त्रुटि की वजह से सिंघवी की अतिरिक्त आय उनके रिटर्न में नहीं दिखाई गई थी। रिटर्न के बारे में कर विभाग से नोटिस मिलने के बाद सिंघवी ने लगभग 11 करोड़ रुपये की घोषित न की गई इस आय का खुलासा किया और इस रकम पर 3.26 करोड़ रुपये का कर चुकाया। मगर विभाग सिंघवी द्वारा घोषित अतिरिक्त आय से सहमत नहीं हुआ, क्योंकि उसका अपना अनुमान अधिक का है।

अन्स्र्ट एंड यंग में पार्टनर अश्विन पारेख कहते हैं, 'करदाताओं के लिए सबसे अहम है आयकर कानून के तहत जुर्माने और अभियोजन से बचाव के लिए निपटान आयोग की ताकत। यह प्रक्रियाओं को तेजी से अंतिम रूप देता है और इसके ऑर्डर अंतिम और निर्णायक होते हैं।Ó आयकर कानून के तहत लगाया जाने वाला जुर्माना ब्याज के साथ साथ अतिरिक्त आय कर का 100 से 300 फीसदी हो सकता है।

हालांकि मुद्दे को सुलझाने में आयोग को लगभग 18 महीने का समय लग सकता है, लेकिन आकर्षक बात यह है कि मामले से जुड़ी इस अवधि के दौरान करदाता को और अधिक ब्याज नहीं देना पड़ता। हालांकि यदि बाद में यह पता चल जाता है कि करदाता ने आयोग के समक्ष गलत खुलासा किया है तो वह अपने आदेश को वापस ले सकता है। पारेख कहते हैं, 'आयोग अपने आदेश को विफल भी घोषित कर सकता है। ऐसी किसी घोषणा की स्थिति में जुर्माने और अभियोजन के लिए मुहैया कराई गई छूट या आदेश को वापस ले लिया जाएगा।Ó

मुंबई की चार्टर्ड अकाउंटेंसी फर्म बंशी जैन एंड एसोसिएट्ïस में पार्टनर अनुज बी गोलेछा कहते हैं कि कुछ मामलों में निपटान के लिए आवेदन व्यक्तिगत तौर पर (आवेदक या अधिकृत प्रतिनिधि की ओर से) या पंजीकृत पोस्ट के जरिये किए जा सकते हैं। इसमें आवेदन सौंपे जाने की तारीख तक अतिरिक्त कर एवं ब्याज, देय शुल्क के भुगतान का सबूत लगा होना चाहिए। इसके अलावा तय शुल्क (500 रुपये) के भुगतान और आईटीएससी के लिए आवेदन के बारे में संबद्घ आयकर आकलन अधिकारी को सूचित करने जैसी अन्य प्रक्रियाओ को भी पूरा किए जाने की जरूरत होती है। यदि आयोग आवेदन को 14 दिन के अंदर खारिज नहीं करता है तो इसे स्वीकृत मान लिया जाता है। गोलेछा कहते हैं कि संतुष्टï नहीं होने की स्थिति में आयोग आवेदन को ठुकरा सकता है। आवेदन रद्द होने के बाद निपटान के लिए अन्य आवेदन किया जा सकता है।

आपके पक्ष में:

  • आईटीएससी के आदेश पर कभी कभार ही विवाद उठता है
  • आयकर विभाग धोखाधड़ी/गलतबयानी के मामलों को छोड़ कर, आईटीएससी ऑर्डर से संबद्घ अवधि और आय के लिए नोटिस जारी नहीं कर सकता
  • आईटीएससी एसेसी के वर्ष के लिए कर, जुर्माने एवं ब्याज देनदारी के मामले निपटाता है
  • अदालत जाने की तुलना में आईटीएससी में निपटान प्रक्रिया काफी तेज (18 महीने) है
  • आयोग सिर्फ निपटान के मकसद के लिए ही जांच-पड़ताल करता है
  • निपटान प्रक्रियाएं सार्वजनिक नहीं की जाती हैं, असेसी को संबद्घ जानकारियां उजागर करने से नहीं रोका जाता है


आपके खिलाफ:

  • यह सिर्फ एक बार मिलने वाला लाभ है। आईटीएससी से संपर्क तभी करें जब आप सुनिश्चित कर लें कि आपको भविष्य में इस तरह की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा और फिर आपको इस तरह की मदद की जरूरत नहीं पड़ेगी।
  • यदि असेसी गलत पाया जाता  है तो आईटीएससी अपने  ऑर्डर को अमान्य घोषित कर सकता है
  • आईटीएससी के समक्ष मामला ले जाने से पहले आपको पूरे कर एवं ब्याज का भुगतान करना होगा
  • इसकी आशंका बनी रहती है कि आपके मामले को कर एवं ब्याज भुगतान के बाद भी स्वीकार नहीं किया जाए
  • यदि मामले को खारिज कर दिया जाता है तो आयकर विभाग अदालती कार्यवाही के लिए आईटीएससी के समक्ष पेश सभी सूचना का इस्तेमाल कर सकता है


इन शर्तों को करें पूरा:

  • जब चुकाया जाने वाला अतिरिक्त कर 10 लाख रुपये से अधिक हो, तभी आयोग से संपर्क किया जा सकता है
  • 'तलाशी और जब्तीÓ मामलों में अतिरिक्त कर रकम 50 लाख रुपये या इससे अधिक होनी चाहिए
  • सिर्फ उसी मामले को स्वीकार किया जाएगा जो आयकर अधिकारी के समक्ष लंबित हो
  • असेसी को रिटर्न फाइल करनी चाहिए और वह किसी जांच नोटिस के बगैर भी आवेदन कर सकता है

 

Keyword: Income Tax Return, आयकर रिटर्न , CBDT, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, Income Tax Return,,
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