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काली अंधियारी है रात उगेगा सूरज बनेगी बात
आकाश प्रकाश /  July 30, 2013

कंपनियों, बैंकरों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों तक ने अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद छोड़ दी है। लेकिन इस मसले पर विस्तार से अपनी बात रखते हुए आश्वस्त कर रहे हैं आकाश प्रकाश

मैंने अभी-अभी भारत में एक सप्ताह का वक्त बिताया है। इस दौरान मैंने आर्थिक क्षेत्र के तमाम लोगों मसलन, छोटी और बड़ी कंपनियों, बैंकों, उद्योग जगत के विशेषज्ञों और आर्थिक टीकाकारों से मुलाकात कीं। इस दौरान मेरा सामना विविध प्रकार के विचारों से हुआ। एक बात मुझे स्पष्टï नहर आई कि देश की अर्थव्यवस्था गिरावट के एक और चरण में प्रवेश कर रही है। बेहतर मॉनसून हमें कुछ हद तक बचा सकता है लेकिन औद्योगिक उत्पादन से लेकर निजी क्षेत्र के पूंजीगत खर्च तक हालात बद से बदतर होते जाएंगे। हो सकता है हमें सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आंकड़े गत वर्ष के 5 फीसदी से बेहतर स्तर पर नजर आएं लेकिन अगर ऐसा होता है तो वह पूरी तरह बेहतर मॉनसून के चलते अच्छे कृषि उत्पादन की वजह से होगा। अगर कृषि के आंकड़ों को अलग कर दिया जाए तो मेरा मानना है कि वर्ष 2013-14 के जीडीपी विकास के आंकड़े इससे पिछले साल के मुकाबले कमजोर  रहेंगे।

उम्मीद की जा रही थी कि ब्याज दरों में कमी, निवेश चक्र में सुधार तथा निर्यात के हालात में सुधार होने से विकास दर को गति मिलेगी लेकिन दुर्भाग्यवश इनमें से कोई बात सही साबित नहीं हो सकी। एक के बाद एक बैठकों से मुझे यही अनुमान लगा कि आखिरकार अब लोगों ने उम्मीद छोड़ दी है। वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने पद संभालने के बाद पहले छह महीने में जो उत्सुकता जगाई थी वह काफूर हो चुकी है। लोगों को यह अंदाजा हो गया है कि चीजों में सुधार संभव नहीं है।

नीतियों को लागू करने के लिए जरूरी परिस्थितियां नहीं बन पा रही हैं। उद्योगपतियों की नए निवेश में रुचि नहीं रह गई है और मौजूदा लेकिन स्थगित परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए भी उनके अंदर जरूरी आत्मविश्वास नहीं है। पूंजीगत वस्तु निर्माण के क्षेत्र में भी निजी-सार्वजनिक निवेश के संकेत नहीं नजर आ रहे हैं। घरेलू मोर्चे पर नए काम के ऑर्डर की स्थिति निराशाजनक है। यहां तक कि खपत की स्थिति भी अब कमजोर नजर आ रही है और मंदी के संकेत मिलने लगे हैं। अधिकांश लोग इस बात पर सहमत होंगे कि खपत, अर्थव्यवस्था को एक सीमा से अधिक नहीं थाम सकती है।

हर किसी को इस बात का यकीन है कि विकास में आई मंदी को मोटे तौर पर हमने खुद ही न्योता दिया है। हम इसके लिए बाहरी कारकों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। कारोबारियों ने उम्मीद छोड़ दी है और उन्हें नहीं लगता कि अर्थव्यवस्था दोबारा 2003-07 की तरह विकास पथ पर वापसी कर सकेगी।

अधिकांश लोगों ने यह सोचते हुए विकास योजना तैयार की है कि आने वाले कुछ वर्षों के दौरान अधिकतम विकास दर 6 फीसदी रहेगी। लागत कटौती और संपत्ति को तार्किक बनाना उनके एजेंडे में प्रमुख कार्य हैं और विकास कहीं पीछे छूट गया है। ऐसे में जहां इंजीनियरिंग, वाहन कलपुर्जे आदि क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा में सुधार देखने को मिला वहीं अनेक कंपनियां अभी भी रुपये को लेकर शिकायत कर रही हैं। जाहिर है इस अवधि में निर्यात में बढ़ोतरी का कोई तुक नहीं है।

यह शिकायत बरकरार है कि बुनियादी ढांचा, भूमि, श्रम और पूंजी के क्षेत्र में भारत गैर प्रतिस्पर्धी है। ऐसे में नया निवेश कैसे आएगा? कारोबारी जगत का मानना है कि रुपया कमजोर बना रहेगा। सरकार की निर्णय प्रक्रिया में अनिश्चितता शुमार है। इसका ताजातरीन उदाहरण है मायलान की 1.2 अरब डॉलर की खरीद की मंजूरी में की जा रही देरी। ऐसे वक्त में जबकि विदेशी मुद्रा महत्त्वपूर्ण बनी हुई है, हमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का स्वागत करना चाहिए। एक और प्रमुख उदाहरण है खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश। वित्त मंत्री और वित्त मंत्रालय लगातार अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं लेकिन सरकार में कई अन्य लोग हड़बड़ी दिखाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बदलाव होता नजर नहीं आ रहा है।

छोटे और मझोले आकार के उद्यमी कारोबारी परिस्थितियों से तंग आ चुके हैं। दरअसल जब भारत में विकास चरम पर था और सबकुछ पहुंच में नजर आ रहा था उस वक्त 9 फीसदी की विकास दर के साथ सभी कारोबारी उत्साहित थे, अब 5 फीसदी की विकास दर पर वह उत्साह नदारद है। मैं जितने उद्योगपतियों से मिला उन सबने पिछले 18 महीनों के दौरान विदेशों में संपत्ति खरीदी है।

बैंकरों ने बैलेंस शीट पर पड़ रहे दबाव का जिक्र किया और ऋण की गुणवत्ता के लगातार खराब होते जाने का। समूचे तंत्र में आपसी विश्वास और सहयोग का सख्त अभाव नजर आ रहा है। ऐसा लग रहा है कि हम एक बार फिर 70 के दशक में लौट गए हैं। कारोबारी एक बार फिर राष्टï्रीय संसाधनों पर एकाधिकार करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। नौकरशाही ऐसी कोशिशों में लगी नजर आ रही है जिससे वह तय कर सके की कारोबारी जगत में कोई बहुत अधिक कमाई न करने पाए। ऐसे में उद्योग जगत को बढ़ावा देना अधिकांश नियामकों की चिंताओं से बाहर नजर आ रहा है।

अधिकांश लोगों का यह मानना है कि हमें प्रशासनिक व्यवस्था में मूलभूत और ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है। हमारे देश का आकार जितना बड़ा और जटिल है उसे देखते हुए इस समय शासन व्यवस्था की क्षमता भी समुचित नहीं नजर आ रही है। इस मूलभूत सुधार के लिए हमें एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो समस्याओं से सीधा टकराव मोल ले सके। चुनावों में भी किसी निर्णायक बदलाव की उम्मीद बहुत कम है।

संक्षेप में कहा जाए तो माहौल बेहद निराशाजनक है। अनेक लोगों को यह डर है कि देश का भविष्य सुखमय नहीं है। यह भी सच है कि भोर होने के पहले काली अंधेरी रात होती है और यह गहरी निराशा भी ऐसा ही कोई संकेत हो सकती है। यह सच है कि इस समय ऐसी कोई बात नहीं है जिसे लेकर सकारात्मक धारणा बनाई जा सके। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी आबादी एक बहुत बड़ा हिस्सा युवा और आकांक्षाओं-संभावनाओं से भरपूर है। राजनीतिक व्यवस्था को उनकी जरूरतों और इच्छाओं को अंगीकृत करना होगा। हमें व्यवस्था में ऐसे बदलाव करने होंगे जो विकास को वापस लाएं। यह सोचना गलत है कि हम स्थायी रूप से राह भटक चुके हैं।

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