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ऑनलाइन 'रेटिंग' का है यह खेल
प्रियंक शर्मा /  July 21, 2013

अगर आप किसी रेस्तरां में जाने या मोबाइल फोन की खरीदारी से पहले ऑनलाइन रेङ्क्षटंग पर भरोसा करते हैं तो थोड़ा सावधान हो जाइए क्योंकि किसी उत्पाद या सेवाओं को दी जाने वाली रेटिंग में बड़े धड़ल्ले से हेरफेर की जा रही है। यह कैसे हो रहा है, बता रही हैं प्रियंका शर्मा


सोशल मीडिया पर 10 जून को तकरीबन 25 साल उम्र वर्ग के युवाओं का बड़े रोषभरे अंदाज में लिखा गया एक ब्लॉग पोस्ट छा गया। सोशल मीडिया के उस पोस्ट के मुताबिक गुडग़ांव के मशहूर माइक्रोब्रुअरी लेंप ब्रूपब ऐंड किचन में किसी अनाम लेखक और उनके दोस्त के साथ दुव्र्यवहार किया गया और उनका अनुभव बेहद खराब रहा। उस पोस्ट में उस लेखक ने लेंप प्रबंधन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने स्कीम के मुताबिक 'ïहवाइयन ब्रंचÓ नहीं दिया जिसका विज्ञापन उन्होंने एक मशहूर फोरम जोमैटो पर किया था। जोमैटो पर यूजर अपनी पसंद के हिसाब से रेटिंग देते हैं। इसके अलावा उन्होंने इस बात पर भी एतराज जताया कि अधपके खराब खाने के लिए भी ज्यादा पैसे लिए गए। उस युवा समूह ने सोशल मीडिया के जरिये यह संदेश किया कि उस कथित लेखक के साथ लेंप के मालिक और गुडग़ांव पुलिस ने दुव्र्यवहार किया।

कुछ ही मिनट बाद इस ब्लॉग को फेसबुक पर कई लोगों ने साझा किया और इसे दुनिया भर में ट्वीट और रीट्वीट किया गया। ब्लॉग और उसके कमेंट का स्क्रीन शॉट पूरे इंस्टाग्राम और पिनटरेस्ट में छा गया। लेंप ने कुछ दिनों बाद अपनी चुप्पी तोड़ी और यह दावा किया कि उस पब को बदनाम करने की मुहिम छेड़ी गई है। उनका कहना था, 'किसी कंटेंट के पोस्ट करने के एक सेकंड के भीतर ही सैकड़ों लाइक और पोस्ट किसी विशेष मकसद से डिजिटल और सोशल मीडिया एजेंसी द्वारा ही कराया जा सकता है।Ó यह सच भी हो सकता है और नहीं भी लेकिन इस ऑनलाइन सुनामी के एक महीने के बाद उस पब के प्रबंधक का कहना है कि उनके पब के कारोबार पर अच्छा-खासा असर पड़ा है। पहले जोमैटो पर इस पब के लिए यूजरों की रेटिंग 3.5 स्टार थी लेकिन बाद में यह कम होकर 1.3 स्टार रह गई। इस घटनाक्रम से सोशल मीडिया के जरिये उपभोक्ताओं के सशक्तीकरण का एक पहलू नजर आया है।

एक अहम बदलाव यह भी देखने को मिला कि कार, मोबाइल फोन की खरीदारी से होटल की बुकिंग और रेस्तरां आदि के लिए ऑनलाइन समीक्षा और रेटिंग की भूमिका बढऩे लगी। ऑनलाइन रिव्यू और रेटिंग से कइयों के कारोबार को सफलता मिली। लेकिन अब इसका स्याह पहलू और खामियां सामने आ रही हैं। अब यह तस्वीर साफ होने लगी है कि यूजरों द्वारा दी जाने वाली रेटिंग में हेरफेर की जा रही है। अब इसका इस्तेमाल किसी प्रतिद्वंद्वी को मात देने के साथ ही किसी उत्पाद और सेवाओं को बेहतर करार देने के लिए किया जा रहा है। किसी ब्रांड की सोशल मीडिया टीम अब उपभोक्ताओं से जुड़े ऑनलाइन फोरम पर सकारात्मक समीक्षा पोस्ट कर सकती है।

ऐसे में प्रतिद्वंद्वी कंपनी को एक ऐसा रास्ता अख्तियार करना पड़ता है ताकि यह साबित किया जा सके कि दूसरी कंपनी फर्जी तरीके से अपने उत्पादों को बढ़ावा दे रही है।
अब यह नुस्खा राजनेताओं ने भी सीखना शुरू कर दिया है। कुछ दिन पहले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर भी विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उनके आधिकारिक फेसबुक पन्ने पर भी फर्जी 'लाइकÓ के प्रबंधन का आरोप लगाया। गहलोत के फेसबुक पन्ने पर मई महीने में 169,077 लाइक थे जो जून के अंत में 214,639 हो गए। पन्ने को लाइक करने की बढ़ी तादाद की तहकीकात की गई तो पता चला कि इस्तांबुल के कई लोग उन्हें फॉलो कर रहे थे।

गहलोत की पार्टी कांग्रेस ने भी भाजपा पर रेटिंग में हेरफेर करने का आरोप लगाया है। गहलोत ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, 'मुझे इस बात से बड़ी हैरानी हुई कि मैं इस्तांबुल में बेहद मशहूर हूं। मैं कभी तुर्की नहीं गया लेकिन जिसने भी यह विवादास्पद मसला खड़ा किया है, उसकी जांच होनी चाहिए।Ó  विज्ञापन, मीडिया और मार्केटिंग पोर्टल एफैक्स डॉट कॉम के मुख्य कार्याधिकारी प्रसन्न सिंह का कहना है, 'फेसबुक लाइक खरीदना बेहद पुरानी खबर है। कोई भी डिजिटल एजेंसी अपनी हैसियत जानती है और उसे यह अंदाजा है कि उसकी दर क्या है।Ó एक एफएमसीजी कंपनी अपना डिजिटल अभियान शुरू करने का मन बना रही थी। उसने इस काम के लिए एक जनसंपर्क एजेंसी से संपर्क किया। उस एजेंसी ने यह वादा किया कि वह बड़ी तादाद में फेसबुक लाइक की गारंटी दे सकती है।
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उपभोक्ताओं के ऑनलाइन फोरम पर निगरानी रखने या उसके नियमन का कोई स्पष्ट कानून नहीं है। ऐसे में कोई भी यूजर किसी भी कंपनी या संस्था के बारे में भी आपत्तिजनक पोस्ट करने के लिए स्वतंत्र है। मसलन किसी बड़े निजी क्षेत्र के बैंक के बारे में कोई धड़ल्ले से 'वस्र्ट बैंक ऑफ इंडिया....प्लीज स्टे अवे!!Ó या किसी प्रमुख मोबाइल सेवा ऑपरेटर के बारे में 'जस्ट ए चोर कंपनीÓ जैसी टिप्पणी (यह दोनों टिप्पणी माउथशट डॉट कॉम पर पोस्ट की गई है) आसानी से कर दी जाती है।

आजकल बैंकिंग, दूरसंचार, अस्पताल, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसी सभी श्रेणी की कंपनियों पर इसी तरह धावा बोला जा रहा है। इन पर टिप्पणी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती और टिप्पणी का लहजा भी आक्रामक होता है। एक बड़े ऑनलाइन उपभोक्ता मंच माउथशट के करीब 50 लाख पंजीकृत यूजर हैं जहां उत्पादों और सेवाओं की समीक्षा की जाती है। हालांकि वेबसाइट भी हाल में विवादों में घिरी नजर आई। मई में सॉफ्टवेयर सॉल्युशंस मुहैया कराने वाली कंपनी कार टेक्नोलॉजीज ने यह शिकायत दर्ज कराई कि वेबसाइट पर पोस्ट किए जाने वाले रिव्यू आपत्तिजनक हैं। अप्रैल की शुरुआत में बंबई उच्च न्यायालय ने शारदा विश्वविद्यालय के पक्ष में अपना फैसला सुनाया। दरअसल कुछ यूजरों ने इस विश्वविद्यालय की आलोचना करते हुए रिव्यू पोस्ट लिखा था। माउथशट को इन रिव्यू को अपने ऑनलाइन पेज से हटाना पड़ा।

माउथशट के संस्थापक फैसल फारुकी यह स्वीकार करते हैं कि यूजर क्या लिख रहे हैं उस पर निगरानी करना थोड़ा मुश्किल है। वह कहते हैं, 'लेकिन हम यूजरों को एक-दूसरे की रेटिंग करने और सोशल प्रोफाइल बनाने की इजाजत देते हैं। इससे एक तरह की विश्वसनीयता बनती है।Ó वर्ष 2011 में माउथशट की अनुपालन इकाई (कंप्लायंस यूनिट) ने एक आंतरिक चेतावनी जारी की-'140 सकारात्मक रिव्यू फ्लिपकार्ट डॉट कॉम का प्रचार कर रहे हैं।Ó यह चौंका देने वाला आंकड़ा था और इसकी खबर माउथशट के मुंबई मुख्यालय पर भी दी गई। हालांकि फारूकी सीधे तौर पर यह आरोप नहीं लगाते हैं कि फ्लिपकार्ट ने खुद ही यह सब पोस्ट किया है। उनका कहना है कि ये सभी रिव्यू प्रचार के लिए किए गए है और इसे कोई भी लिख सकता है। फ्लिपकार्ट के वरिष्ठ उपाध्यक्ष (मार्केटिंग) रवि वोरा का कहना है कि उनकी कंपनी का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है। रेटिंग की यह हेरफेर असाधारण नहीं है। एक लेखक अपना अनुभव बताते हैं कि उनकी किताब बिक्री के लिए ऑनलाइन उपलब्ध हुई और उसके कुछ ही घंटे के भीतर उसे दो टॉप रेटिंग मिल गई। उनका कहना है, 'जब मैंने प्रकाशक को यह अच्छी खबर सुनाने के लिए फोन किया तो मुझे पता चला कि उस प्रकाशन कंपनी ने खुद ही ये रेटिंग दी थी।Ó कंपनियां अब ऑनलाइन अभियान चलाने के लिए काफी सक्रिय हो गई हैं।
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लूथरा ऐंड लूथरा लॉ ऑफिसेज के प्रबंधन सहयोगी (बौद्घिक संपदा और टेक्नोलॉजी लॉ प्रैक्टिस) मोहित लाहोटी का कहना है कि किसी की झूठी निंदा करना (मानहानि या दोषी बताना) कानूनन अपराध है और यह भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 की धारा 66 ए के तहत आता है। उनके मुताबिक किसी व्यक्तिपरक रिव्यू या रेटिंग के मामले में किसी को झूठा साबित करना मुश्किल है। उनका कहना है कि सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 79 के तहत इस मामले में कोई इंटरमिडियरी वेबसाइट किसी थर्ड पार्टी द्वारा दी जा रही सूचना या डाटा के लिए जिम्मेदार नहीं होगी। इसकी वजह यह है कि यह अपनी वेबसाइट पर साझा सूचनाओं और डाटा का नियंत्रण, संशोधन नहीं करती या उसमें हिस्सा नहीं लेती।

सेवा उद्योग में रेटिंग बेहद अहम हैं। थाई रेस्तरां का मामागोटो चेन चलाने वाले एजूरे हॉस्पिटैलिटी के प्रवर्तक कबीर सूरी का कहना है कि किसी भी ग्राहक की प्रतिक्रिया हमेशा अति के स्तर पर पहुंच जाती है। ऐसे में औसत अनुभव को खराब रेटिंग दी जाती है। इसलिए वह मेहमानों से ही सीधे फॉर्म भरवा कर फीडबैक लेते हैं। बेशक हर जगह अब भीड़ की सक्रियता बढ़ चुकी है।

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