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राजस्थान में अशोक की राह वसुंधरा पाएंगी रोक?
सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  July 19, 2013

अगर लोकप्रियता के लिए कोई पुरस्कार होता तो कांग्रेस नेता और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को वह जरूर मिलना चाहिए। पिछले महीने उन्होंने राजस्थान परिवहन निगम की बसों में यात्रा करने वाली महिलाओं के लिए किराये में 30 फीसदी छूट देने की घोषणा की। सरकार इस योजना के लिए पूरी सब्सिडी देगी और इस मद में रोडवेज को होने वाले 100 करोड़ रुपये के अनुमानित सालाना नुकसान की भरपाई करेगी। इससे पहले सरकार वर्ष 2011 में सभी सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर मुफ्त दवा मुहैया कराने की लोक लुभावन योजना भी शुरू कर चुकी है। यह इतनी कामयाब रही है कि अपने मौजूदा और पूर्व कर्मियों के लिए ऐसी ही योजना चलाने वाले भारतीय सैन्य बल भी अपनी लागत कम करने के लिए इससे सबक ले रहे हैं।

राज्य के किसी भी अस्पताल के ओपीडी खंड में जाइए, आप देखेंगे कि वहां आने वाले मरीजों को अधिकांश जेनेरिक दवाएं मुफ्त मिल रही हैं। राज्य में एक तरह से दवा की दुकानों (केमिस्ट) के अस्तित्व पर सवालिया निशान लग गए हैं। इस योजना की सालाना लागत लगभग 300 करोड़ रुपये है और इससे प्रति दिन 2 लाख मरीजों को मदद मिल रही है। इससे पहले मवेशियों के लिए भी इसी तरह की योजना पेश की गई, जिसे बहुत ज्यादा चर्चा तो नहीं मिली लेकिन वह भी काफी लोकप्रिय रही। मवेशियों के लिए उचित दवाएं हालांकि इंसान के इस्तेमाल वाली दवाओं की तुलना में महंगी हैं। अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि दूध, अंडे जैसे पशु उत्पादों के उत्पादन पर इसका क्या असर होगा? एक मोटा अनुमान यही है कि इसमें तेजी आएगी।

मगर सबसे बड़ी सफलता पेंशन योजना है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाला कोई भी वृद्घ, तलाकशुदा महिला और विकलांग जिनकी उम्र 53 से 58 वर्ष के बीच है, को हर महीने 500 से 1,000 रुपये की पेंशन दिए जाने की प्रक्रिया चालू है। 18 से 60 वर्ष की उम्र के योग्य कामगार इस योजना में बचत के लिए किसी भी वक्त 100 रुपये तक की रकम का योगदान कर सकते हैं। सरकार सेवानिवृत्त खाते में जमा हुई कुल राशि पर 8 फीसदी ब्याज देगी। गहलोत की योजना इस कोष का निवेश किसी नियमित फंड मैनेजर या पेंशन कोष नियामक एवं विकास प्राधिकरण से कराने की है। इन सबसे यही लगता है कि राजस्थान में शायद अतीत का रुझान न दोहराया जाए। राजस्थान में हमेशा सत्ता विरोधी रुझान कायम रहा है। मगर इस साल दिसंबर में विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले आम चुनावों में यह रुझान बदल भी सकता है। 

इससे जाहिर होता है कि गहलोत के लिए हालात कितने बदल गए हैं। छह महीने पहले तक इन सभी योजनाओं के बावजूद उनकी हालत खराब लग रही थी। राष्टï्रीय स्वयंसेवक संघ का वरदहस्त हासिल करने के बाद वसुंधरा राजे लगातार बढ़त बनाती लग रही थीं। मगर पूर्व गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया का सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में नाम आने और दूसरी कई घटनाएं यही संकेत कर रही हैं कि राजस्थानी मतदाता अपनी चुनावी पसंद की फिर से समीक्षा कर रहे हैं। वर्ष 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 200 सदस्यों की विधानसभा में 96 सीटें हासिल कर साधारण बहुमत से 5 सीटें पीछे रह गई थी। कई लोग यही कहते हैं कि गुस्सैल और दबंग विधायकों पर काबू पाने और उन्हें साथ में लेकर सरकार चलाने की कूवत केवल गहलोत में ही है। गहलोत ने बहुजन समाज पार्टी के छह विधायकों का कांग्रेस में विलय कराकर विधानसभा में पार्टी का आंकड़ा बेहतर कर दिया। साथ ही निर्दलीयों के समर्थन से वह आंकड़ों के लिहाज से और सहज स्थिति में आ गए। मगर यह अस्तित्व जोखिमभरा था।

सी पी जोशी, जो मुख्यमंत्री से वैरभाव दिखाने का कोई मौका नहीं चूकते, और उनके समर्थकों के हमले के अलावा गहलोत अपने बच्चों से घिरे मामलों को लेकर हुए विवादों में भी उलझे रहे। कहा जाता है कि  किसी कंपनी के हित में फैसला लेने के बदले उनके बेटे की कानूनी सलाहकार के तौर पर सेवाएं बहाल रखी गईं। इस तरह की चर्चाएं हैं कि एक कंपनी के बेहद जटिल वित्तीय लेनदेन के जरिए गहलोत की बेटी और दामाद को मुंबई में 8 करोड़ रुपये का फ्लैट उपहार में मिला। यह कंपनी सूचीबद्ध भी बताई जाती है। इन मामलों में राजस्थान उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की गई लेकिन न्यायाधीश ने आरोपों को कोई आधार न होने से उसे खारिज कर दिया। यह छह महीने पहले की बात है, जिसके बाद ये आरोप सामने आने लगे।

मगर अब इन लोकलुभावन योजनाओं का असर दिखने लगा है और राजस्थान को यही लगता है कि आखिरकार गहलोत में कुछ बात तो है। गहलोत के लिए आखिरी बाधा जाटों का समर्थन हासिल करना थी, जो दलित नर्स भंवरी देवी के कत्ल के सिलसिले में जेल में बंद जाट नेता महीपाल मदेरणा के साथ हुए सुलूक से नाराज हैं। गहलोत इस मोर्चे पर भी काम कर रहे हैं। एक दिग्गज जाट नेता की पत्नी को हाल में कुलपति नियुक्त किया गया है।

सभी इस पर गौर कर रहे हैं। गहलोत ने संभवत: निजी लोकप्रियता हासिल की हो लेकिन क्या उनके पास यह अधिकार और इच्छाशक्ति है कि वह कांग्रेस के उन 30 फीसदी मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकें, जिन्होंने अपने कार्यकाल में बहुत कम काम किया और जो सत्ता विरोधी लहर के आसानी से शिकार हो सकते हैं? कहना मुिश्कल है। मगर गहलोत कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने की लड़ाई लड़ते दिख रहे हैं। यहां तक कि सरकारी खजाने की कीमत पर भी उनकी कोशिश को पूरे अंक दिए जाने चाहिए। 

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