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बैंकिंग हो थोड़ी आसान तो संवर जाएं कई काम
जैमिनी भगवती /  July 19, 2013

पश्चिमी दुनिया के बैंकिंग जगत की घटनाओं से भारत को एकमात्र सबक यही लेना चाहिए कि बैंकिंग व्यवस्था को जितना सहज और सरल रखा जाए, उतना ही बेहतर। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं जैमिनी भगवती

बैंकिंग मानकों पर ब्रिटेन के संसदीय आयोग की रिपोर्ट (पीसीआर) जून 2013 में जारी की गई। इस रिपोर्ट को 'चेंजिंग बैंकिंग फॉर गुडÓ का शीर्षक दिया गया है जिसका अर्थ है बैंकिंग में अच्छे के लिए बदलाव। इस आलेख में उस रिपोर्ट से जुड़े कुछ निष्कर्षों का जिक्र है जो भारतीय बैंकों के लिए भी उल्लेखनीय हो सकते हैं।

आयोग की रिपोर्ट में सावधानी के साथ यह टिप्पणी की गई है कि बैंकिंग इतिहास का अतीत त्रासद घटनाओं से भरा पड़ा है। ये तमाम त्रासदियां स्वार्थ अथवा आत्मभ्रम की वजह से घटित हुई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वित्तीय जुर्मानों के अभाव अथवा अन्य किसी तरह की रोकथाम की कमी के कारण जवाबदेही की कमी हो गई और इसके साथ-साथ नियामकीय नाकामियों की वजह से बैंकिंग मानकों के स्तर में गिरावट देखने को मिली। रोचक बात यह है कि रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन की सरकार की प्राथमिकताओं में राजनीतिक नियंत्रण समाप्त करने की बात भी शामिल है क्योंकि इससे नियामकों के समक्ष नकदी और परिसंपत्ति का समुचित अनुपात तय करने में मदद मिलेगी।

इस रिपोर्ट में शेयर और परिसंपत्ति अनुपात को सुरक्षित बैंकिंग व्यवस्था की सबसे अहम कड़ी के रूप में चिह्निïत किया गया है जो कि सही भी है। रिपोर्ट यह स्वीकार करती है कि बैंकों को सरकारी गारंटी का लाभ मिलता रहेगा क्योंकि उनका आकार बहुत विशाल और बनावट बहुत जटिल है। उसने अंकेक्षकों की जवाबदेही बढ़ाए जाने की अनुशंसा भी की है। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि इस आयोग के 10 सदस्यों ने, जो दोनों सदनों तथा तमाम राजनीतिक दलों से जुड़े थे, अनुशंसाएं आम सहमति से तैयार कीं। जानकारी के मुताबिक पीसीआर के प्रस्तावों के संदर्भ में चांसलर जॉर्ज ऑसबर्न ने संकेत दिया कि ब्रिटेन का वित्तीय सेवा (बैंकिंग सुधार) विधेयक उन बैंकरों के खिलाफ आपराधिक आरोप दर्ज करने का प्रावधान जोड़ सकता है जो गलत ढंग से काम करते हैं। नियामकों को यह शक्ति भी दी जा सकती है कि वे 10 साल तक बोनस टाल दें।

यूरो क्षेत्र के बैंकों की बात करें तो वे ऋण के बोझ तले दबे हुए हैं जो समूचे यूरो क्षेत्र के जीडीपी के 25 फीसदी के बराबर हो चुका है। इन बैंकों का प्राइस टु बुक अनुपात भी एक से कम हो गया है। समूचे अटलांटिक पार क्षेत्र में यानी अमेरिका में ही यह अनुपात एक से अधिक है क्योंकि अमेरिकी बैंकों का पूंजीकरण अधिक तेजी से हुआ है। बहरहाल, अमेरिका में भी बैंकिंग के सार्वभौमिक मॉडल को लेकर चिंताएं हैं। सीनेट जॉन मैक्केन और एलिजाबेथ वारेन ने हाल में प्रस्ताव रखा है कि ग्लास-स्टीगल एक्ट का संशोधित संस्करण पेशकर निवेश को सामान्य बैंकिंग से अलग कर दिया जाए।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने जून 2013 में अपनी सातवीं छमाही वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के लिए जोखिम दिसंबर 2012 के बाद काफी बढ़ा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत ने जी20/वित्तीय स्थिरता बोर्ड के नेतृत्व वाले बेसिल-तीन, ओटीसी डेरिवेटिव और महत्त्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों में वैश्विक सुधारों को आजमाने की दिशा में स्थिर गति से पहल की है।

आरबीआई की पूंजीगत जरूरतें बेसिल 3 के मुकाबले ज्यादा हैं। बेसिल 3 के 6 फीसदी के मुकाबले आरबीआई ने जोखिमवाली संपत्ति के मुकाबले पहली श्रेणी की पूंजी के लिए 7 फीसदी की दर निर्धारित की है। बैंकों को मार्च 2018 के अंत तक का समय दिया गया है ताकि वे चरणबद्घ तरीके से आरबीआई की जरूरतों को पूरा करें। आरबीआई ने नकदी अनुपात को 4.5 फीसदी कर दिया है जबकि बेसिल कमेटी ने अभी यह मानक तय ही नहीं किया है।

संपत्ति मूल्यों में अतीत में आए उतार-चढ़ाव पर नजर डालें तो पूंजीगत जरूरत का यह स्तर अपर्याप्त लगता है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह देखना है कि संपत्ति और इक्विटी का आकलन किस तरह किया जाता है। उदाहरण के लिए अमेरिका में आमतौर पर स्वीकार्य अंकेक्षण सिद्घांतों (जीएएपी) में यह अनुमति दी जाती है कि परिसंपत्तियों और देनदारियों को डेरिवेटिव पोर्टफोलियो में शामिल न किया जाए क्योंकि इससे कुल संपत्तियों की मात्रा कम हो जाती है। बहरहाल यूरोपीय बैंकों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अंतरराष्टï्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानक (आईएफआरएस) में इसकी इजाजत नहीं होती है। जाहिर है जीएएपी विधि का इस्तेमाल करने में यह जोखिम रहता है कि परिसंपत्तियों का कमतर आकलन हो। इसे इक्विटी और संपत्ति अनुपात बढ़ जाता है। कहने का मतलब यह है कि सटीक आकलन अंकेक्षण के नियमों और व्यवहार पर निर्भर करता है।

भारत में हकीकत यह है कि कई बड़ी परियोजनाएं रुकी हुई हैं और विकास की गति धीमी पड़ी हुई है। इसके लिए तथा अन्य कई वजहों से फंसे हुए कर्ज वाली परिसंपत्तियों और पुनर्गठित परिसंपत्तियों में इजाफा हुआ है। खासतौर पर देश के निजी क्षेत्र के बैंकों में ऐसा हुआ है। ऐसी भी जानकारी है कि सरकारी बैंकों की  पूंजीगत जरूरतें पूरी करने के लिए केंद्र सरकार को तकरीबन 91,000 करोड़ रुपये देने होंगे।

बहरहाल अगर बैंकिंग को सहज और साधारण बनाए रखना है तो भविष्य में आने वाले संकटों का असर सीमित करने का प्रयास किया जाना चाहिए न कि बैंकरों की आलोचना की जाए। जानकारी के मुताबिक आरबीआई को नए बैंकिंग लाइसेंस जारी करने के लिए 26 आवेदन प्राप्त हुए हैं। निजी क्षेत्र के और अधिक बैंकों को मंजूरी देने का एक लक्ष्य यह भी है कि यह किफायत बढ़ाने तथा सब तक बैंकिंग सुविधा पहुंचाने के लिए जरूरी कदम है। भले ही तत्काल नहीं लेकिन आगे चलकर यह संभव है कि नए निजी बैंक जमा का आकार अधिक तेजी से बढ़ाने में सफल होंगे। जहां तक बात सब तक बैंकों की पहुंच बढ़ाने की है तो यह कहा जा सकता है कि नए निजी बैंकों में शायद बड़ी संख्या में छोटे जमाकर्ताओं को सेवा प्रदान करने की काबिलियत न हो। अथवा मुनाफे का स्तर उनको प्रेरित ही नहीं कर पाए।

डाक विभाग ने भी बैंकिंग लाइसेंस का आवेदन किया है। अगर वे किसी सरकारी बैंक के साथ जुड़ते हैं तो उनके लिए इस क्षेत्र में जरूरी विशेषज्ञता हासिल करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। कोई भी सरकारी बैंक सभी डाक कर्मचारियों को समाहित नहीं कर सकता। लेकिन डाक विभाग की पहुंच अपने 150,000 डाक घरों के जरिये बहुत व्यापक है। उसके मुकाबले भारतीय स्टेट बैंक की महज 15,000 शाखाएं हैं।

सकारात्मक ढंग से बात का समापन करें तो उम्मीद है कि नए निजी बैंक अतिरिक्त जमा जुटाएंगे और सब तक बैंकिंग का दायरा बढ़ाएंगे। हमें यह भी सोचना होगा कि कैसे डाक विभाग का इस्तेमाल मौजूदा सरकारी बैंकों के साथ साझेदारी में किया जाए? इसके अलावा हमें सरकारी बैंकों को मजबूत बनाना होगा ताकि वे नए निजी बैंकों से मिलने वाली चुनौती का सामना कर सकें।

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