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खत्म हो जाएगी सस्ती विमानन सेवाओं की पहचान!
जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  July 18, 2013

एयर एशिया अपने विमानन किरायों में 20 से 25 फीसदी की कटौती और हर साल अपने बेड़े में 11 नए विमान जोडऩा चाहती है। वहीं उसकी सबसे बड़ी घरेलू प्रतिद्वंद्वी कंपनी इंडिगो के आदित्य घोष कहते हैं कि वह बाजार में मलेशियाई प्रतिद्वंद्वी के प्रवेश को लेकर परेशान नहीं हैं। मगर ग्राहकों का क्या होगा? बाजार का परंपरावादी तर्क यही कहता है कि उन्हें अधिक से अधिक प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। आखिरकार ग्राहकों के लिए तो यही सही माना जाता है? यह सच है लेकिन एयर एशिया का आसन्न प्रवेश इस बिंदु पर कुछ संदेह पैदा करता है और शायद कुछ अफसोस भी। सेवा उद्योग में किराया एक अहम कारक है, भारतीय विमानन कारोबार में इसकी अहमियत बढ़ती जा रही है, यहां जितना सस्ता है उतना ही बेहतर है।

नागर विमानन महानिदेशालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 में देश के करीब 5.8 करोड़ विमान यात्रियों में से आधे से अधिक ने किफायती विमानन सेवाओं (एलसीसी) के जरिये उड़ान भरी। चूंकि तबसे अर्थव्यवस्था में नरमी आ रही है और खर्च में कमी आई है तो सस्ती विमानन सेवाओं का लगातार विस्तार होने की उम्मीद है। जनवरी से जुलाई के बीच आंकड़ों में इसके संकेत पहले ही दिखने लगे हैं। इस दौरान हवाई सफर करने वाले तकरीबन 3.5 करोड़ घरेलू यात्रियों में से 62.3 फीसदी ने एलसीसी की सेवाएं ही लीं।

इस बाजार में एयर एशिया अपने लिए जगह कैसे बनाएगी, इसकी भविष्यवाणी करना आसान नहीं होगा क्योंकि इस साल किराये पहले ही काफी गिर चुके हैं, जो एलसीसी के बाजार में बढ़ोतरी की वजह भी बताते हैं। मगर एक बात जरूर पूरी निश्चिंतता के साथ कही जा सकती है, वह यह कि इससे सेवाओं के स्तर में तेजी से गिरावट आएगी। जब बिज़नेस स्टैंडर्ड से बातचीत में एयर एशिया के टोनी फर्नांडिस ने बताया कि भारत में कोई असल एलसीसी है ही नहीं तो वह एकदम सही कह रहे थे। इसके पहलुओं को समझने के लिए आपको दूसरे देशों की किफायती विमानन सेवाओं का जायजा भी लेना होगा, जहां उन चीजों के दाम भी चुकाने पड़ते हैं, जिन्हें हम भारत में कुछ समझते ही नहीं। मसलन खिड़की वाली सीट, ज्यादा सामान ले जाने की अनुमति और भी इसके अलावा 'कईÓ ऐसी चीजें होती हैं, जिनके लिए वहां भुगतान करना होता है। 

इसके संकेत पहले ही नजर आ रहे थे। किसी विमान की सीट किसी होटल के बेड की तरह ही है, जिसकी कीमत बाजार से तय होती है। विमानन कंपनी की कुल लागत में 40 फीसदी तक की हिस्सेदारी ईंधन की होती है, जो मुख्यत: प्रबंधन के नियंत्रण से बाहर होता है, जिस पर इस बात का भी फर्क नहीं पड़ता कि आपने कितने वायदा सौदे किए हुए हैं। ऐसे में इन लागतों की भरपाई के लिए सहायक सेवाओं की मदद ली जाती है-इसकी परिभाषा का जितना विस्तार होगा, उतनी ही प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

वैश्विक स्तर पर स्थापित विमानन कंपनियों के कुल राजस्व का लगभग 20 फीसदी सहायक सेवाओं से आता है, जबकि भारत में यह महज 2 से 5 फीसदी है। पहले जहां उड़ान के दौरान भोजन के पैसे टिकट में ही शामिल होते थे, वहीं एलसीसी मुसाफिर भोजन के लिए भुगतान के अभ्यस्त हो गए हैं। यह उतनी बुरी बात नहीं है क्योंकि इससे आप घर में बना खाना ले जा सकते हैं और आप विमान के खाने के भरोसे ही नहीं रहते।

हालांकि इस साल गर्मियों से एलसीसी ने सामान ले जाने की सीमा तय कर दी। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एयर इंडिया ने सबसे पहले मई में सामान ले जाने की सीमा 15 किलोग्राम तय कर दी, उसके बाद इंडिगो और जेटलाइट ने भी यही राह अपनाई और इसके बाद प्रति एक किलोग्राम के हिसाब से 250 रुपये वसूलने लगीं। हालांकि स्पाइसजेट और गोएयर अपने पुराने पैमाने पर ही टिकी हुई हैं। इस नियम ने भारतीयों में हड़कंप मचा दिया क्योंकि वे खासतौर से छुट्टिïयों के दौरान भारी सामान के साथ सफर करते हैं। एक यात्री संघ ने इस चलन के खिलाफ नागरिक विमानन मंत्रालय को एक शिकायती पत्र भी लिखा है लेकिन लगता नहीं कि इसमें ज्यादा बदलाव आएगा। यह भी दिलचस्प है कि शुरुआती दौर की एलसीसी एयर डेक्कन ने भी कुछ इसी तरह की कोशिश की थी लेकिन शिकायतों के बाद उसे सामान ले जाने की सीमा 20 किलोग्राम करनी पड़ी थी। संभवत: यह बाजार में पहला कदम बढ़ाने के नुकसान की अनूठी मिसाल हो।

अब जब हर प्रतिस्पर्धी बाजार (जैसे दूरसंचार) में गठजोड़ वाला चलन उभर रहा है, ऐसे में ग्राहकों को इस सीमा से ताल मिलानी ही पड़ेगी। वास्तव में इंडिगो ने जब इस तरह की सीमा निर्धारित की तो उसकी बाजार हिस्सेदारी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। जल्द ही मुसाफिर सीट के हिसाब से और किसी भी अन्य सहायक सेवा के लिए भी भुगतान करने के लिए तैयार होंगे, जिनके बारे में फर्नांडिस बात कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर अधिकांश सेवा कारोबारों में यही रुझान देखने को मिल रहा है। जैसे-बैंकिंग में चेकबुक सुविधाएं और स्टेटमेंट सेवाओं के लिए शुल्क अदा करना पड़ता है। उस सूरत में भारत की विमानन कंपनियां वैश्विक मानकों पर खरी उतर सकती हैं। भारत में किफायती विमानन सेवा प्रदाताओं के बारे में यही कहा जा सकता है कि सामान्य परिवेश और सक्षमता के मामले में उन्होंने अपना स्तर वैश्विक मानकों से आगे रखा है। भारतीय विमान चालक दल के सदस्यों का मित्रवत व्यवहार और विदेशी कंपनियों के उनके समकक्षों का बेहद औपचारिक व्यवहार अंतर पैदा करता है।

उड़ान के दौरान जितनी कमाई की जाएगी, यात्रियों की शिकायतें उतनी ज्यादा बढ़ती जाएंगी। इसकी गुंजाइश अधिक नजर आ रही है। एयर एशिया इस पर मुहर लगाती है। फेडरेशन ऑफ मलेशियन कंज्यूमर एसोसिएशन ने हाल में ही कहा है कि पिछले साल विमानन कंपनी के खिलाफ 956 शिकायतें दर्ज हुईं जबकि वर्ष 2009 में यह आंकड़ा 870 था। इनमें से अधिकांश का ताल्लुक बढ़ते किरायों और घटते मानकों से थो जो लागत और मूल्य के बीच अंतर की ओर संकेत करता है। घरेलू यात्री निश्चित रूप से कुछ असुविधाओं के साथ ताल मिला लेंगे क्योंकि यात्रा की अवधि बहुत लंबी नहीं होगी लेकिन इससे किफायती विमानन सेवाओं का भारतीय मॉडल अपनी पहचान खो देगा।

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