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कुछ और कदम
संपादकीय /  July 18, 2013

अगर कोई अर्थव्यवस्था विदेशी पूंजी पर निर्भर होने वाली हो तो मूल्यांकन के हिसाब से विदेशी पूंजी का एक स्पष्टï अनुक्रम होता है और उससे संबंधित खतरे भी जाहिर होते हैं। इनमें सबसे जोखिम वाले अल्पावधि के ऋण फंड होते हैं और शायद इनसे थोड़ी ही बेहतर स्थिति संस्थागत इक्विटी निवेशकों की है। वित्तीय बाजारों से धन जरा सी बात पर बाहर निकल सकता है। या फिर केवल रुझान बदलने भर से ऐसा हो सकता है। पिछले सप्ताह की घटनाओं से यह बात स्पष्टï हो चुकी है।

सबसे शीर्ष पर है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) खासतौर पर उन क्षेत्रों में जिनमें प्रतिफल की अवधि लंबी है। यह विदेशी मुद्रा का सबसे वांछित स्वरूप है और उत्पादक संबंधी लाभ तथा तकनीक हस्तांतरण के रूप में इसके परोक्ष लाभ भी हैं। आज भारत भारी भरकम चालू खाता घाटे की भरपाई के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भर है। यह घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 4.8 फीसदी के स्तर तक पहुंच गया है लेकिन इसमें से ज्यादातर मुद्रा अस्थिर है। ऐसे में सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में एफडीआई की सीमा बढ़ाने को समझा जा सकता है और यह कदम स्वागतयोग्य भी है। बुधवार को केंद्रीय मंत्रियों के एक समूह ने यह फैसला लिया कि वे चुनिंदा क्षेत्रों में वैश्विक निवेशकों को विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) की मंजूरी की जरूरत ही नहीं रहने देंगे। जाहिर है सरकारी नियम कायदों में चलने वाला यह बोर्ड एफडीआई को बढ़ावा देने के बजाय उसे नुकसान पहुंचाने का काम अधिक करता है।

घरेलू स्तर पर निराश करने वाले नीतिगत माहौल और वैश्विक स्तर पर नकदी की तंगी के बीच वर्ष 2012-13 में एफडीआई की आवक उससे पिछले साल की तुलना में 38 फीसदी गिरी। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश, विभिन्न वित्तीय समर्थन वाले क्षेत्रों मसलन स्टॉक एक्सचेंज, हाइड्रोकार्बन तथा कुछ कृषि क्षेत्रों समेत अनेक क्षेत्रों को एफआईपीबी की अनुमति से मुक्त कर दिया गया। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों मसलन दूरसंचार में सीमा बढ़ा दी गई। ये वे क्षेत्र थे जहां खासतौर पर कंपनियां विदेशी पूंजी की आवक की उम्मीद कर रही थीं। कुलमिलाकर ये कदम देश की अर्थव्यवस्था को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिहाज से महत्त्वपूर्ण हैं। अगर इनको कुछ साल पहले लागू किया गया होता तो भारत को अब तक इसके लाभ भी मिलने लगे होते।

बहरहाल, अल्पावधि में इनके प्रभाव की अपनी सीमाएं हैं। उदाहरण के लिए ये उपाय रुपये के मूल्य को बढ़ाने की कोशिश में अपनाए गए उपायों की बदौलत बाहरी मोर्चे पर घटती अस्थिरता की भरपाई नहीं कर पाएंगे। न ही इनकी वजह से भारत में निवेश करने वालों में होड़ लग जाएगी। भारत को लंबी अवधि के दौरान थमे हुए विकास को गति प्रदान करने के लिए पूंजी की आवश्यकता है ऐसे में वह धारणा खत्म करनी आवश्यक है। साधारण सी बात यह है कि भारत में लंबी अवधि के निवेश के इच्छुक निवेशकों को आकर्षित कर पाने के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए नीतिगत स्तर पर बड़े बदलाव करना आवश्यक है। लेकिन अल्पावधि में उसे आसान बनाने का सबसे अच्छा तरीका है बीमा और पेंशन सुधारों को आगे बढ़ाना।

सरकार ने बैठक में इसके भी संकेत दिए लेकिन संबंधित कानून संसद में अटका हुआ है। भारतीय जनता पार्टी तकनीकी तौर पर इसका समर्थन करती है। अगर सरकार विदेशी निवेश को लेकर उतनी ही गंभीर है जितनी कि खाद्य सुरक्षा तो वह संबंधित कानून को  अध्यादेश के रूप में पास कर सकती थी और संसद को इस पर चर्चा के लिए विवश कर सकती थी। यह भी देश के भविष्य के लिए उतना ही आवश्यक है।

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