बिजनेस स्टैंडर्ड - आकाश में इंतजार कर रहीं चुनौतियां
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आकाश में इंतजार कर रहीं चुनौतियां
सुरजीत दास गुप्ता... /  07 15, 2013

कई देशों में किफायती विमानन सेवाओं के जरिये लोगों के उड़ान भरने के सपने में कामयाबी के साथ रंग भर चुके टोनी फर्नांडिस क्या भारतीय आकाश में भी दोहरा पाएंगे वही करिश्मा। बता रहे हैं सुरजीत दास गुप्ता...

अक्सर सुर्खियों में छाए रहने वाले एयर एशिया के मीडियाप्रेमी मुखिया टोनी फर्नांडिस विपणन कला के भी माहिर माने जाते हैं। हाल ही में वह पांच दिनों की यात्रा पर भारत आए। उन्होंने अलग-अलग शहर में किस्म-किस्म के बयान दिए। उनकी भारतीय इकाई के सुदर्शन व्यक्तित्व के स्वामी मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) मिट्टïू चांडिल्य भी अपने मुखिया के साथ नजर आए। यहां तक कि दिल्ली के रास्ते में उन्होंने अपने लो-प्रोफाइल भारतीय साझेदार रतन टाटा की तस्वीर भी ट्विटर पर पोस्ट की।

इस दौरान कारोबार को लेकर गंभीर बातें भी हुईं। फर्नांडिस और उनकी मंडली ने दिल्ली में नागर विमानन मंत्री अजित सिंह सहित शीर्ष सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की। साथ ही उन्होंने पहली दफा भारत में अपनी कारोबारी रणनीति की रूपरेखा भी पेश की, जो एक तरह से उनके प्रतिद्वंद्वियों पर सीधे हमले से कम नहीं। फर्नांडिस ने कहा कि भारत में किफायती विमानन सेवाएं (एलसीसी) मुहैया कराने वाली कंपनियां असल में कम किराये वाली सेवाएं नहीं दे रहीं और वह ऐसा करके उन सभी लोगों को विमान सेवाओं से जोड़ेंगे, जिनकी पहुंच से यह अभी तक दूर हैं। निश्चित रूप से कम किरायों को लेकर कंपनियों में जंग होने वाली है।

फर्नांडिस ने यह साफ कर दिया कि वह दिल्ली और मुंबई हवाई अड्डïा संचालकों से नाराज हैं क्योंकि उनके शुल्क बहुत ज्यादा हैं। इस वजह से एयर एशिया देश के दो सबसे बड़े शहरों-दिल्ली और मुंबई के लिए उड़ानें नहीं भर सकेगी। असल में वह चाहते हैं कि सरकार किफायती हवाई अड्डïे बनाए। दिल्ली और मुंबई के लिए उड़ान भरने के बजाय फर्नांडिस कहते हैं कि वह नए संभावनाशील मार्गों को भुनाने की योजना पर काम करेंगे। वह मलेशिया की तरह भारत में भी सहायक सेवाओं से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहते हैं।

मसलन किसी खास सीट के लिए ज्यादा किराया, ज्यादा सामान या दूसरी ऐसी किसी सुविधा के बदले में ज्यादा कमाई। वह इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि एयर एशिया सात से आठ विमानों के साथ शुरुआत कर 57 से 58 फीसदी यात्रियों के दम पर ही मुनाफा कमाने में कामयाब होगी। वहीं भारतीय किफायती विमानन उद्योग में टिकट की 4,000 रुपये की औसत कीमत के साथ कंपनियों को मुनाफा कमाने के लिए 80 फीसदी यात्रियों की दरकार होती है। 

बहरहाल एयर एशिया के भारतीय बाजार में आने से सबसे ज्यादा फायदा मुसाफिरों का होने वाला है। मगर अहम सवाल यही है कि क्या फर्नांडिस अपने वादों को पूरा कर पाएंगे या फिर उनके वादे भोथरे ही साबित होंगे? क्या वह भारतीय बाजार में अपने किफायती विमान सेवा मॉडल की कामयाबी दोहरा पाएंगे जबकि इस कारोबार में लगी दूसरी कंपनियां मुनाफे के लिए तरस रही हैं? अतीत में एयर डेक्कन ने जरूर मुसाफिरों को कुछ हैरतअंगेज कीमतों पर हवाई यात्रा कराई थी लेकिन उस कंपनी को भी हवा होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा, फर्नांडिस ऐसी किसी स्थिति से कैसे निपटेंगे?

मलेशिया में अगर एयर एशिया की कीमतों पर बारीक नजर डालें तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि भारतीय किफायती विमानन सेवा प्रदाताओं की तुलना में उसके किराये काफी कम हैं। विमानन उद्योग में सक्षमता का पैमाने माने जाने वाले लागत प्रति उपलब्ध सीट किलोमीटर (सीएएसके) मानदंड पर वह भारतीय कंपनियों से काफी आगे है। जहां मलेशिया का सीएएसके 2.64 रुपये है तो वहीं भारतीय कंपनियों का सीएएसके 3.60 से 3.70 रुपये के दायरे में है, जो एयर एशिया की तुलना में 30 फीसदी ज्यादा है। हालांकि मलेशिया की तुलना में इंडोनेशिया और थाईलैंड में एयर एशिया की लागत ज्यादा है।

उनके प्रतिद्वंद्वियों का कहना है कि भारत एकदम अलग तरह का बाजार है और यहां पर लागत के मोर्चे पर एयर एशिया को कोई खास फायदा नहीं होने वाला क्योंकि वे खुद लागत को कम करने के लिए हरसंभव उपाय आजमाते हैं। इसलिए अगर फर्नांडिस जिस तरह कम किरायों की धमकी दे रहे हैं, उससे नहीं लगता कि वे कुछ मुनाफा भी बना पाएंगे। प्रतिद्वंद्वी कंपनियों का कहना है कि एयर एशिया को भारत में विमान ईंधन के लिए 40 फीसदी ज्यादा रकम खर्च करनी होगी।

अगर इसे देखें तो मलेशिया में एयर एशिया की कुल लागत का 50 फीसदी हिस्सा विमान ईंधन का होता है, जबकि इस मामले में भारतीय किफायती विमानन सेवा प्रदाता कंपनियों की लागत में ईंधन की हिस्सेदारी 40 से 45 फीसदी के बीच आती है। एयर एशिया के लिए चुनौती सिर्फ विमान ईंधन की ही नहीं है बल्कि उसे कई और चुनौतियों से भी जूझना होगा। जैसे मलेशिया में प्रति यात्री हवाई अड्डïा लागत 150 रुपये आती है जबकि भारत में यह उसकी तुलना में पांच गुना अधिक है।

फायदे की बात
फर्नांडिस को पूरी उम्मीद है कि वह सहायक सेवाओं के जरिये करीब 18 फीसदी राजस्व हासिल करने में सफल होंगे। मलेशिया में उन्हें ऐसा करने में कामयाबी मिली है। यह इस बात के मद्देनजर खास ध्यान आकर्षित करता है कि भारतीय कंपनी के राजस्व में सहायक सेवाओं की हिस्सेदारी महज 1 फीसदी है। इस मामले में एक सरकारी आदेश फर्नांडिस की मदद करेगा, जिसके तहत सरकार ने इन सुविधाओं को मूल किराये से अलग कर उसका निर्धारण करने का फैसला कंपनियों पर छोड़ दिया है।

फिर भी एयर एशिया के मुखिया ने यह ऐलान करके सभी को हैरान कर दिया कि कंपनी मुसाफिरों को 15 किलोग्राम सामान तक साथ ले जाने देगी। उनकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां भी इसी तरह की पेशकश ही करती हैं। यह उनके कारोबारी मॉडल का एकदम विपरीत प्रतिरूप है, जिसमें वह सामान के लिए यात्रियों से अलग से भुगतान लेते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह उन्होंने भारत में सहायक सेवाओं से होने वाली कमाई का एक बड़ा जरिया बंद कर दिया। कमाई की एक और खिड़की तो वह पहले ही बंद कर चुकी है, जब उसने दिल्ली और मुंबई के बीच उड़ानें संचालित करने से इनकार कर दिया क्योंकि इन दोनों शहरों के हवाई अड्डïों पर शुल्क बहुत ज्यादा है। मगर इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि देसी विमानन कारोबार की आधी कमाई इन दोनों शहरों के बीच उड़ानों से ही होती है। यही वजह है कि फर्नांडिस ने भारतीय हवाई अड्डïा प्राधिकरण (एएआई) द्वारा संचालित चेन्नई हवाई अड्डïे को अपना आधार बनाया है।

फर्नांडिस के तर्क में भी दम लगता है। चेन्नई हवाई अड्डïे पर रियल एस्टेट का शुल्क कम है, जिससे वहां विमानों की पार्किंग दिल्ली और मुंबई की तुलना में काफी सस्ती है। फिर भी अधिकांश विश्लेषकों को यही लगता है कि यह रणनीति लंबे समय तक कारगर नहीं होगी। एक विश्लेषक कहते हैं, 'सरकार ने अब चेन्नई हवाई अड्डïे के निजीकरण का फैसला किया है। ऐेसे में निजीकरण के बाद वहां भी हवाई अड्डïा शुल्क दूसरे हवाई अड्डïों के बराबर हो जाएगा और ऐसे में फर्नांडिस बढ़त खो सकते हैं।Ó  इसके साथ ही जानकार यह तर्क भी देते हैं कि शुरुआत में दो प्रमुख बाजारों की अनदेखी कारगर रणनीति हो सकती है लेकिन उन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही ऐसा भी नहीं है कि उनकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियां छोटे शहरों की अनदेखी कर रही हैं। मिसाल के तौर पर देश में 50 ऐसे हवाई अड्डïे हैं, जहां आसानी से जेट विमान उतारा जा सकता है। इनमें से 28 पर इंडिगो उड़ानें संचालित करती है और उसका दायरा बढ़ाने की तैयारी में है जबकि एयर इंडिया पहले से उनमें से अधिकांश शहरों के बीच उड़ानें संचालित करती हैं।

अगर फर्नांडिस कुछ नए केंद्रों पर उड़ानें भरने में कामयाब होते हैं तो शुरुआती दांव चलने का फायदा शायद कुछ महीनों से ज्यादा तक कारगर न रहे। इसलिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। प्रतिस्पर्धी विमानन कंपनियों का कहना है कि जब इंडिगो, स्पाइसजेट और गोएयर तेजी से अपने विमानों का बेड़ा बढ़ा रही हैं, ऐसे में अगर कोई नया रूट उन्हें बहुत फायदेमंद लगता है तो उस पर उड़ानें संचालित करने में उन्हें दो या तीन महीनों से ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। इंडिगो के प्रेसिडेंट आदित्य घोष ने हाल में बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा भी है कि वह एयर एशिया के भारत में प्रवेश पर कड़ी नजर रखे हुए हैं।

होगा बदलाव?
मगर क्या एयर एशिया वितरण का गणित बदल सकता है? कंपनी पहले ही कह चुकी है कि वह टाटा रिटेल आउटलेट्स के साथ गठजोड़ करेगी ताकि ग्राहकों को क्रेडिट और डेबिट कार्ड से भुगतान किए बिना ही आकर्षित किया जा सके। हालांकि यह कोई नया विचार नहीं है। इससे पहले एयर डेक्कन ने रिलायंस कम्युनिकेशंस के साइबर कैफे के साथ गठजोड़ किया था और स्पाइसजेट ने भी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी भारत पेट्रोलियम के साथ ऐसा ही करार किया था लेकिन इससे ग्राहकों की संख्या बढ़ाने में कोई खास फायदा नहीं मिल पाया था।

मलेशिया में एयर एशिया की वितरण रणनीति का एक बड़ा पहलू यही है कि उसने एक्सपीडिया के साथ ऑनलाइन टिकट बेचने का खास अनुबंध किया हुआ है ताकि वह कमीशन लेकर अपना मुनाफा मार्जिन सुधार सके। अंतरराष्टï्रीय उड़ानों के मामले में एयर एशिया ने खुद को भारतीय ट्रैवल पोर्टलों से हटा लिया था लेकिन बाद में उसे इस प्लेटफॉर्म पर आना ही पड़ा। पर्यटन उद्योग के जानकार कहते हैं कि एयर एशिया ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उसे यही महसूस हुआ कि भारतीय बाजार में ट्रैवल पोर्टलों का काफी दबदबा है और इस लिहाज से उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसीलिए वह मेकमाईट्रिप डॉट कॉम जैसी साइटों पर वापस लौटी है।

टै्रवल जानकारों का कहना है कि इस पर यकीन करना मुश्किल होगा कि कंपनी देसी बाजार में भी उन्हें नजरअंदाज कर सकती है क्योंकि यहां भी उनका खासा वर्चस्व है। फिलहाल यही संकेत मिल रहे हैं कि घरेलू कारोबार में भी एयर एशिया उनका सहारा लेगी। मीडिया के साथ हालिया बातचीत में फर्नांडिस ने अपने सहयोगी टाटा की ओर संकेत करते हुए उन्होंने कहा कि वह विमानन कारोबार में 'नैनोÓ कीमतों का दौर चाहते हैं।

मगर उन्हें यह अवश्य याद रखना होगा कि बहुप्रचारित लखटकिया कार कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी से 1 लाख रुपये की कीमत के वादे से काफी ऊपर चली गई और कार बाजार में उसकी उतनी पकड़ भी नहीं बना पाई। फर्नांडिस के सामने आकाश में ऐसी ही चुनौती इंतजार कर रही है।

क्या होगा एयर एशिया का दांव
विमान बेड़ों के संचालन में फर्नांडिस का कोई सानी नहीं है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले में वह देसी कंपनियों से आगे नजर आते हैं, जो उन्हें उन पर कुछ बढ़त दे सकता है। एयर एशिया का एक विमान रोजाना 12 घंटे उड़ान भरता है। हर एक विमान के हिस्से में प्रतिदिन छह उड़ाने आती हैं और वे 25 मिनट के विश्राम के बाद फिर से उड़ानें भरते हैं। निश्चित रूप से ये अच्छे आंकड़े हैं लेकिन इससे फर्नांडिस को कोई खास फायदा नहीं मिलेगा क्योंकि भारत की सबसे बड़ी किफायती विमानन सेवा प्रदाता कंपनी इंडिगो भी कमोबेश ऐसा ही करती है। क्या फर्नांडिस कर्मचारियों की लागत में कुछ कमी कर पाएंगे? आखिरकार भारतीय किफायती विमानन सेवा प्रदाता कंपनियों का कर्मचारियों पर होने वाला खर्च कुल लागत का 7 से 8 फीसदी बैठता है। कर्मचारियों पर लागत में कटौती मुश्किल लगती है, खासतौर से शुरुआत में कुछ वक्त के लिए तो ऐसा किया ही नहीं जा सकता।

अगर विमानन उद्योग से मिली जानकारियों पर यकीन करें तो फर्नांडिस पायलटों को 4 लाख रुपये प्रति माह से ज्यादा तनख्वाह देते हैं। भारतीय कंपनियां भी लगभग इसी दायरे में वेतन देती हैं। सैद्घांतिक रूप से वह अपने कर्मियों से ज्यादा से ज्यादा काम कराकर उत्पादकता बढ़ा सकते हैं। मगर भारत में पायलट और विमान चालक दल के सदस्यों के कामकाज की अवधि सरकार तय करती है। इसलिए पायलट और चालक दल के सदस्य रोजाना 11 घंटों से ज्यादा काम नहीं कर सकते, जिनमें से आठ घंटे तो उड़ान में ही बीतते हैं। यह नियम फर्नांडिस पर भी उसी तरह से लागू होगा। मगर एक मामले में फर्नांडिस को भारतीय कंपनियों पर निश्चित बढ़त हासिल है। यह है विमानों के मालिकाना हक का।

भारतीय कंपनियां जहां पट्टïे पर विमान लेकर काम करती हैं, वहीं फर्नांडिस विमान खरीदते हैं। मगर भारतीय कंपनियों का कहना है कि बात जब कुल लागत की आती है तो यह बहुत बड़ा फायदा नहीं दिखता। एक भारतीय विमानन कंपनी के वरिष्ठï अधिकारी कहते हैं, 'हमारी तुलना में उनकी 2 से 3 फीसदी बचत ज्यादा हो जाएगी। मगर एक बात तय है कि जो कंपनियां विमान खरीदती हैं, उन्हें सुधार और रखरखाव के लिए एकमुश्त भारी राशि चुकानी पड़ती है, जो अमूमन चार से छह वर्षों के बाद 15 से 20 लाख डॉलर तक पहुंच जाती है। हमारे लिए यह लागत पट्टïे की पूरी अवधि के दौरान विस्तारित हो जाती है।Ó

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