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'फिलहाल 1991 जैसे ही हैं हालात'
संजय जोग और अभिजीत लेले /  July 11, 2013

वित्तीय मामलों पर संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा भविष्य की चेतावनी देते हुए कहते हैं कि सरकार को लोकलुभावन उपायों से बाज आकर राजकोषीय घाटा कम करने के लिए सख्त कदम उठाना चाहिए। संजय जोग और अभिजीत लेले को दिए गए साक्षात्कार में यशवंत सिन्हा ने निवेश जुटाने के मकसद से की जा रही मौजूदा वित्त मंत्री की विदेश यात्रा पर संदेह जताया।

भारतीय अर्थव्यवस्था का परिदृश्य कैसा लगता है?
ऐसा नहीं हो सकता है कि हम उदारता का फायदा भी उठाएं और अर्थव्यवस्था की सेहत पर असर भी नहीं पड़े। चार सालों तक राजकोषीय घाटा और पिछले एक साल में चालू खाता घाटा बढऩे से चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं। दुनिया की नजर हम पर है। इस वक्त हालात कुछ ऐसे हैं जैसे किसी के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो गई हो और ऐसे में किसी बीमारी का जीवाणु शरीर को बड़ी आसानी से नुकसान पहुंचा सकता है। आज जो हालात हैं कुछ ऐसे ही हालात वर्ष 1991 में भी थे। जब तक हम अपनी प्रतिरोधक क्षमता में सुधार नहीं करते तब तक हम हालात बेहतर नहीं कर सकते हैं। वित्तीय मामलों पर संसद की स्थायी समिति जुलाई के तीसरे हफ्ते में अर्थव्यवस्था की समीक्षा करेगी।

हाल के हफ्ते में डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में चिंतनीय स्तर तक की गिरावट देखी गई। वर्ष 1991 के संकट से पहले के हालात की तुलना आप मौजूदा स्थिति से कैसे करेंगे?
जब भी रुपये के भाव में गिरावट आती है तो उसमें उसी स्तर पर वापस जाने की प्रवृति होती है। हालांकि इससे अस्थायी तौर पर फायदा मिलता है लेकिन मूल परेशानी बरकरार रहती है। वर्ष 1991 से पहले अर्थव्यवस्था पर खाड़ी युद्ध का असर पड़ा। फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के उपाय हो रहे हैं और इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर भी देखने को मिल रहा है। मुश्किल की बात यह है कि जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन बेहतर नहीं होता तब भी हमारी हालत बुरी होती है और जब वहां की अर्थव्यवस्था तरक्की करती है तब हमें और भी ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

रुपये में भारी गिरावट को देखते हुए क्या सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को सीधे तौर पर कोई कदम उठाना चाहिए?
बड़े पैमाने पर चालू खाता घाटे की समस्या के साथ ही एक दिक्कत यह भी है कि विदेश से ऐसी पूंजी बाजार में आ रही है जो कभी भी निकल सकती है। विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) या दूसरे निवेशक उस बाजार का रुख करेंगे जहां बेहतर प्रतिफल मिलने की संभावना बनेगी। एफआईआई शेयर के साथ ही डेट श्रेणी में भी बिकवाली करते हैं।  आरबीआई और सरकार बाजार से मुकाबला नहीं कर सकते। वे बाजार की अनिश्चितता को कम करने के लिए हस्तक्षेप कर सकते हैं। बाजार से मुकाबला करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि मुद्रा भंडार खर्च करके भी मनमाफिक नतीजे नहीं लाए जा सकते। इसके बदले सरकार को अर्थव्यवस्था की प्रतिरोधक क्षमता को बरकरार रखने के लिए लंबी अवधि के कदम उठाने चाहिए। किसी अजनबी के उपकार और दान पर निर्भर रहना सबसे बड़ी गलती है। फिलहाल वित्त मंत्री और वाïिणज्य मंत्री दोनों ही अमेरिका में निवेश आकर्षित करने के मकसद से गए हैं। निवेशक हमेशा लंबी अवधि के मुनाफे पर ध्यान देते हैं। जब उन्हें हालात स्थिर दिखेंगे तभी वे निवेश करेंगे। बाजार की स्थिरता, लंबी अवधि का मुनाफा और कारोबार के लिए अनुकूल माहौल निवेशकों को आश्वस्त करने के लिए जरूरी होता है।

सरकार ने निवेशकों को आमंत्रित करने के मकसद से मंत्रियों को विदेश भेजा है। क्या इस तरह के कदम से कुछ हो पाएगा?
मेरे ख्याल से आप कितने भी विदेशी दौरे कर लें यह निवेश आकर्षित करने के लिए काफी नहीं होगा। यह एक आत्मविश्वास का
संकट है।

खाद्य सुरक्षा विधेयक का राजकोषीय सेहत पर क्या असर पड़ेगा?
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधार के लिए कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई है। वह लोकलुभावन उपायों को बढ़ावा देने में आगे रहे जिसकी वजह से राजकोष की यह हालत
हुई है।

घाटे को कम करने और अर्थव्यवस्था की हालत में सुधार के लिए कौन से उपाय करने की जरुरत होगी?
सख्त फैसले करने की जरुरत है। मसलन राजकोषीय दायित्व कानून (एफआरबीएम) पर अमल करना और राजकोषीय घाटे को कम कर सकल घरेलू उत्पाद के तीन फीसदी के स्तर पर लाने और उसे उसी स्तर पर बरकरार रखने की जरुरत है। यह सुनिश्चित करना जरुरी है कि सारे खर्च उत्पादन के मकसद से किए जाएं ना कि उपभोग की जरुरतों को पूरा करने के लिए। सरकार को बुनियादी ढांचे मसलन बंदरगाह, ऊर्जा, रेलवे और सड़क में निवेश करना चाहिए।

साल 2008 के वित्तीय संकट के बाद सरकार ने खर्च को बढ़ाया जो पूरी तरह से उपभोग पर आधारित था। इससे बड़े पैमाने पर राजकोषीय घाटे में तेजी आई। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के कार्यकाल के दौरान रोजगार सृजन हुआ और इसकी वजह बुनियादी ढांचा और लंबी अवधि की योजनाओं में किया गया निवेश था। अब सरकार की खाद्य सुरक्षा योजना को ही लें। आप लोगों को सिर्फ बिठाकर खाना खिलाएंगे तो यह भविष्य के लिए सही नहीं होगा। इसके बजाय यह बेहतर होगा कि लोगों को परियोजनाओं में काम करने का मौका दें ताकि उनके पास पैसे आएं जिन्हें वे खर्च कर सकें।

वर्ष 1991 के मुकाबले अब बाजार की भूमिका ज्यादा प्रभावी हो गई है। बाहरी मोर्चे पर हमारी स्थिति बेहद नाजुक है। हालांकि हमारा विदेशी मुद्रा भंडार वर्ष 1991 के मुकाबले बेहतर स्थिति में है। वर्ष 1991 के संकट के वक्त सरकार के पास हालात से निबटने के लिए उपाय के कई साधन थे। लेकिन आज बाजार ही सब कुछ तय करेगा सरकार नहीं।

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