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बैंकिंग लाइसेंस मिलने से सूचीबद्ध मूल कंपनियों का बढ़ेगा मूल्यांकन
देवांग्शु दत्ता /  July 07, 2013

नए बैंकिंग लाइसेंस जारी करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कड़ी शर्तें तय की हैं। आवेदक का पूंजी आधार कम से कम 500 करोड़ रुपये होना चाहिए और शेयरधारिता में विविधता होनी चाहिए। ऊंची शुद्ध परिसंपत्ति के साथ आवेदक का पिछले 10 साल का रिकॉर्ड दुरुस्त होना चाहिए। आवेदक को आरबीआई के पास तत्काल कुल जमा का 4 प्रतिशत सांविधिक भंडार के तौर पर जमा करना होगा और पहले ही दिन से सरकारी बॉन्ड में 23 प्रतिशत हिस्सेदारी रखनी होगी। नए बैंकों को हरेक चार शाखाओं में एक शाखा ग्रामीण क्षेत्रों में खोलनी होगी।

इसके साथ ही तीन साल के अंदर उन्हें प्राथमिक क्षेत्र को 40 प्रतिशत कर्ज आवंटन का लक्ष्य प्राप्त करना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में शाखा खोलने की अनिवार्यता पहले जैसी कठिन नहीं रह गई है। ग्रामीण क्षेत्रों का तेजी से विकास हो रहा है, लेकिन प्राथमिक क्षेत्र को ऋण आवंटन मुनाफे के लिहाज से मुश्किलों भरा रहा है। जिन 26 इकाइयों ने बैंकिंग लाइसेंस के लिए आवेदन किए हैं, उनमें कई ब्रोकरेज हैं।

इसका मतलब हुआ था कि वे हाई मार्जिन, हाई-रिस्क कर्जदाता हैं। अगर उनकी कम ब्याज वाली खुदरा जमा तक पहुंच हुई तो उनका अधिक विस्तार हो सकता है। कुछ आवेदकों की वाहन के लिए वित्त मुहैया करने वाले खंड में अधिक उपस्थिति है। एक अन्य खंड सोने के बदले ऋण देने का है, जो मुथूट फाइनैंस जैसी कंपनी के लिए अहम है।

हाल में ही हमने देखा है कि ये खंड कितने जोखिम भरे साबित हुए हैं। मार्जिन कॉल ब्रोकरेज कंपनियों का सत्यानाश कर सकती है तो दूसरी तरफ व्यावसायिक वाहन ऋण खंड में कारोबार कम हुआ है और आर्थिक हालत बिगडऩे पर इनकी हालत खस्ता हो सकती है। इसी तरह, सोने की कीमतें घटने से सोने के बदले ऋण देेने वाली कंपनियों की हालत खस्ता हो सकती है। मौजूदा बैंकों की भी इन खंडों में उपस्थिति है। हालांकि इनके प्रतिभूति कारोबार अलग कर दिए गए हैं। वाहन वित्त और सोने के बदले ऋण कारोबार खंड अपेक्षाकृत छोटे हैं। नई इकाइयों को व्यावसायिक बैंकिंग कुशलता विकसित करने के साथ ही दूसरे गुण भी सीखने होंगे। सरकारी क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले दो आवदेकों में भारतीय डाक के लिए शाखा तंत्र विकसित करने का काम आसान होगा, साथ ही सस्ती खुदरा जमा तक भी पहुंच आसान होगी। यह पूरी तरह सरकार नियंत्रित है। इसकी शुद्ध परिसंपत्ति मालूम नहीं है, इसलिए मौजूदा पोर्टफोलियो के बारे में भी कुछ कहा नहीं जा सकता है। दूसरी सरकारी इकाई टूरिज्म फ ाइनैंस कमीशन ने भी आवेदन किया है। यह पूंजी आधार आवश्यकता पूरी नहीं करती है और इसके पास अनुभव भी उतना नहीं है।

तीसरी सरकारी कंपनी आईएफसीआई के प्रदर्शन का रिकॉर्ड खस्ता रहा है और इसके परिसंपत्ति पोर्टफोलियो की गुणवत्ता भी ठीक नहीं है। बड़े औद्योगिक समूह जैसे आदित्य बिड़ला, टाटा सन्स, वीडियोकॉन, एलऐंडटी और रिलायंस कैपिटल शुद्ध परिसंपत्ति और पूंजी अनिवार्यता पूर कर लेंगे। आईडीएफसी और एलआईसी हाउसिंग फाइनैंस कॉर्पोरेशन दो अन्य आवेदक हैं। इन सभी को वित्तीय खंड का कुछ अनुभव है।

आरबीआई ने खासी सतर्कता बरती है। यह अनिश्चितकाल के लिए आवेदन विचाराधीन रख सकता है। संभव है कि यह गंभीरता पूर्वक विचार करने के बाद काफी कम आवेदकों को लाइसेंस जारी कर सकता है। ब्रोकरेज और एनबीएफसी के साथ अधिक जोखिम जुड़े होते हैं, इसलिए इन्हें लाइसेंस देने से पहले आरबीआई तंत्र से जोखिम पर जरूर विचार करेगा।

आखिर लाइसेंस जारी होने के बाद बाजार की प्रतिक्रिया कैसी होगी? एक कारोबारी के तौर पर मुझे लगता है कि विभिन्न सूचीबद्ध मातृ कंपनियों के शेयरों में उछाल आएगी। लेकिन ऐसा होने में कई महीने लग सकते हैं। लाइसेंस प्राप्त नए बैंकों सहित पूरे बैंकिंग क्षेत्र को बेसल 3 दिशानिर्देशों की पूर्ति के लिए अगले चार साल के दौरान बड़े स्तर पर टीयर-1 पूंजी जुटाने की जरूरत होगी। यानी इससे पूंजी आधार बढ़ेगा। सिद्धांत तौर पर इससे मूल्यांकन में कमी आना चाहिए।

एफपीओ और डिबेंचर निर्गम तभी सफल होंगे, जब यह मजबूत पूंजी आधार वाली इकाइयों की ओर से जारी होंगे। कम मूल्यांकन वाले सरकारी बैंकों और ऊंचे मूल्यांकन वाले निजी बैंकों के बीच अंतर बढ़ सकता है। पूंजी आधार बरकरार रखने में आरबीआई संतुलित भूमिका निभाता है। हालांकि यह राजनीतिक अंतर पाटने में नाकाम रह सकता है। सहकारी इकाइयां आरबीआई के पूर्ण नियंत्रण में नहीं आती हैं। बैंकिंग क्षेत्र में जितने घोटाले हुए हैं उनका ज्यादातर दूसरा पहलू भी होता है। 

बैंकिंग क्षेत्र की विकास दरी कमजोर रह सकती है, साथ ही ऋण पुनर्संरचना और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में भी इजाफा हो सकता है। ब्याज दरों में क मी हुई और आर्थिक हालात सुधरे तो बैंकिंग क्षेत्र को उबरने में मदद मिल सकती है। कुल मिलाकर निजी बैंकों का प्रदर्शन सरकारी बैंकों की तुलना में बेहतर रहना चाहिए। हालांकि कमजोर कारोबार कर रहे सार्वजनिक क्षेत्र के शेयरों पर दांव खेला सकता है। बैंकिंग क्षेत्र की हालत सुधरने पर बड़े सरकारी बैंकों के शेयर अच्छे प्रतिफल दे सकते हैं।

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