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चिटफंड मामले में नियामक की कठिन डगर
नम्रता आचार्य / कोलकाता June 30, 2013

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के लिए पश्चिम बंगाल में अवैध रूप से पैसा जुटा रही कंपनियों पर शिकंजा कसना मुश्किल साबित हो रहा है, यहां तक कि सारदा घोटाले से उठी शिकायतों का अभी तक निपटारा नहीं हो सका है। बीते एक साल के दौरान सेबी ने जमा लेने वाली इकाइयों के खिलाफ कम से कम चार आदेश जारी किए। हालांकि रकम जमा करने के कारोबार पर कम से कागजों पर कोई असर नहीं पड़ा है। सेबी के मुताबिक पैसा जमा करने का असंगठित बाजार अपनी जड़ें जमा चुका है और कुछ कंपनियां तो नियमित तौर पर अपने जमाकर्ताओं को पासबुक भी जारी कर रही हैं।

सेबी अधिकारियों के मुताबिक कंपनियां सेबी के आदेशों के खिलाफ कानूनी मामले लडऩे के लिए बड़ी संख्या में एजेंटों की रणनीति पर अमल कर रही हैं, जो दूरदराज के जिलों में भी हैं। इस प्रक्रिया में कंपनियां सेबी के आदेशों पर स्थानीय जिला अदालतों में एकतरफा स्थगनादेश हासिल करने में भी कामयाब हो रही हैं, जो ऐसी कंपनियों का परिचालन रोकने में सबसे बड़ी बाधा साबित हो रही है।

सेबी के एक अधिकारी ने कहा, 'इन कंपनियों की रणनीति दूरदराज के स्थानों में फौजदारी के मामले दायर करने और हमारी गैरमौजूदगी में एकतरफा अंतरिम फैसला करवाने की है। कई बार हमारे लिए ऐसे स्थानों पर अपना प्रतिनिधि भेजना मुश्किल होता है। कई मामलों में ये कंपनियां बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका के नुकसान होने की वजह बताकर आसानी से स्थगनादेश हासिल कर लेती हैं। कार्रवाई में सुस्ती की यही वजह है।Ó

उदाहरण के लिए एमपीएस ग्रीनरी के मामले में कंपनी ने सेबी द्वारा दायर 12 मामलों में आठ में अंतरिम आदेश हासिल कर लिए। सेबी के एक अधिकारी ने कहा कि बाजार नियामक छह मामलों में आदेशों को खारिज कराने में सफल रहा, जबकि दो मामलों में जिला अदालतों में मुकदमा चल रहा है।

एमपीएस सागौन, कृषि और पौधरोपण बॉन्डों जैसे दीर्घकालिक उत्पादों के लिए सामूहिक जमा योजनाओं (सीआईएस) के तहत पैसा जुटा रही है। बीते साल सेबी ने कंपनी को सार्वजनिक क्षेत्र के एक बैंक के ऐस्क्रो खाते में 1,169.39 करोड़ रुपये जमा करने और योजनाओं को बंद करने के लिए कहा था।

एमपीएस ग्रीनरी के चेयरमैन पी मन्ना ने कहा, 'हमारे पास सीआईएस योजनाएं चलाने के लिए अनंतिम पंजीकरण और अदालत का आदेश है।Ó सेबी के अधिकारी ने कहा, 'गुमराह करके जमा लेने वाली कंपनियों को चिह्नित करने में सबसे बड़़ी दिक्कत यह आती है कि हमें पहले जमा कराने के तरीके की पहचान करनी होती है। कुछ मामलों में ये सावधि जमा करा रही हैं। कुछ कंपनियां तो जमाकर्ताओं को पासबुक भी जारी कर रही हैं। रिजर्व बैंक का कहना है कि इन कंपनियों ने गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के रूप में पंजीकरण नहीं कराया है, इसलिए वे उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आतीं। अगर हम पुलिस के पास जाते हैं तो हमसे पूछा जाता है कि इनके खिलाफ शिकायत किसने दर्ज कराई है?Ó

ज्यादातर कंपनियों ने अज्ञात रियल एस्टेट कंपनियोंं या होटल के कमरे की बुकिंग के एवज में पैसे जमा कराया है। कंपनियां तीन विकल्प देती हैं- सावधि जमा, मासिक ब्याज योजना और आवर्ती जमा योजना। इसमें ब्याज की दरों का जिक्र नहीं होता, सिर्फ 5 साल की अवधि मेंं धन को दोगुना करने का वादा होता है। सारदा संकट के बाद से नियामक ने एमपीएस और रोज वैली के खिलाफ विज्ञापन दिया था, जिसमें इन कंपनियों की योजनाओं के प्रति लोगों को सावधान रहने को कहा गया था। संकट के बाद इन योजनाओं के निवेशक जमा किए गए धन की वापसी की मांग कर रहे हैं।

उदाहरण के लिए तृण राय ने मासिक निवेश योजना के तहत 5 साल के लिए एमपीएस मेंं 3000 रुपये प्रति महीना निवेश करते हैं। इस योजना में 1 साल तक पैसे जमा करने के बाद अब राय चाहते हैं कि वे योजना से पैसे निकाल लें। बहरहाल कंपनी के एजेंट ने सूचित किया है कि सीआईएस योजना में पहले धन निकासी का कोई प्रावधान नहीं है। 

मन्ना ने कहा, 'सीआईएस योजना में पहले धन निकालने का कोई प्रावधान नहीं है, हमने इस तरह की योजनाओं से एकत्र 90 प्रतिशत धन का निवेश पहले ही विभिन्न योजनाओं में कर दिया है।Ó मन्ना ने कहा कि एमपीएस की विभिन्न योजनाओं के जरिये कुल करीब 1600 करोड़ रुपये की देनदारी है।

21 जून 2013 को सेबी ने अलकेमिस्ट इन्फ्रा रियल्टी के खिलाफ एक आदेश दिया था और कहा था कि वह जमा संबंधी सभी गतिविधियों पर रोक लगाए और निवेशकों से इकट्ठा किया गया धन वापस करे, जो करीब 1000 करोड़ रुपये है। इसके लिए सेबी ने कंपनी को 3 महीने का वक्त दिया। कंपनी के एक एजेंट के मुताबिक कंपनी ने अब तक धन की किसी तरह की वापसी शुरू नहीं की है, क्योंकि मामला न्यायालय के अधीन है। अलकेमिस्ट अपनी टाउनशिप परियोजना की बुकिंग के लिए पैसे जमा करा रही थी।

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