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चिट फंड कंपनियों की नई बिसात
संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली June 24, 2013

पश्चिम बंगाल में सारदा चिट फंड घोटाला सामने आने के बाद जब वहां की सरकार और दूसरे राज्यों की सरकारों ने ऐसी कंपनियों पर सख्ती बरतनी शुरू की तो धंधा चलाने के लिए उन्होंने दूसरा रास्ता तलाश लिया। उन्होंने सहकारी समिति का लबादा ओढऩे की कोशिश की। इसीलिए सारदा घोटाला सामने आने के बाद सहकारी समितियों के पंजीकरण के लिए अर्जियों की बाढ़ आ गई। इनमें से ज्यादातर कर्ज का काम करना चाहती थीं। बस... यहीं पर सरकार के कान खड़े हो गए।
सरकार को लगा कि सारदा कांड के बाद सख्ती से परेशान चिट फंड कंपनियां ही सहकारी समिति की शक्ल में अपना काम फिर शुरू करना चाहती हैं। मजे की बात है कि पंजीकरण के लिए जो अर्जियां आई थीं, उनमें से एक पश्चिम बंगाल से ही थी और अपनी समिति का नाम मां सारदा एग्रो मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी लिमिटेड रखना चाहती थी। इसे देखकर सरकार ने ऐसी अर्जियों पर लगाम कसना शुरू कर दी।

कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठï अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय के सहकार विभाग के पास मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसायटी अधिनियम के तहत पंजीकरण के लिए बड़ी तादाद में आवेदन आ रहे हैं। नवंबर में तो एक ही दिन में करीब 100 अर्जियां पहुंच गईं, जबकि आम दिनों में रोजाना 1-2 अर्जियां ही मिलती हैं। उन 100 अर्जियों में भी करीब 80 फीसदी ऋण सहकारी समिति बनाने के लिए थीं।

इसमें किसी झोल की बू सूंघकर विभाग ने जांच के आदेश दिए। उसे यह जानकार हैरानी हुई कि अवैध चिट फंड कंपनियां ही सहकारी ऋण समितियों का मुखौटा पहनना चाहती थीं। अधिकारी ने बताया, 'इस प्रावधान ने चिट फंड और मनी सर्कुलेशन कंपनियों के लिए ऋण सहकारी समिति का चोला ओढऩा आसान कर दिया क्योंकि उनका काम का तरीका भी बिल्कुल ऐसा ही होता है।Ó

चिंतित विभाग ने सभी आवेदकों से उन राज्य सरकारों से अनापत्ति प्रमाण पत्र लाने को कहा, जहां वे परिचालन करने की योजना बना रहे थे। विभाग ने सभी राज्यों के सहकारी पंजीयक को मौजूदा सहकारी समितियों, खास तौर पर ऋण वितरण से जुड़ी समितियों के कारोबारी मॉडल की जांच करने को कहा है। उन्होंने कहा कि सरकार खासतौर पर ऋण सहकारी समितियों पर सख्ती बरत रही है और अन्य सहकारी समितियों को चिंता करने की जरूरत नहीं है।

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