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गरीबी, झंझट, मुसीबत हजार... मगर नन्हे-मुन्ने छापते अपना अखबार
सुशील मिश्र / मुंबई June 23, 2013

बाजारवाद में अखबार निकालना बच्चों का खेल नहीं है लेकिन गरीब, अनाथ और फुटपाथ के बच्चों के लिए तो अखबार निकालना मानो बच्चों का खेल जैसा ही हो गया है। झोपड-पट्टी और सड़कों के किनारे रहने वाले गरीब एवं अनाथ बच्चे करीब 15 साल से हर महीने 'हमारा अखबारÓ निकालते हैं। यह अखबार अपराध, खेलकूद, मनोरंजन केसाथ बालपन को प्रभावित करने वाली हर खुशी और गम की घटनाओं से भरा रहता है। इसे समझने के लिए पाठक को भी बचपन में लौटना पड़ता है क्योंकि इसमें छपने वाले लेखों का न कोई तारतम्य होता है और न ही शब्दों एवं व्याकरण की कसौटी इन पर लागू होती है। इनके काम करने के तरीके कहीं ज्यादा हैरान करने वाले हैं। अखबार का न कोई दफ्तर है और न ही प्रकाशक एवं प्रिंटर है। हर अंक में इसके संवाददाता एवं संपादक बदलते रहते हैं। इस अखबार में लिखने वाले बच्चों से बात करना भी मुश्किल होता है क्योंकि इनमें ज्यादातर समाजिक रूप से उपेक्षित गरीब घरों के बच्चे हैं, जिनकी प्रतिभा अंतर्मुखी रहती है। बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दिलाने के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन 'डोर स्टेप स्कूलÓ अखबार निकालने में इनकी मदद करता है। यह अखबार 1998 से हर महीने निकलता है। डोर स्टेप स्कूल की निदेशक बीना सेठ लश्करी कहती हैं कि ये बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, क्योंकि घर चलाने के लिए मां बाप के काम में हाथ बटाते हैं। हमारी सबसे बड़ी चुनौती इन बच्चों को पढ़ाने के लिए इनके घरवालों को तैयार करने की होती है। यहां पढऩे वाले बच्चे अपने परिवार और जिंदगी के बारे में ऐसी बातें बताते हैं, जो मीडिया में सामान्यतया नहीं आतीं। इनके मिलने वाली जानकारी में पुलिस वालों द्वारा परिवार को तंग किया जाना, पिता द्वारा माता की पिटाई के दुखद पल के साथ त्योहार मनाने के तरीके, क्रिकेट जैसे खेल में दिलचस्पी आदि जैसे सुखद अनुभव शामिल होते हैं। लश्कारी का कहना है कि यह सब सुनने के बाद ही इनके अनुभवों को अखबार का रूप देने का विचार सामने आया। अखबार में बच्चों के लेख और चित्र शामिल होते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने और अखबार निकालने में मदद करने वाली विजया दलवी अखबार निकालने के तरीके के बारे में बताती हैं कि पहले बच्चों को लिखने को कहा जाता है। पेंसिल से लिखे शब्दों को माइक्रोटिक पेन से लिखा जाता है। इसके बाद अक्षरों को काटकर ए फोर आकार के सादे पृष्ठ पर चिपकाया जाता है और उसकी फोटो कॉपी कराई जाती है। दलवी का कहना है कि बच्चों के लिखे का संपादन नहीं होता, शब्दों को काटते वक्त सिर्फ यह देखा जाता है कि लाइनें ज्यादा टेढ़ी न हों। लश्करी कहती है, 'इसे हम कलर प्रिंट नहीं करना चाहते और न ही इसमें छपने वाले लेखों में बहुत ज्यादा संपादन की जरूरत समझी जाती है। ऐसा करने से बच्चों के लेख की मूल भावना खत्म हो जाएगी। फिर उसमें अपनापन नहीं, बल्कि बाजारवाद दिखाई देगा जिसकी हमें जरूरत नहीं है।Ó अखबार पढऩे पर ऐसा लगता है, जैसे कोई बच्चा पाठक से बात कर रहा है। उसकी लडखड़ाती आवाज, टूटे फूटे शब्द और हिंदी में घुली मिली उसकी बोली की मिठास सहज आंखों के सामने आने लगती है। अखबार का खर्च निकालने के सवाल पर लश्करी कहती हैं कि इसमें विज्ञापन नहीं छपता। ऐसा करने से बच्चों के दर्द और उनकी छिपी भावनाओं के बजाय विज्ञापन का असर नजर आने लगेगा। उन्होंने बताया कि इसकी 100 प्रतियां निकलती हैं और एक प्रति की लागत 6-7 रुपये आती है। इसकी बिक्री से ही जरूरत भर को पैसे मिल जाते हैं। कुछ लोग लागत से ज्यादा पैसे दे देते हैं। डोर स्टेप स्कूल में पढ़ाई करने वाली देवी चौहान आज खुद गली-गली जाकर बच्चों को पढ़ाती हैं। उनका कहना है कि इस समय अखबारों में बच्चों के कॉलम खत्म हो चुके हैं और जो आता भी है, बड़े घरों के बच्चों की सोच होती है। यह अखबार झोपड़-पट्टी में रहनेवाले बच्चों की लेखनी से सजता है। डोर स्टेप स्कूल बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने के लिए काम करने वाला एनजीओ है। संगठन मुंबई और पुणे में करीब 50,000 बच्चों को शिक्षा देने में जुटा है। इसकी बस 6 बसें हैं जो चलते फिरते स्कूल का काम करती हैं। एनजीओ की मोबाइल लाइब्रेरी भी है, जिससे बच्चों को पढ़ाने का काम किया जाता है।

Keyword: Mumbai, Newspaper, NGO,
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