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आखिर देहरादून चाय बागान के कौन हैं असली मालिकान!
एन सुंदरेश सुब्रमण्यन और शिशिर प्रशांत /  June 07, 2013

क्या आपको अंदाजा है कि देश में रियल एस्टेट कंपनियां किस तरह जमीन का अधिग्रहण करती हैं? अक्सर वे नियमों से हटते हुए ऐसा रास्ता अख्तियार करती हैं जिससे कई लोगों में मन में सवाल खड़े हो जाते हैं। यह कहानी कुछ ऐसी है कि कैसे दिल्ली की एक रियल्टी कंपनी एमार एमजीएफ ने देहरादून की एक सूचीबद्ध कंपनी का अधिग्रहण किया। इसके अनूठे तरीकों में कंपनी द्वारा अपने कर्मचारियों के नाम पर नई कंपनियों की पेशकश से लेकर प्रीमियम दरों पर तरजीही शेयर जारी करने के साथ बड़ी चतुराई से कुछ बातों का खुलासा करना शामिल था। ये सारी कवायद आजादी से पहले की एक कंपनी पर नियंत्रण बनाने को लेकर की गई थी जिसके पास उत्तराखंड की राजधानी के मुख्य इलाके में मौजूद रियल एस्टेट परिसंपत्ति का मालिकाना हक था।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने अपनी पड़ताल में यह पाया कि रियल्टी कंपनी द्वारा की गई भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में कई गहरे राज हैं जिन पर से अब तक पर्दा नहीं हटा है और इसमें एमार एमजीएफ जैसी कंपनी के साथ ही कई छोटी और थोड़ी कम मशहूर कंपनियां शामिल हैं। इस प्रक्रिया के दौरान देहरादून के सबसे अहम रियल एस्टेट के राज की परतें खुल रही हैं जो करीब सात साल से एक रहस्य बना हुआ है।

देहरादून टी कंपनी (डीटीसी) का मालिकाना हक देहरादून शहर के बाहरी इलाके में मौजूद हरवंसवाला-आर्केडिया चाय बागान पर है। करीब 150 साल पुरानी डीटीसी कंपनी कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध है। यह एक्सचेंज अब निष्क्रिय हो गया है। इस एक्सचेंज पर ज्यादातर शेयरों की तरह ही डीटीसी के शेयर में शायद ही कारोबार होता था। लेकिन सात साल पहले ब्रिटिश दौर की कंपनी के साथ कुछ अलग तरह का बदलाव देखा गया था। उस वक्त कंपनी की चुकता पूंजी 10.2 लाख रुपये थी और उसकी बैलेंसशीट 8.5 करोड़ रुपये थी। इसके शेयरों को कुछ सैकड़ों शेयरधारकों के बीच बांटा गया जिनमें कई ऐसे ब्रितानी नाम भी थे जिनका कोई अता-पता नहीं है। चार निदेशकों और उनके परिवार के सदस्यों को नियंत्रणपूर्ण हिस्सेदारी दे दी गई जिनके पास करीब 45 फीसदी की हिस्सेदारी थी।

जो बैलेंसशीट उतनी आकर्षक नहीं दिख रही थी उसमें, 'कंपनी का स्वामित्व 1,127.48 एकड़ जमीन पर था जिसमें चाय बागान, फैक्टरी, मजदूर बस्ती, खेती के लायक जमीन, फलों के बगीचे, सुगंधित घास और सड़क के लिए जमीन शामिल है। इनमें कोई भी हिस्सा विवादास्पद नहीं था।Ó दिसंबर 1948 में जब इस जमीन का पुनर्मूल्यांकन कराया गया तो इस जमीन की कीमत डीटीसी की बैलेंसशीट में 30.27 लाख रुपये आंकी गई।

रियल एस्टेट विशेषज्ञ 2006 में संपत्ति के भाव से जुड़े आंकड़े पेश करने में नाकाम रहे क्योंकि कुछ विशिष्ट क्षेत्रों के कीमत का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है। अप्रैल 2006 के रीडिफ डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में 'हाल के महीनेÓ में तेजी से बढ़ती हुई रकम का जिक्र है। रियल एस्टेट एजेंट के हवाले से इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि उस साल देहरादून और आसपास के क्षेत्र की कीमतों में 10-50 गुना की बढ़ोतरी हुई है क्योंकि दिल्ली के डेवलपरों मसलन अंसल, पाश्र्वनाथ और डीएलएफ ने वहां दिलचस्पी दिखाई।

बेशकीमती संपत्ति
इस वक्त इस टी-एस्टेट से लगी हुई 800 वर्ग गज की जमीन की कीमत 2 करोड़ रुपये है क्योंकि यहां खाली जमीन नहीं है। एक एकड़ में 4,840 वर्ग गज जमीन होती है। हालांकि साधारण अंकगणित भी लगाएं तो 1,127 एकड़ संपत्ति की मौजूदा कीमत कई हजार करोड़ रुपये होगी। रियल्टी एजेंटों का कहना है कि अगर आपूर्ति ज्यादा हो तो कीमत कम होगी।

14 मार्च, 2006 को रियल एस्टेट डेवलपर एमार एमजीएफ के दो कर्मचारी लीगल हेड सुरिंदर वर्मा और सहायक प्रबंधक (सचिवालय विभाग) चिंतन दीवान ने एक कंपनी शुरु करने के लिए 100,000 रुपये की इक्विटी पूंजी लगाई जिसका नाम लॉजिकल बिल्डवेल रखा गया जिसे बाद में डीटीसी का अधिग्रहण करना था। कंपनी बनते ही लॉजिकल को एमार एमजीएफ की ओर से भारी मात्रा में बगैर गारंटी के कर्ज मिलना शुरु हो गया। 31 मार्च, 2006 को खत्म हुए वर्ष की  बैलेंसशीट के मुताबिक कंपनी के पास एमार के 76 करोड़ रुपये थे। परिसंपत्ति के तौर पर यह रकम 'भूमि के बदले अग्रिमÓ के तौर पर दिखाई गई। हालांकि सांविधिक सूचनाओं से यह स्पष्ट नहीं होता कि यह अग्रिम राशि किसे दी गई है।

31 मई, 2006 को लॉजिकल के शेयरों का हस्तांतरण एमार एमजीएफ समूह के वित्तीय नियंत्रक विजय सज्जनहार और सहायक महाप्रबंधक (वित्त) गौतम कलानी के नाम पर कर दिया गया जिन्होंने कंपनी में निदेशक के तौर पर कार्यभार संभाला। रियल्टी विशेषज्ञों का कहना है कि इस अवधि के दौरान करार करने वालों ने यह महसूस किया कि इतनी बड़ी मात्रा में जमीन खरीदने पर उस पर शहरी भूमि हदबंदी कानून लागू होगा। ऐसे में उन्होंने कंपनी ही खरीदने का फैसला किया। डीटीसी एक सूचीबद्ध कंपनी है, ऐसे में सेबी को जानकारी देना भी जरुरी था। अब इसमें मुश्किल की बात यह थी कि जमीन कैसे ली जाए और एमार का नाम कैसे छुपाया जाए जिसका जिक्र सेबी को दिए गए खुलासे में करना ही पड़ता? ऐसे में एक ही उपाय था कि कुछ और नई कंपनियां बनाई जाएं। सेबी के नियमों के तहत जो ऑफर लेटर  दिया गया उससे ही इसका खुलासा हुआ।

अभी दो महीने बीते भी नहीं थे कि 10 जुलाई 2006 को लॉजिकल ने प्रमुख प्रवर्तकों और डीटीसी के कुछ अन्य प्रमुख शेयरधारकों के साथ 54,450 शेयरों को हासिल करने के लिए एक शेयर खरीद समझौता किया। लॉजिकल  ने 15,611 रुपये प्रति शेयर की कीमत के हिसाब से 85 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम की पेशकश की। तीन दिनों के बाद लॉजिकल ने 20 फीसदी हिस्से को हासिल करने के लिए ओपन ऑफर के साथ अधिग्रहण की साïर्वजनिक घोषणा की। सूचीबद्ध कंपनी के तौर पर डीटीसी को सेबी के अधिग्रहण कानून का पालन करना था जिसमें कम हिस्सेदारी वाले शेयरधारकों के निकलने के विकल्प की इजाजत देने के लिए ओपन ऑफर अनिवार्य था। कंपनी को इस करार से जुड़ी सारी सूचनाओं की जानकारी एक पत्र के जरिये दाखिल करना था।

ऑफर लेटर में शेयर खरीद समझौते के मुताबिक, '15,611 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से सभी शेयरों का भाव 85,00,18,950 रुपये है। विक्रेताओं द्वारा पेशकश किए गए कुल शेयरों में से 45,010 शेयर यानी 44.13 फीसदी प्रवर्तक समूह के पास और 9,440 शेयर यानि 9.25 फीसदी गैर-प्रवर्तकों के खाते में था।Ó ऑडिटरों के स्वतंत्र मूल्यांकन के मुताबिक डीटीसी के शेयरों का शुद्ध परिसंपत्ति मूल्य 31 मार्च, 2006 को महज 721.99 रुपये प्रति शेयर रहा। ऑफर लेटर में कहा गया, 'पिछले तीन सालों में डीटीसी को कोई मुनाफा नहीं मिला था और पिछले 26 हफ्ते में इसकी कोई बाजार कीमत नहीं थी।

कमाई के लिहाज से प्रति शेयर भाव और बाजार कीमत का इस्तेमाल मूल्य तय करने के लिए नहीं किया जाता है। ऐसे में नियमन 20 (4) और 20 (5) के लिहाज से 15,611 रुपये की पेशकश कीमत जायज है।Ó  यह समझना इतना मुश्किल नहीं है कि आखिर कोई घाटे में चल रहे एक चाय बागान के लिए कई दफा बुक वैल्यू का भुगतान क्यों करेगा। यह जमीन कीमती थी और लॉजिकल का मुख्य उद्देश्य यहां आवासीय और व्यावसायिक परिसर तैयार करने का था। ऑफर लेटर में कहा गया है, 'लॉजिकल को आवासीय इमारतें, व्यावसायिक और औद्योगिक इमारतें, कॉलोनी, होटल, मिल आदि बनाने, विकसित करने और उसे बढ़ावा देने के लिए निगमित कंपनी का रुप दे दिया गया।Ó

परत दर परत
अधिग्रहणकर्ता के मालिकाना स्वामित्व की संरचना का ब्योरा देते हुए ऑफर लेटर में कहा गया ,'गौतम कलानी और विजय सज्जनहार, हरेक के पास 5000 इक्विटी शेयर थे जिन्हें मिलाने पर अधिग्रहणकर्ता का 100 फीसदी चुकता इक्विटी शेयर हो जाता है।Ó हालांकि दोनों ही शेयरधारक निदेशक एमार के कर्मचारी थे और कंपनी को एमार के बड़ी तादाद में असुरक्षित ऋण मिला था। हालांकि दस्तावेज कहते हैं, 'अधिग्रहणकर्ता का ताल्लुक किसी भी समूह से नहीं है।Ó 13 जुलाई 2006 को जब इस करार की सार्वजनिक घोषणा की गई उसके कुछ दिन पहले ही फंड देने के तरीके में भारी बदलाïव आया। 1 जुलार्ई को लॉजिकल को दो कंपनियों, अमरदीप प्रॉपर्टीज और कॉम्पैक्ट प्रॉपर्टीज से तरजीही शेयरों के सबस्क्रिप्शन के रुप में निवेश मिला।

अमरदीप और कॉम्पैक्ट तो लॉजिकल के लिए ज्यादा ही उदार थे। उन्होंने न केवल दो महीने पुराने लॉजिकल के भुनाने योग्य 10 रुपये वाले तरजीही शेयरों को खरीदने में सहमति बनाई बल्कि दोनों ने कंपनी में 96 करोड़ रुपये का निवेश कर 40 लाख शेयर खरीदे।

एमार एमजीएफ का 76 करोड़ रुपये का असुरक्षित कर्ज बैलेंसशीट से गायब हो गया। हालांकि कोई भी इस बात का अंदाजा लगा सकता है कि अमरदीप और कॉम्पैक्ट ने जो पूंजी लगाई उसका इस्तेमाल एमार को भुगतान करने में किया गया। क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अमरदीप और कॉम्पैक्ट के प्रवर्तक कौन थे? जिन्होंने लॉजिकल कंपनी शुरू की थी वहीं एमार के कर्मचारी सुरिंदर वर्मा और चिंतन दीवान थे।

लॉजिकल के कंपनी बनने के एक दिन पहले 13 मार्च, 2006 को वर्मा और दीवान ने अमरदीप और कॉम्पैक्ट को भी उसमें शामिल कर लिया था। इसके लिए यह तर्क दिया गया कि इन कंपनियों ने विभिन्न कारोबारी मौके तलाशने के लिए लॉजिकल बिल्डवेल के भुनाये जा सकने वाले परिवर्तनीय तरजीही शेयर पूंजी में निवेश किया है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इन कंपनियों को इतना पैसा कहां से मिला? ओपन ऑफर की सूचना के मुताबिक, 'अमरदीप और कॉम्पैक्ट ने संयुक्त उपक्रम/विभिन्न संस्थाओं के साथ कारोबार विकास समझौते किए हैं जिसके तहत वे टाउनशिप/रियल एस्टेट के साथ ही भूमि और बाजार की प्रॉपर्टी को विकसित करने में जुटी हुई हैं। जिन कंपनियों के साथ इन कंपनियों ने समझौता किया है उनमें ट्रू वैल्यू बिल्डकॉन, एक्टिव बिल्डवेल, एमार एमजीएफ लैंड और एक्युटेक एस्टेट हैं।Ó

करीब 33 पन्ने की कंपनी की सूचना में अंतिम वाक्य में ही एमार का नाम आया है। संक्षिप्त में यही कहा जा सकता है कि इस कंपनी के कर्मचारी कई कंपनियां चला रहे थे और इससे मुफ्त की पूंजी लेने के साथ ही लेन-देन की प्रक्रिया को बड़ी सरलता से अंजाम दे रहे थे। इस खुलासे में जो कहा गया था उसके मुताबिक यह बिल्कुल भी एक थर्ड पार्टी नहीं मालूम पड़ रही थी।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है कि अमरदीप और कॉम्पैक्ट ने जिन कई कंपनियों के साथ समझौते किए उनमें से एमार एक थी बल्कि एमार ने अपने आईपीओ के लिए पेश किए गए दस्तावेज में भी इस बात का खुलासा किया है कि कंपनी के पास देहरादून में 1,129 एकड़ जमीन है। हालांकि इसके पूरे ब्योरे का कोई प्रमाण नहीं है लेकिन यह डीटीसी से जुड़ी जमीन ही मालूम पड़ती है।

बाद में यह तर्क दिया गया कि कर्मचारियों की कोई प्रत्यक्ष दिलचस्पी कंपनी में नहीं है इसलिए उन्होंने एमार के दूसरे कर्मचारियों को अपने शेयरों का हस्तांतरण कर दिया हालांकि उन्हें यह अंदाजा भी था कि इससे उन्हें मुनाफा ही मिलता। विशेषज्ञों का कहना है कि इन हस्तांतरणों में अधिग्रहण कानून के नियमों का पालन किया जाना चाहिए था। बाद में लॉजिकल को नया नाम देकर उसे लोम रियल्टर्स बना दिया गया। कलानी और सज्जनहार ने एमार छोड़ दी। लेकिन कंपनी ने इसके लिए कंपनी समूह के दूसरे कर्मचारी का सहारा लिया। हाल में दी गई सूचना के मुताबिक अमरदीप और कॉम्पैक्ट का नाम बदलकर एल्कोव रियल्टर्स और कैमियो रियल्टर्स कर दिया गया और इसका स्वामित्व और नियंत्रण लोम रियल्टर्स को दे दिया गया। एल्कोव और कैमियो की 99 फीसदी हिस्सेदारी की कमान रक्षित जैन के पास है।

आखिरी पैंतरा
जैन लोम के बोर्ड में हैं और उनके पास एमार की कई सहयोगी कंपनियों के शेयर हैं। जैन एमार एमजीएफ के उपाध्यक्ष श्रणव गुप्ता के भरोसेमंद माने जाते हैं और वह दिल्ली में गुप्ता के दफ्तर में वरिष्ठ महाप्रबंधक के तौर पर काम करते हैं। जैन का कंपनी के साथ कैसा रिश्ता है और डीटीसी का स्वामित्व रखने वाली नई कंपनी में उनका दबदबा कैसे है इस सवाल का जवाब उन्होंने नहीं दिया। उन्होंने अधिग्रहण से जुड़े ईमेल के सवालों का जवाब भी नहीं दिया। लोम, एल्कोव और कैमियो का पंजीकृत कार्यालय '17-बी, एमजीएफ हाउस, आसफ अली रोड, नई दिल्ली-110002 है।Ó

कलानी ने फोन पर कहा कि उन्होंने तीन-चार साल पहले कंपनी को छोड़ दिया था। लॉजिकल के बाबत उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि वे अब भी एमार के हिस्से हैं। पहले तो वे इससे ही जुड़े थे।Ó थोड़े दिन तक डीबी रियल्टी के मुख्य वित्तीय अधिकारी रहे सज्जनहार से संपर्क नहीं हो पाया। ऐसा माना जाता है कि वह विदेश में कोई काम कर रहे हैं।

एमार के सूत्रों का कहना है कि वाणिज्यिक बैंकरों द्वारा दिए गए सलाह के आधार पर खुलासा किया गया था वहीं इन बैंकरों का कहना है कि उन्हें लॉजिकल के प्रबंधनात्मक संरचना की जानकारी नहीं थी। ओपन ऑफर के लिए वाणिज्यिक बैंकर की भूमिका निभाने वाले इनाम सिक्योरिटीज को 2007 में एमार के आईपीओ की जिम्मेदारी दी गई थी जो रद्द हो गया। उसके बाद ऐक्सिस बैंक ने इसका अधिग्रहण कर लिया और इसका संचालन ऐक्सिस कैपिटल के तौर पर होने लगा। एमार के प्रवक्ता और ऐक्सिस कैपिटल को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं मिल पाया।

एमार के प्रवक्ता ने फोन पर कहा कि प्रबंधन ने किसी भी तरह के सवालों का जवाब नहीं देने का फैसला किया है। इस बीच देहरादून का हरबंसवाला-आर्केडिया चाय बागान अपने दिग्गज मालिकों से वाकिफ नहीं है। लेकिन ऐसी चर्चा है कि कंपनी आवासीय कॉलोनी बनाने के लिए भूमि के इस्तेमाल में बदलाव लाएगी। कंपनी के पूर्व अध्यक्ष एस पी चौरसिया जिन्होंने एमार के कर्मचारियों की कंपनी को शेयर बेच दिए वह हंसते हुए कहते हैं, 'ऐसी अफवाहें हमेशा होती रहती हैं।Ó लेकिन वह बड़ी साफगोई से स्वीकारते हैं कि चाय बागान का कोई भविष्य नहीं हैं और जिस कंपनी के हाथों में डीटीसी की कमान है ïवह एक दिन आवासीय कॉलोनी जरूर बनाएगी।

चौरसिया कहते हैं, 'उन्होंने बहुलांश हिस्सेदारी पाने के लिए 15,000 रुपये प्रति शेयर से ज्यादा खर्च किए। आखिर उन्हें चाय कारोबार पर इतनी बड़ी रकम क्यों खर्च करनी चाहिए जो घाटे में चल रही हो?Ó लेकिन भूमि के इस्तेमाल में बदलाव सबसे आसान तरीका है। चौरसिया का कहना है कि सरकार चाय बागान की जमीन के इस्तेमाल में बदलाव से डरी हुई है क्योंकि इसकी वजह से पर्यावरणविद् और कई गैर सरकारी संगठन शोर मचाएंगे क्योंकि इस पूरे क्षेत्र को सरकार ने हरित क्षेत्र घोषित कर रखा है।
डीटीसी इन अफवाहों को खारिज करते हुए यह दावा करती है कि यह चायपत्ती के लिए नए बाजार ढूंढने की कोशिश कर रही है ताकि यह कंपनी में बदलाव ला सके।

डीटीसी के निदेशक डी के सिंह का कहना है, 'मुझे हमारे टी एस्टेट में किसी भी तरह की आवासीय योजना के शुरू किए जाने की कोई जानकारी नहीं है। हमने इस बाबत सरकार से भी संपर्क नहीं किया है।Ó हालांकि सिंह इन सुझावों को सिरे से खारिज करते हैं कि कंपनी अपना दायरा रियल्टी कारोबार में भी बढ़ा ही है। उत्तराखंड के सरकारी अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि पहले भी भाजपा सरकार के कार्यकाल (2006-2011) के दौरान चाय बागान के जमीन के इस्तेमाल के रुझान में बदलाव लाने की कोशिशें हुई हैं।

अधिकारी कहते हैं, 'हमने जोरदार तरीके से इस कदम का विरोध किया।Ó उस वक्त के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को काफी मुश्किल हो गई जब उनकी सरकार ने सिटुरगिया आवासीय परियोजना के लिए भूमि के इस्तेमाल में बदलाव की इजाजत दे दी। यह मामला उच्च न्यायालय तक पहुंचा। उस वक्त से सरकार ने चाय बागान से अपना पीछा छुड़ाया।  सिंह कहते हैं कि चाय बागान में अब भी करीब 150 कामगार काम करते हैं जिनमें से 75-80 कामगार स्थायी और बाकी मौसम के आधार पर काम करने आते हैं। कंपनी के सालाना कारोबार में 20-25 लाख रुपये की कमी आई है जो अधिग्रहण से पहले कुछ करोड़ हुआ करता था।

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