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पांसा, पैसा और तमाशा
सुरजीत दास गुप्ता /  06 05, 2013

स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के आरोपों से आईपीएल ब्रांड को तगड़ी चोट पहुंचने के बावजूद विज्ञापनदाताओं और प्रायोजकों के हाथ नहीं खींचने की वजह यह है कि यह क्रिकेट टूर्नामेंट देश का सबसे ज्यादा पैसे वाला और बड़े पैमाने पर देखा जाने वाला आयोजन बना हुआ है। बता रहे हैं सुरजीत दास गुप्ता

पेप्सी और वोडाफोन से लेकर स्टार टीवी और घरेलू दिग्गज वीडियोकॉन सहित 70 प्रमुख विज्ञापनदाताओं और 12 प्रायोजकों ने हाल ही में खत्म हुई इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में लगभग 1,300 करोड़ रुपये खर्च किए। एक संपदा पर खर्च की गई यह रकम काफी ज्यादा है। लेकिन हर किसी को भारत की जनता से जुडऩे का लालच था।

महज दो महीनों में जिस दौरान टूर्नामेंट खेला गया था, आईपीएल ने टीवी के सभी खंडों और चैनलों (टीवी विज्ञापनों पर होने वाला औसत मासिक खर्च 1,350 करोड़ रुपये है) पर होने वाले कुल मासिक खर्च के एक तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था। यदि आप टीवी, प्रिंट, इंटरनेट, प्रचार और बिल बोर्डों पर हुए कुल खर्च पर गौर करें तो आईपीएल का छठा संस्करण इसके पांचवें हिस्से पर कब्जा करने में कामयाब रहा।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड या बीसीसीआई के लिए यह लीग मोटी कमाई कराने वाली रही। बोर्ड को 2011-12 में प्रति मैच 5 करोड़ रुपये की आमदनी हुई और इस साल यह आंकड़ा बढऩे का अनुमान है। 2011-12 में आईपीएल (265.14 करोड़ रुपये)से हुई आमदनी ने बीसीसीआई की कुल आमदनी में 23 फीसदी योगदान किया और इससे बोर्ड को 382 करोड़ रुपये का मुनाफा अर्जित करने में मदद मिली।

इस प्रकार बीसीसीआई ब्रिटानिया, वोल्टास और ईस्ट इंडिया होटल्स जैसी जानी मानी कंपनियों से ज्यादा मुनाफे वाला बन गया है। लेकिन इस सोने के अंडे देने वाली मुर्गी पर तलवार लटकती नजर आ रही है। स्पॉट फिक्सिंग स्कैंडल और खिलाडिय़ों व सट्टेबाजों की गिरफ्तारी के साथ ही कम समय तक अभिनेता रहे विंदू दारा सिंह और बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन के बीच के संबंधों का खुलासा होने के बाद उस पर पैसा बनाने वाली लीग होने के आरोप लगने लगे। इसके बाद पैदा हुए दबाव के आगे बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन को झुकना ही पड़ा और उनके दामाद पर लगे आरोपों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन कर दिया गया। लेकिन श्रीनिवासन को हटाए जाने के मसले पर बोर्ड भी बंट गया।

यह कहानी का एक हिस्सा है, जिसका समापन आने वाले दिनों में होगा। अभी तक सवाल पूछा जा रहा है कि क्या इस स्कैंडल का असर देश के सबसे अमीर और टीवी पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले खेल कार्यक्रम पर पड़ेगा। क्या विज्ञापनदाता और फ्रैंचाइजी की राय कुछ अलग होगी, क्या कंपनियां विज्ञापन पर होने वाले अपने खर्च में कटौती करेंगी? एक प्रमुख मीडिया कंपनी एजिस के चेयरमैन (भारत) और सीईओ (दक्षिण पूर्व एशिया) आशिष भसीन कहते हैं, 'निश्चित रूप से इसका असर पड़ा है। इस विवाद से लीग की ब्रांड पहचान को नुकसान पहुंचा है। अगर विवाद और बढ़ता जाता है तो जिम्मेदार ब्रांड आईपीएल का हिस्सा बनना पसंद नहीं करेंगे। कोई भी उम्मीद कर सकता है कि विज्ञापनदाता अब आगे ज्यादा मोलभाव करेंगे।Ó

विवाद ने खेलों के चाहने वालों को भी अचंभित कर दिया है। इस जीवंत खेल क्रिकेट से जुड़े लोगों की उदासीन चुप्पी भी खेल के प्रशंसकों को परेशान कर रही है। चुप्पी साधने वाले इस समुदाय में राज्य क्रिकेट एसोसिएशनों, खिलाड़ी, सामान्य तौर पर जोश में रहनने वाले कमेंटेटर और जाने माने राजनेता भी शामिल हैं। आखिर क्यों? जवाब संभवत: इस कटु सच्चाई में छिपा है कि किस तरह से उनकी आमदनी मुनाफे में चल रहे आईपीएल से जुड़ी हुई है।

एक पूर्व क्रिकेट प्रशासक कहते हैं, 'आईपीएल में खिलाडिय़ों, कमेंटेटर्स और राज्य बोर्डों के हित छिपे हुए हैं, जो तब तक चुप्पी साधे रहेंगे जब तक पैसा मिलता रहेगा।Ó एक अनुमान के मुताबिक सभी फ्रैंचाइजी ने इस साल अंतरराष्ट्रीय, घरेलू, रणजी और यहां तक अंडर 19 खिलाडिय़ों से करार के लिए 400 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान किया। आईपीएल के नियमों के अंतर्गत वे हर साल 198 खिलाडिय़ों के लिए 635 करोड़ रुपये खर्च कर सकती हैं। यह उतना पैसा है जितना अधिकांश खिलाडिय़ों ने अभी तक नहीं देखा होगा। यह भी याद रखिए कि कई शीर्ष अंतरराष्ट्रीय, भारतीय और विदेशी खिलाडिय़ों ने आईपीएल से इतना पैसा बनाया है, जितना उन्हें अपनी राष्ट्रीय टीमों से टेस्ट और एकदिवसीय मैच खेलने के एवज में नहीं मिला।

आईपीएल से फायदा उठाने वालों में पूर्व क्रिकेटर, जिनमें से कई अब कमेंटेटर हैं, प्रशासक और राज्य क्रिकेट एसोसिएशनों के सदस्य भी शामिल हैं। क्रिकेट संस्था ने हाल में आईपीएल से एकमुश्त लाभ के रूप में 200 क्रिकेटरों को 100 करोड़ रुपये की रकम दी थी। इसी प्रकार 30 क्रिकेट एसोसिएशनों के पास भी शिकायत करने की कोई वजह नहीं है। उन्हें नई इमारतें बनाने और इकाइयों के प्रबंधन के लिए लगातार बढ़ता हुआ अनुदान मिल रहा है। उदाहरण के लिए बीसीसीआई ने 2011-12 में खेल को प्रोत्साहन देने और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 435 करोड़ रुपये बांटे थे। बीसीसीआई के सहयोग से पुणे, रांची, राजकोट और धर्मशाला में नए स्टेडियमों का निर्माण किया गया।

भले ही ये संगठन चाहेंगे कि आईपीएल चलता रहे, लेकिन क्या विज्ञापनदाता और फ्रैंचाइजी अपने खर्च को इसी तरह बरकरार रखेंगे? इसमें कोई शक नहीं है कि आईपीएल की ब्रांड पहचान में कमी आई है और सट्टेबाजी से संबंधित नए खुलासे होने पर हालात और बदतर हो सकते हैं। लंदन की ब्रांड मूल्यांकन कंपनी ब्रांड फाइनैंस ने कहा कि आईपीएल ब्रांड का मूल्य 2010 के 4.13 अरब डॉलर से घटकर इस साल अप्रैल में 3.03 अरब डॉलर रह गया। कंपनी के वैश्विक रणनीतिक निदेशक उन्नी कृष्णन कहते हैं, 'यहां एक समस्या है। हाल की घटनाएं खुद ही किए गए घावों की तरह है, जो लगातार संपदा के मूल्य को घटा रहे हैं।Ó
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यहां तक कि स्पॉट-फिक्सिंग के आरोपों के बाद टीवी पर इसके दर्शकों की संख्या में भी कमी आई है। दिल्ली पुलिस द्वारा 16 मई को राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाडिय़ों की गिरफ्तारी के बाद इसकी टीवी रेटिंग्स (टीवीआर) में 14 फीसदी की कमी आई।

फिक्सिंग के आरोपों से दर्शक संख्या से इतर आईपीएल में विज्ञापनों पर मिल रहे प्रीमियम पर तो जरूर असर पड़ेगा। जेनिथ ऑप्टिमीडिया के मुख्य कार्याधिकारी सत्यजीत सेन कहते हैं, 'दर्शकों के नजरिये से देखें तो इस पर कुछ खास असर नहीं पड़ा है। लेकिन एक प्रायोजक के नजरिये से इस तरह का विवाद निश्चित तौर पर अच्छा नहीं है। इसलिए हां आगे कुछ रियायत देनी पड़ेगी।Ó मीडिया योजनाकारों ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर अगले साल विज्ञापन दरों में 20 से 30 फीसदी कमी आने की उम्मीद जताई। यदि कोई विज्ञापनदाता टूर्नामेंट से अलग होता है तो जरूर कुछ बेचैनी हो सकती है।

लेकिन टूर्नामेंट के प्रायोजकों को लगता है कि विवादों के बावजूद आईपीएल आकर्षित करने में सक्षम है। एक अग्रणी प्रायोजक के विपणन प्रमुख कहते हैं, 'टीवी दर्शक काफी छितरे हुए हैं, लेकिन किसी भी संपदा ने लगातार इतनी अच्छी रेटिंग और उपभोक्ताओं को जोड़े रखने वाला प्लैटफॉर्म नहीं दिया है। कौन सी ऐसी लीग है जो दो महीनों में इतने अच्छे नतीजे दे सकती है?Ó

मीडिया योजनाकारों का कहना है कि आईपीएल ने लगातार अच्छी रेटिंग अर्जित की है, जो कोई अन्य कार्यक्रम नहीं कर सकता है। हवस मीडिया की सीईओ (भारत एवं दक्षिण एशिया) अनीता नैयर कहती हैं कि भले ही दर्शक संख्या में मामूली कमी दर्ज की गई है, लेकिन खंड ए व बी और युवाओं में इसके प्रति आकर्षण बरकरार है। उन्होंने कहा, 'छह सीजन के दौरान आईपीएल ने रेटिंग के मामले में खुद को स्थापित किया है।Ó

लेकिन कंपनियों ने अपनी आमदनी को बनाए रखने के लिए रणनीति में बदलाव किया है। उदाहरण के लिए आईपीएल के आधिकारिक प्रसारणकर्ता सेट मैक्स ने जहां अपनी विज्ञापन दरों में 15 से 20 फीसदी (10 सेकंड के स्लॉट की दर को लगभग 4.5 लाख रुपये पर ले आए हैं) की कमी की, वहीं बड़ी संख्या में विज्ञापनदाताओं को जोड़ा है। बीते साल के पांच प्रायोजकों जिन्होंने एक प्रीमियम का भुगतान किया था, की तुलना में चैनल ने 11 कंपनियों को जोड़ा।

नतीजतन चैनल ने इस साल 850 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई की, जबकि बीते साल यह आंकड़ा 650-700 करोड़ रुपये रहा था। सेट मैक्स का परिचालन करने वाली कंपनी मल्टी स्क्रीन मीडिया के सीओओ पी सिंह कहते हैं, 'कई साल से हमारे लिए आईपीएल बेहद सफल टूर्नामेंट रहा है। इस सत्र में हमने विज्ञापनदाताओं से की गई सभी प्रतिबद्धताओं को पूरा किया है।Ó
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यह फ्रैंचाइजी ही हैं जो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं। नौ फ्रैंचाइजी जिनमें से कई नुकसान में चल रही हैं, ने इस साल टीमों की मेजबानी के एवज में सालाना शुल्क के तौर पर बीसीसीआई को लगभग 600 करोड़ रुपये का भुगतान किया। आंकड़े बताते हैं कि पांच टीमों को 2011-12 में ही 300 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। संभावित विद्रोह की गूंज तब सुनाई दी जब पुणे फ्रैंचाइजी की मालिक सहारा ने यह आरोप लगाते हुए अपने कदम वापस खींच लिए कि बीसीसीआई ने फ्रैंचाइजी शुल्क घटाने के अपने वादे को पूरा नहीं किया।

सहारा के चेयरमैन सुब्रत रॉय कहते हैं, 'आप फ्रैंचाइजी से लगातार भारी मात्रा में धन नहीं ले सकते और अपने लिए पैसा नहीं बना सकते। आईपीएल की सफलता के लिए सभी फ्रैंचाइजी को भी वित्तीय रूप से मजबूत होना चाहिए।Ó पुणे वारियर्स को हर साल 100 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है। बीते साल केरल फ्रैंचाइजी ने भी 156 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी देने में नाकाम रहने के बाद अपने कदम वापस खींच लिए थे।

जहां सहारा की समस्याएं इस वास्तविकता से जुड़ी हुई हैं कि उसने 2010 में टीम के स्वामित्व का अधिकार पाने के लिए ज्यादा भुगतान किया, वहीं टीमों के वर्तमान मूल्यांकन में भी कमी दर्ज की गई है।

सहारा के टीम खरीदने के तीन साल बाद तमिलनाडु के सन ग्रुप ने डेक्कन चार्जर्स जिसका नाम अब हैदराबाद सनराइजर्स है, को खरीदने के वास्ते पांच साल के लिए सिर्फ 425 करोड़ रुपये का भुगतान किया था। जहां सहारा बीसीसीआई को हर साल 170 करोड़ रुपये का भुगतान करती है, वहीं मारन को इसकी आधी 85 करोड़ रुपये की रकम देनी पड़ती  है। दिल्ली डेयरडेविल्स पर नियंत्रण रखने वाली जीएमआर एक साल से फ्रैंचाइजी में अपनी हिस्सेदारी घटाने के लिए निवेशक तलाश रही है, लेकिन अभी तक कोई भी निवेश के लिए सामने नहीं आया है।

तो क्या उन टीमों के लिए वित्तीय व्यवहार्यता एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है, जिन्होंने प्रवेश के लिए 2010 में खासा ज्यादा भुगतान किया था? निष्पक्ष रूप से बात करें तो अधिकांश फ्रैंचाइजी लागत और घाटे में कमी लाने में सक्षम हैं। कोलकाता नाइटराइडर्स ने पहले से ही कमाई करनी शुरू कर दी है। भले ही व्यावसायिक गतिविधियों से बहुत ज्यादा कमाई नहीं हुई, लेकिन इस साल टिकटों की कीमतें बढ़ाकर फ्रैंचाइजी कमाई करने में कामयाब रहीं।

कई फ्रैंचाइजी यह भी कहती हैं कि केंद्रीय पूल (जिसमें बीसीसीआई और टीमों के बीच साझेदारी होती है) से आमदनी लगातार बढ़ रही है। उनमें से एक ने कहा कि प्रसारण अधिकारों में अपनी हिस्सेदारी के एवज में उन्हें इस साल उन्हें 55 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है, जबकि बीते साल 45 करोड़ रुपये ही मिले थे। एक सेलिब्रिटी और खेल प्रबंधन कंपनी सीएए क्वान के साझेदार इंद्रनील दास ब्लाह कहते हैं कि उन्हें कोई चिंता नहीं है। उन्होंने कहा कि भले ही प्रसारण अधिकार (जो पहले साल के 72 फीसदी से घटते-घटते बीते साल 48 फीसदी रह गए) घटते जाएंगे, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि सेट अब हर साल के लिए अधिकारों के एवज में ज्यादा भुगतान करेगी। ब्लाह ने कहा, 'फ्रैंचाइजी को समझना चाहिए कि यह लंबे वक्त का खेल है। उन्हें इसे 10 साल की अवधि में देखना चाहिए।Ó

हर कोई अगले सत्र में एक और नया रोमांच की ही उम्मीद कर सकता है। सभी खिलाड़ी नीलामी की मेज पर फिर से लौटेंगे, जिससे टीमों में नया संयोजन देखने को मिलेगा। भारत जैसे क्रिकेट के दीवाने देश में विवाद कोई बड़े निशान पीछे नहीं छोड़ जाते, इससे पहले के मैच फिक्सिंग और ललित मोदी प्रकरण को याद कीजिए। पैनासोनिक इंडिया के एक प्रवक्ता की टिप्पणी 'भले ही वर्तमान विवाद खेल की भावना के लिए अच्छे नहीं है, लेकिन लब्बोलुआब यही है कि आईपीएल अपनी नाबाद पारी को आगे भी जारी रखने जा रहा है।Ó आइए आईपीएल 7 तक इंतजार करें।

(आलेख में मुंबई से गौरव लघाटे और विवेट सुजन पिंटो का भी योगदान)

आईपीएल का बहीखाता

  • आईपीएल के प्रायोजकों ने 200 करोड़ रुपये दिए, जिसमें मुख्य प्रायोजक पेप्सिको का योगदान 80 करोड़ रुपये रहा। बीते साल मुख्य प्रायोजक का योगदान 40 करोड़ रुपये ही रहा था
  • सेट मैक्स ने विज्ञापन से 800 से 850 करोड़ रुपये की कमाई की, जबकि बीते साल यह आंकड़ा 650-700 करोड़ रुपये रहा था
  • नौ फ्रैंचाइजी ने प्रायोजकों और स्टेडियम में विज्ञापन के माध्यम से 250 करोड़ रुपये की कमाई की
  • कुछ फ्रैंचाइजी ने टिकट बिक्री से 15 से 20 करोड़ रुपये की कमाई की
  • आईपीएल खिलाडिय़ों को इनामी रकम के अलावा लगभग 400 करोड़ रुपये की कमाई हुई। सभी फ्रैंचाइजी ने 198 खिलाडिय़ों पर 635 करोड़ रुपये खर्च किए
  • बीसीसीआई की तरफ से 200 पूर्व क्रिकेटरों को 100 करोड़ रुपये मिले, जिसमें से शीर्ष खिलाडिय़ों को एकमुश्त लाभ के रूप में 1.5 करोड़ रुपये तक मिले
  • राज्य और अन्य क्रिकेट एसोसिएशनों को क्रिकेट को प्रोत्साहन देने और बुनियादी ढांचे (पुणे, रायपुर, धर्मशाला सहित अन्य मैदानों) के विकास के लिए 2011-12 में 435 करोड़ रुपये से ज्यादा मिले
  • 2011-12 में बीसीसीआई को आईपीएल से 265.14 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ, जो 2010-11 के 118.76 करोड़ रुपये से खासा ज्यादा है। यह उसकी कुल आमदनी का 23 फीसदी है
  • सेट मैक्स ने 10 साल के प्रसारण अधिकारों के लिए 1.06 अरब डॉलर का भुगतान किया। उसको छठे साल से ज्यादा भुगतान करना है।

उद्योग के अनुमानों पर आधारित

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