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नहीं खुशी तो खुदकुशी
भारत में 15 से 19 साल तक की उम्र वाले युवाओं की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या है
इंदुलेखा अरविंद /  06 03, 2013

जिन दिन 10वीं कक्षा की परीक्षा के परिणाम घोषित हुए थे, धनलक्ष्मी को दोपहर में ही काम छोड़कर घर वापस लौटना पड़ा था। उन्होंने कंप्यूटर पर देखा कि उनकी 16 साल की बेटी श्रीदेवी परीक्षा में फेल हो गई। उन्हें यह चिंता थी कि उनकी बेटी इस निराशाजनक स्थिति का सामना कर पाएगी या नहीं। लेकिन जब वह बेंगलूर के जोगुपलाया में अपने दो कमरों के मकान में पहुंची तो वहां पर काफी भीड़ जमा थी, जिसने उनके 19 साल के बेटे शेखर की छत से लटकी लाश को बाहर निकाला था। हादसे के एक सप्ताह बाद भी धनलक्ष्मी बात करने की स्थिति में नहीं थी, उसके मुंह से सिसकियां ही निकल रही थीं। वह अपने बेटे के फोटो के सामने आंसू बहा रही थी। उनकी बहन ओ जयलक्ष्मी और बेटी ने शेखर के इस उग्र कदम की वजह बताई और कहा कि शायद उनके बेटे की अपनी बहन से काफी घनिष्ठता थी और उसके लिए शेखर की बड़ी योजनाएं थीं। श्रीदेवी रुआंसी होकर कहती है, 'उसने मुझसे कहा था कि वह जो भी करना चाहती है मैं उसमें सहयोग करूंगा।Ó

उसी इलाके में दो गली आगे छोटे-छोटे घरों में से एक में रहने वाला एक अन्य परिवार भी 15 वर्षीय दिलीप कुमार की मौत पर आंसू बहा रहा था। कुमार बोर्ड परीक्षाओं में पांच विषयों में फेल हो गया था। उसने अपने पिता जो एक ठेकेदार और क्षेत्र की अंबेडकर एससी/एसटी वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष भी हैं, को खासा निराश किया था और उसने एक कीटनाशक का सेवन कर लिया था। कुमार की मां वेणी जो बीते 15 साल से कुवैत में आया (दाई) के रूप में काम कर रही हैं, कहती हैं, 'मरने से पहले उसने अपने पिता से माफी मांगी थी और उनसे कहा था कि वह उन्हें शर्मिंदा करना नहीं चाहता था।Ó उन्होंने बताया कि उनके पति अपने बेटे के बेहद करीब थे और हमारी मुलाकात के दौरान उनके लिए बोलना मुश्किल हो रहा था। कुमार और शेखर के मामले काफी हद तक एक समान ही हैं।

बीते साल एक भारत में आत्महत्या के मामलों पर द लैंसेट द्वारा प्रकाशित एक शोध में कहा गया कि 15 से 19 साल के बीच के युवाओं की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण आत्महत्या (पहला कारण पुरुषों में सड़क हादसे हैं और महिलाओं में बच्चे को जन्म देने के दौरान होने वाली मौतें) है। मार्च में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ ऐंड मैट्रिक्स इवैल्युएशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 15 से 49 साल के बीच की उम्र की महिलाओं की मौत का सबसे बड़ा कारण आत्महत्या था। भारत के अपने नैशनल क्राइम रिकॉड्र्स ब्यूरो के मुताबिक 2011 में देश में 1,35,585 आत्महत्याएं हुई थीं, जबकि इस साल के लिए उपलब्ध आंकड़े इस साल एचआईवी से (नैशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक 1,16,000) हुई मौतों से ज्यादा हैं। आंकड़े हकीकत से कम भी हो सकते हैं क्योंकि आत्महत्या को सामाजिक तौर पर धब्बे के तौर पर देखा जाता है और यह वास्तविकता है कि आत्महत्या का प्रयास एक आपराधिक मामला है, हालांकि सरकार ने आईपीसी से इस धारा को हटाने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
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विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे अकेलापन, नशाखोरी, निराशा और आर्थिक कई कारण हैं। बेंगलूर मेडिकल कॉलेज ऐंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के मनोरोग चिकित्सा विभाग के प्रमुख एच चंद्रशेखर कहते हैं, 'हमारा शोध कहता है कि सामान्य तौर पर इसके कई कारण होते हैं।Ó एक आत्महत्या हेल्पलाइन सहाय जो हमेशा आपकी कॉल पर गर्मजोशी से जवाब देती है 'गुड ईवनिंग, सहाय, क्या मैं आपकी मदद कर सकती हूं?Ó की स्वयंसेवी अनीता ग्रेसियस कहती हैं कि उनके पास अधिकांश कॉल ऐसे लोगों की आती हैं जो अकेले रहते हैं। 2002 से स्वयंसेवी के तौर पर काम कर रही ग्रेसियस कहती हैं, 'लोग कॉल करते हैं और पूछते हैं कि वह कहां जाकर दोस्त बना सकते हैं।Ó उन्होंने कहा कि उन्हें कॉल करने वाले लोगों की उम्र लगातार घट रही है। उन्हें कॉल करने वाला सबसे कम उम्र का शख्स 15 साल का है। 

लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन ऐंड ट्रॉपिकल मेडिसन के इंटरनैशनल मेंटल हेल्थ विभाग के प्रमुख और लैंसेट शोध के लेखकों में से एक विक्रम पटेल कहते हैं, 'भारत और विकसित देशों में युवाएं के आत्महत्या के प्रयास के आंकड़े समान हो सकते हैं, क्योंकि यह वह समूह है जिन पर ज्यादा आवेगी होने के कारण दुनिया भर में सबसे ज्यादा जोखिम होता है। लेकिन पश्चिम की तुलना में भारत में आत्महत्या की दर ज्यादा ऊंची है, क्योंकि यहां के लोगों के लिए घातक तरीकों का इस्तेमाल करना खासा आसान है और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाएं सीमित हैं।Ó नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरो साइंसेज के महामारी विज्ञान विभाग के प्रमुख जी गुरुराज कहते हैं कि हर उम्र के लोगों में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा, 'तीन दशकों में आत्महत्या के आंकड़े तीन गुने हो चुके हैं, जो 1980 में 40,000 थे और आज यह आंकड़ा बढ़कर 1,35,000 तक पहुंच गया है। आत्महत्या की कोशिश करने वाले औसतन 15 लोगों में 10 को कामयाबी मिल रही है।Ó
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लेकिन इन आंकड़ों के बावजूद सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि नीति निर्धारक आत्महत्या को सार्वजनिक स्वास्थ्य की समस्या के रूप में मान्यता देने में अभी तक नाकाम रहे हैं। पटले कहते हैं, 'भारत ऐसे कुछ देशों में शामिल है जो आत्महत्या को पूरी तरह से सामाजिक या आर्थिक या राजनीतिक मुद्दा मानकर चल रहे हैं।Ó इसे स्वीकार करने का मतलब है कि राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति और कार्यक्रम लागू करना होगा, जिसके सामने कई बाधाएं आएंगी। गुरुराज और पटेल दोनों ही इस बात पर जोर देते हैं कि आत्महत्या को क्षेत्र, उम्र, आय या किसी अन्य कारक के लिहाज से किसी विशेष समूह तक सीमित नहीं किया जा सकता है, इसलिए इसका 'हर तबके के लिए एकÓ समाधान भी नहीं हो सकता।

घातक तरीकों तक आसान पहुंच और आपातकालीन उपचार केंद्रों की संख्या कम होने से भारत में आत्महत्या की दर ऊंची है।
विक्रम पटेल, लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन ऐंड ट्रॉपिकल मेडिसन

चेतावनी की संकेत

  • व्यक्तित्व में अचानक बदलाव, निराशावाद का बढऩा
  • बिना किसी वजह व्यक्तिगत प्रभाव का कम होना
  • डिप्रेशन की पृष्ठभूमि और मनोरोग का होना


ऐसे घटेंगे आत्महत्या के मामले

  • आत्महत्या के प्रति जागरूकता पैदा करना, जिससे इसकी पहचान जल्दी की जा सकती है
  • घातक कीटनाशकों और दवाओं की उपलब्धता सीमित करना
  • मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं की जल्दी पहचान करना
  • सुसाइड हेल्पलाइनों की संख्या बढ़ाना

 

Keyword: Suside, खुदकुशी , परीक्षा के परिणाम,
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