बिजनेस स्टैंडर्ड - प्रचार के संसार में तिकड़मों की भरमार
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प्रचार के संसार में तिकड़मों की भरमार
अलकनंदा चक्रवर्ती /  May 07, 2013

विज्ञापन जगत में शोहरत पाने के लिए एक से एक तिकड़में भिड़ाई जाती हैं, जो सृजन से जुड़े इस पेशे की छवि खराब करती हैं।

वर्ष 2008: फ्रांसीसी समूह पब्लिसिस की इकाई और मैकडॉनल्ड, कोका कोला, वॉल्ट डिज्नी, मार्लबोरो और प्रॉक्टर ऐंड गैंबल जैसी दिग्गज कंपनियों के विज्ञापन अनुबंधों का कामकाज देखने वाली लियो बर्नेट इंडिया ने गोवा में चलने वाले विज्ञापनों के सालाना जलसे 'गोवाफेस्टÓ में लक्जर हाईलाइटर पेन्स के लिए अपने विज्ञापन की प्रविष्टिï जमा कराई। निर्णायक मंडल को यह खूब भा गया और उसने इसे ग्रां प्री से नवाजा भी। मगर दिक्कत यही थी कि लक्जर हाईलाइटर की मालिक लक्जर राइटिंग इंस्ट्रुमेंट्स लियो बर्नेट की ग्राहक नहीं थी। वास्तव में एजेंसी को अपनी प्रविष्टिï वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा था क्योंकि लो लिंटास के चेयरमैन और मुख्य कार्याधिकारी आर बालकृष्णन ने इस पर एतराज जताया था। बालकृष्णन विज्ञापन और फिल्म जगत में बाल्की के नाम से मशहूर हैं। बाल्की की ही एजेंसी
लो लिंटास के पास ही लक्जर के क्रिएटिव कारोबार की कमान थी।

वर्ष 2013: गोवाफेस्ट, 2013 के कुछ ही दिनों के बाद टाटा सॉल्ट बनाने वाली कंपनी टाटा केमिकल्स ने अपनी विज्ञापन एजेंसी लियो बर्नेट को रेडियो श्रेणी में दाखिल की गई दो प्रविष्टिïयों को वापस लेने के लिए कहा। इन प्रविष्टिïयों पर एजेंसी शुरुआत में दो स्वर्ण और दो रजत हासिल कर चुकी थी। बहरहाल कंपनी की ओर से यह आधिकारिक बयान जारी किया गया, 'टाटा सॉल्ट ने रेडियो स्पॉट के लिए भुगतान नहीं किया, इसलिए हम इस पुरस्कार को हासिल करने में सहज नहीं है।Ó इस साल हुए गोवाफेस्ट में सबसे ज्यादा तमगे लियो बर्नेट की झोली में ही आए, जिसे कुल 71 पुरस्कार मिले। मगर यहां लियो बर्नेट ही इकलौता मामला नहीं है, इस समारोह के दौरान और उसके बाद विज्ञापन एजेंसियों ने एक दूसरे के विज्ञापनों को लेकर निशाना साधा। इनमें से तीन मामले तो शीर्ष 10 एजेंसियों से जुड़े थे। बड़ी एजेंसी से आशय भारत में उनके परिचालन से होने वाली कमाई है। इसमें मैक्कन वल्र्डग्रुप (गोवाफेस्ट में तमगों के लिहाज से दूसरे पायदान पर) इंडिया का एटीएसएस के लिए प्रिंट विज्ञापन भी शामिल है, जिसे ग्रां प्री दिया गया। सेंक्चुरी एशिया मैगजीन और गोदरेज सिक्योरिटी के लिए बनाए गए जेडब्ल्यूटी इंडिया (गोवाफेस्ट में तमगों के लिहाज से तीसरे पायदान पर) के विज्ञापनों का भी नाम लिया गया। साथ ही आउटडोर श्रेणी में (रजत पदक) इलेक्ट्रोलक्स के लिए डीडीबी मुद्रा की प्रविष्टिï और कोक स्टूडियो के लिए (स्वर्ण पदक) लियो बर्नेट का नाम भी शामिल रहा। गोवाफेस्ट अवॉड्र्स संचालन परिषद को ऐसी करीब 20 से अधिक शिकायतें मिली हैं।

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यहां तक कि एक दशक पहले भी विज्ञापन के विषय पर यही बहस चल रही थी कि यह विज्ञान है या कला? मगर हाल के वर्षों में यह चर्चा तेज हुई है कि यह मौलिक है या किसी की नकल। बिना प्रकाशित हुए विज्ञापन, अधिकृत काम या जिसके लिए मेहनताना न मिला हो, या वैश्विक विज्ञापनों की सपाट नकल जैसे विषय चर्चा के केंद्र में होते हैं। सीधे अर्थों में कहें तो पुरस्कार समारोहों के दौरान यही बहस का मुख्यबिंदु बनने लगा है। इसके हिमायती लोगों का कहना है कि उनकी कुंठा ग्राहक के दखल से पैदा होती है, जो उनके सृजन की सूरत बिगाड़ देते हैं। दूसरों का तर्क होता है कि वे ऐसे तंत्र से ताल्लुक रखते हैं जो कल्पनाशील युवाओं को ऐसे काम के लिए प्रोत्साहित करता है, जो पुरस्कार दिला सके, जिससे एजेंसी की हैसियत बढ़े। कारोबारी स्तर पर यही अहम होता है। आप इनमें से चाहे जिस पक्ष से इत्तफाक रखें लेकिन इसमें एक पैटर्न जरूर है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।

यह एक अनैतिक चक्र है। भारत में कोई भी एजेंसी स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्घ नहीं है, इस लिहाज से उनके खातों की जानकारी भी सार्वजनिक नहीं है। आखिर कोई एजेंसी कितनी कमाई करती है, इसका आकलन करना बहुत टेढ़ी खीर नहीं है। इसलिए कोई कंपनी कैसे तय करती है कि वह अपने विज्ञापनों का जिम्मा किसको दे, जो उसके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित हो सके? आप विज्ञापनों पर सबसे ज्यादा रकम खर्च करने वालों से बात करिए तो वे बताएंगे कि इसके लिए एकदम औपचारिक प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें ट्रॉफियों और ब्रांड इक्विटी (द इकनॉमिक टाइम्स द्वारा तैयार की जाने वाली सालाना रैकिंग) की रैंकिंग को आधार बनाया जाता है।

इसका मतलब यही है कि एजेंसियों के पास बहुत ज्यादा विकल्प नहीं हैं और उन्हें ट्रॉफियों पर काफी ध्यान लगाना पड़ता है। शीर्ष 10 एजेंसियों में से एक में क्लाइंट सर्विसिंग निदेशक बताते हैं, 'इसलिए एक समांतर व्यवस्था बन गई है, जहां एजेंसी में कुछ लोग रोजमर्रा के कामकाज निपटाते हैं तो वहीं कुछ पुरस्कारों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं।Ó बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है। वह बताते हैं कि शीर्ष एजेंसियां हर साल एक तय 'अवॉर्ड बजटÓ भी सुनिश्चित करती हैं। वह बताते हैं, 'इसमें केवल विभिन्न कार्यक्रमों में आवेदन करने का शुल्क ही शामिल नहीं है बल्कि ऐसे लोगों को भी अपने साथ जोडऩे के लिए दिया जाने वाला मेहनताना भी होता है, जिनके काम पर निर्णायक मंडल मुग्ध हो जाए। इसलिए अगर आपकी बदौलत वर्ष 2012 में हुए गोवाफेस्ट में मुद्रा ने पदक तालिका में सबसे ऊपर जगह बनाई थी तो निश्चित ही जेडब्ल्यूटी जैसी कोई एजेंसी आपको तुरंत लपकेगी और यही उम्मीद करेगी कि 2013 में वही कारनामा आप उसके लिए दोहराएं।Ó

इसका नतीजा यही होता है कि चोरी, अनैतिकता और अनुचित चलन बढ़ता है। स्कैम विज्ञापन कुछ तकलीफदेह सवाल उठाते हैं कि क्या इसके लिए प्रतिष्ठिïत मंचों पर सिर्फ पुरस्कार हासिल करने के लिए शीर्ष स्तर से दबाव डाला गया था। ये इस तरह के विज्ञापन होते हैं, जिन्हें विज्ञापन एजेंसियां महज पुरस्कार हासिल करने के लिए बनाती हैं, जिन्हें कई मर्तबा ग्राहक कंपनी की मंजूरी भी नहीं मिलती और उसके लिए भुगतान भी नहीं होता। असल में वैश्विक स्तर पर भी यही चलन है।

कान लॉयन्स इंटरनैशनल फेस्टिवल ऑफ क्रिएटिविटी को कई लोग डब्ल्यूपीपी और ऑम्निकॉम समूह के बीच प्रतिद्वंद्विता के तौर पर देखते हैं। यह सिलसिला इन पुरस्कारों की शुरुआत से ही चला आ रहा है। भारत में दिग्गज एजेंसियों के साथ काम करके अपनी खुद की एजेंसी चला रहे एक क्रिएटिव पेशेवर ने बताया, 'असल में यह तब ज्यादा बुरा हो जाता है, जब एजेंसियां इस तंत्र को संस्थागत रूप दे देती हैं।Ó क्रिएटिवलैंड एशिया के संस्थापक एवं क्रिएटिव चेयरमैन सज्जन राज कुरुप कहते हैं, 'युवा पेशेवरों के लिए शोहरत पाने का यह सबसे आसान तरीका होता है। उनके ईसीडी (एक्जीक्यूटिव क्रिएटिव डायरेक्टर) चाहते हैं कि वे ऐसा करें।

एजेंसी के मुखिया की किस्मत इन्हीं से तय होती है। उनके संगठन और नेटवर्क इस तरह के और काम की मांग करते हैं और उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि वे अपने संगठन की सृजनात्मक वृद्घि में अतुल्य योगदान कर रहे हैं।Ó अनैतिक विज्ञापन विपणन जगत की एक विस्फोटक हकीकत है, जहां उनकी एजेंसियां ब्रांड के लिए बेहतर हितों को ताक पर रखकर क्रिएटिव पुरस्कारों के लिए व्यग्र हो जाती हैं। यहां तक कि इसके लिए वे ऐसे विज्ञापनों की भी प्रविष्टिï भेज देती हैं, जिन्हें अमूमन सामान्य औपचारिक प्रक्रिया के तहत मंजूरी भी नहीं मिली होती। बहरहाल आईटीएसए के संस्थापक और चीफ इनावेशन अधिकारी इम्मेनुअल उप्पुतुरु कहते हैं कि इसके लिए केवल क्रिएटिव पेशेवरों को ही दोषी ठहराना ठीक नहीं होगा।

वह कहते हैं, 'क्रिएटिव पेशेवर विज्ञापनों की दुनिया के कद्दावर लड़ाके होते हैं। जब वह कहता है कि 'कॉटÓ यानी उसके दिमाग में कुछ विचार आया तो विज्ञापन एजेंसी में हर नजर उस पर ही अटक जाती है कि उसके दिमाग में आखिर आया क्या?Ó विज्ञापन जगत से जुड़े अधिकांश लोगों का कहना है कि अक्सर ग्राहक इसमें दखल नहीं देते। एक बेहद सम्मानित क्रिएटिव डायरेक्टर कहते हैं, 'मैं भी एक बार ऐसी ही स्थिति से गुजरा, जहां मैंने अपने ग्राहक से एक वाक्य में अपनी मांग रखने को कहा तो उन्होंने यही कहा कि मुझे एक एब्बी दिला दो।Ó एब्बी यानी ऐंड क्लब बॉम्बे अवॉड्र्स जो अब गोवाफेस्ट का हिस्सा है।  अब किसी विज्ञापन के लिए सबसे बुनियादी जरूरत उसका किसी अवॉर्ड शो में चले जाना ही है और जिस तरह से इन विज्ञापनों पर फैसला लिया जा रहा है, उससे यह प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है। एक तो यही कि किसी विज्ञापन को अवॉर्ड शो में शिरकत करने के लिए एक रिलीज की जरूरत होती है। यानी कि वह कहीं प्रदर्शित किया जा चुका हो। ऐसे में किसी छोटे-मोटे माध्यम में प्रकाशन से भी काम चल जाता है।

तब आपके सामने कुछ ऐसे नाम आते हैं, जिनका जिक्र आपने शायद पहले कहीं नहीं सुना होगा। इन अपेक्षाकृत कम मशूहर माध्यमों में विज्ञापनों की दरें काफी कम होती हैं। पब्लिकिस कैपिटल के मुख्य कार्याधिकारी हेमंत मिश्रा कहते हैं, 'आप इस अर्हता को पूरा करने के लिए दिसंबर के आसपास फ्री प्रेस जर्नल जैसे किसी प्रकाशन के असम संस्करण में भी 50 कॉलम-सेंटीमीटर का विज्ञापन देकर भी काम चला सकते हैं।Ó

दूसरा पैमाना यही होता है कि हर प्रविष्टिï के लिए ग्राहक कंपनी की मंजूरी भी जरूरी होती है, जो किसी भी स्तर से दी जा सकती है। मैक्स इंडिया में ब्रांड एवं मानव पूंजी की कार्यकारी निदेशक विभा पॉल ऋषि का कहना है, 'आज दिक्कत यही है कि तंत्र को परास्त करना आसान हो गया है। डिजिटल दौर में अब प्रकाशन के क्या मायने हैं? वर्तमान में रोजाना ही डिजिटल क्रिएटिव भाव व्यक्त होते हैं। ग्राहक पर्यवेक्षण कमजोर हुआ है।Ó एक ओर जहां ग्राहकों की नजर कुछ 'मद्घमÓ पड़ी है, वहीं पुरस्कार समारोहों में निर्णायक मंडल पहले से ही पूर्वग्रह से ग्रसित मालूम पड़ता है। पुरस्कारों पर फैसला लेने वाले हमेशा शीर्ष एजेंसियों के मुखिया होते हैं, जिसमें विज्ञापनदाताओं, विपणनकर्ताओं और ब्रांड विशेषज्ञों का प्रतिनिधित्व नहीं होता। यहां तक कि पुरस्कारों की संचालन परिषद भी विज्ञापन जगत के लोगों को लेकर उठने वाले विवादों पर भी नजर रखती है। गोवाफेस्ट की रेफरी केपीएमजी के सुझावों पर कोई सवाल उठा सकता है। इसके पास प्रविष्टिïयों को जांचने का पूरा बंदोबस्त है। मसलन यह स्कैम अभियानों को चिह्नित कर इस बात को विज्ञापनदाताओं को भी भेज सकती है। इतने इंतजाम के बाद भी स्कैम विज्ञापन गोवाफेस्ट तक पहुंच रहे हैं। निश्चित रूप से इस पूरी कवायद में कई खामियां हैं।
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मगर सवाल यही है कि आखिर गड़बड़ी को कोई कैसे रोक सकता है? स्कैम विज्ञापन केवल उसी सूरत में बंद होंगे, जब सभी पक्षों से सृजनात्मक एवं नैतिक सख्ती की जाए। मसलन इसके लिए एजेंसी, ब्रांड और नियामक सभी को साथ आना होगा। ब्रांडस्केप्स वल्र्डवाइड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक प्रणेश मिश्रा कहते हैं कि विज्ञापन जगत की तस्वीर सुधारने के लिए जरूर कदम है कि पुरस्कारों पर होने वाले फैसले और प्रशासन सहित सभी पक्षों का पूरी तरह से कायाकल्प किया जाए। उनका कहना है, 'अगर पुरस्कारों से एजेंसी का सृजनात्मक विकास होता है तो उसका लाभ ग्राहकों को भी मिलना चाहिए। मगर हमेशा ग्राहक ही नहीं जीतते। हमने यही चलन देखा है कि अक्सर निर्णायक मंडल न तो विज्ञापन सृजन के पीछे की रणनीति की चर्चा करता है और न ही उसकी वजह से ब्रिकी या बाजार हिस्सेदारी में बढ़ोतरी पर बात करता है।Ó

बदलाव रातोरात नहीं होगा। बदलाव लाने की दिशा में पहला कदम यही होगा कि प्रविष्टिï के लिए शुल्क में भारी बढ़ोतरी कर दी जाए। उसे उस स्तर तक बढ़ा दिया जाए, जहां वह अखर सकता है। इसके लिए भारी राशि चुकाने से उसका फैसला बड़े स्तर पर किया जाएगा, जिसमें न केवल विज्ञापन एजेंसी बल्कि ग्राहक के नजरिये से भी बात होगी।

तब यह सुनिश्चित हो जाएगा कि एजेंसियां बेहतरीन गुणवत्ता वाले काम का ही नामांकन कराएंगी। जब प्रविष्टिïयों की संख्या कम होगी तो निर्णायक मंडल को भी उन पर फैसला लेने के लिए ज्यादा वक्त मिलेगा। दूसरा सुझाव यही है कि निर्णायक मंडल का चुनाव उनके नैतिक विचारों के आधार पर करना चाहिए। उप्पुतुरु पारदर्शिता पर जोर देते हैं। वह कहते हैं, 'प्रविष्टिï वाले विज्ञापनों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए उन्हें निर्णायक मंडल से पहले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जारी करना चाहिए। (हालांकि इसके भी कुछ नुकसान हैं।) इसमें हर किसी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना चाहिए।Ó

इस सबसे क्या हासिल होगा? क्या एक शिल्प के तौर पर विज्ञापनों का उसके मूल मकसद की सीमाओं से परे जाकर एक कलात्मक क्षेत्र या पेशे के तौर पर आकलन करना चाहिए? यह एक ऐसी सुविधा है जो दूसरों के पास नहीं होती। मिसाल के तौर पर एक खोजी पत्रकार किसी काल्पनिक अपराध के बारे में लिखकर उसका जश्न नहीं मना सकता। न ही कोई फिल्मकार ऐसी फिल्म के लिए ऑस्कर जीतने की उम्मीद कर सकता है, जो कभी प्रदर्शित ही न हुई हो। मुंबई की एक मानव संसाधन पेशेवर का कहना है, 'अगर आप मुझसे पूछें तो एजेंसियों को अपना 'अवॉर्ड बजटÓ अपने कर्मियों के प्रोत्साहन पर खर्च करना चाहिए और उन्हें अच्छी चीजों के लिए बढ़ावा देना चाहिए ताकि वे शाबासी पाने के लिए गलत तरीके न चुनें। दूसरे उद्योगों में ऐसा ही होता है।Ó यह शुरुआत के लिए एक अच्छा बिंदु होगा।     (साथ में रंजीता गणेशन)

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