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मनोभाव में बदलाव... बनी पहेली
वीनू संधू / नई दिल्ली May 01, 2013

दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मनोचिकित्सा विभाग की प्रमुख स्मिता देशपांडे उत्तर भारतीयों में स्किट्सफे्रनिया (सिजोफ्रेनिया) के लिए जिम्मेदार जीन के व्यवहार का गहराई से अध्ययन करने में जुटी हैं। स्किट्सफे्रनिया एक तरह की मानसिक बीमारी है जो पिछले कई दशक से चिकित्सा जगत के  लिए एक पहेली बनी हुई है। वहीं दूसरी तरफ  हजारों मील दूर उनके भाई विश्वजित निमगांवकर भी इस शोध में जुटे हुए हैं कि किस तरह से स्किट्सफ्रेनिया के लिए जिम्मेदार जीन का प्रभाव काकेशस क्षेत्र की आबादी में पूरी तरह से अलग दिखता है। निमगांवकर पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय में जेनेटिक्स और साइकोसिस कार्यक्रम के प्रमुख हैं। बफेलो विश्वविद्यालय के प्रकाशित नए शोध के मुताबिक यह पाया गया है कि एक विशेष प्रकार के बदलाव की वजह से, जिसमें 160 अलग-अलग प्रकार के जीन शामिल हैं,  से दिमाग में बदलाव होता है और इसकी वजह से अधिक उम्र में लोगों को स्किट्सफ्रेनिया का सामना करना पड़ता है।

देशपांडे और निमगांवकर ने पाया कि जिन लोगों में समान प्रीडिस्पोजिंग जीन (ऐसे जीन जिनकी भूमिका स्किट्सफे्रनिया के लिए जिम्मेदार होती है) थे, उसका प्रभाव उत्तर भारतीयों और कॉकेशस मूल के लोगों में अलग-अलग पाया गया। स्किट्सफे्रनिया से पीडि़त व्यक्ति को कुछ असामान्य व्यवहार से पहचाना जाता है जिसमें भ्रम की स्थिति, आक्रामक व्यवहार और संदिग्ध स्वभाव जैसी प्रवृत्तियां शामिल हैं।

नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरो साइंस बेंगलूर में मनोचिकित्सा पुनर्वास विभाग के प्रमुख एस के चतुर्वेदी इस तरह के अध्ययनों को काफी करीब से देखते रहे हैं। वे स्किट्सफे्रनिया मरीजों को सामाजिक-मनोवैज्ञानिक उपचार की मदद से वापस समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक और चिकित्सक भी फंक्शनल इमेजिंग के जरिये इस बीमारी के कारणों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। फंक्शनल इमेजिंग एक तरह से मानव के दिमाग की कार्यप्रणाली का अध्ययन है जो कि ब्रेन इमेजिंग के बाद प्राप्त आंकड़ों के आधार पर किया जाता है। इसके पीछे का विचार मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को बेहतर तरीके से समझना है।  उन्होंने कहा कि अच्छी बात यह है कि भारत में स्किट्सफ्रेनिया के इलाज के स्थिति बेहतर रही है। चतुर्वेदी ने कहा कि स्किट्सफे्रनिया से कुल आबादी का करीब 1 फीसदी हिस्सा प्रभावित है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक वैश्विक स्तर पर प्रति हजार युवा आबादी में 7वां व्यक्ति स्किट्सफे्रनिया से प्रभावित है।

हालांकि बच्चे भी स्किट्सफ्रेनिआ से प्रभावित हो सकते हैं। गंगा राम अस्पताल में कंसल्टेंट क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट आरती आनंद एक ऐसे परिवार पर काम कर रही हैं, जहां मां और उसके दोनों बच्चे स्किट्सफ्रेनिक हैं। उन्होंने कहा, 'इस मामले को देखने पर कहा जा सकता है कि बच्चों में आनुवांशिकी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है।Ó चतुर्वेदी का कहना है कि बच्चों में सामान्य तौर पर स्किट्सफ्रीनिया के लक्षण नहीं दिखाई पड़ते लेकिन  '15 से 25 साल की उम्र में लक्षण दिखाई देते हैं।Ó इन लक्षणों में व्यक्तित्व में होने वाला बदलाव, शंकालु प्रवृत्ति, डर की प्रवृत्ति, सामाजिक अलगाव, पढ़ाई लिखाई की क्षमता में कमी, बिना कारण के हंसने की आदत, आसपास की मौजूदगी से बेपरवाह होना और साफ सफाई को लेकर असंवदेनशीलता की प्रवृत्तियां शामिल हैं।

आनंद कहती हैं, 'स्किट्सफे्रनिया एक बहु-आयामी विकृति है और आनुवांशिकी महज इसका एक हिस्सा है।Ó अन्य कई कारणों के अलावा तनाव और बचपन के अनुभवों की वजह से मस्तिष्क में बदलाव होता है। उन्होंने कहा, 'ऐसे कई लोग हैं जिनमें तनाव को सहने की बिलकुल भी शक्ति नहीं होती है और उनके लिए एक छोटा झटका मानसिक  बीमारी का कारण बन सकता है।Ó

फिल्म निर्माता अपर्णा सेन के लिए अपने परिवार का अनुभव ऐसा ही रहा जिस पर उन्होंने वर्ष 2005 में 15 पार्क एवेन्यू फिल्म बनाई। इस फिल्म को राष्टï्रीय पुरस्कार मिला। फिल्म में कोंकणा सेन, राहुल बोस और शबाना आजमी हैं और उनकी जिंदगी पर्दे पर इस मसले के इर्द गिर्द घूमती है। फिल्म में कोंकणा सेन दो तरह के यथार्थ में जीती है और पहली स्थिति उसके दिमाग की उपज है जिसमें वह बोस की पत्नी है और उनके पांच बच्चे हैं और वह 15 पार्क एवेन्यू के घर में रहती है जो कि हकीकत में है ही नहीं। अपने किसी संबंधी की ऐसी स्थिति को काफी करीब से देखने वाली सेन ने कहा, 'हमारे लिए उसकी (कोंकणा सेन) स्थिति भ्रम में रहने वाले किसी व्यक्ति की तरह है लेकिन उसके लिए यह सच्चाई है। अब आप उस व्यक्ति को यह कैसे बता सकते हैं कि  जो वह वास्तविक मान कर चल रही है वह वाकई में मौजूद ही नहीं है।Ó

शोध बताते हैं कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादातर स्किट्सफे्रनिया से पीडि़त होते हैं। चतुर्वेदी ने कहा, 'महिलाओं में संवेदनशीलता से जुड़े लक्षण ज्यादा सामने आते हैं इसलिए उनकी समस्या को जल्द पहचाना जा सकता है। हालांकि यह महज एक अनुमान है।Ó उन्होंने कहा कि अविवाहित पुरुष स्किट्सफे्रनिया से बुरी तरह प्रभावित होते हैं।

चेन्नई के स्किट्सफे्रनिया रिसर्च फाउंडेशन के मुताबिक अगर इस स्थिति को शुरुआती अवस्था में ही पहचान लिया जाए तो पूरी संभावना है कि पीडि़त व्यक्ति को दवा और मनोवैज्ञानिक-सामाजिक उपचार की मदद से समाज की मुख्य धारा में लाया जा सकता है। फाउंडेशन ने कहा कि 30 से 40 फीसदी मरीजों को पूरी तरह ठीक कर दिया जाता है जबकि 30 से 40 फीसदी आंशिक तौर पर ठीक हो पाते हैं। आनंद बताती हैं, 'भ्रम से संबंधित स्किट्सफे्रनिया की स्थिति में पूर्वानुमान काफी प्रभावी रहा है।Ó इस तरह के स्किट्सफे्रनिया के पांच प्रकार हैं-जिसका लक्षण ऑडिटरी हैलुसिनेशन, षडयंत्र और शक को लेकर भ्रम की स्थिति है। जो लोग पैरानॉएड स्किट्सफ्रेनिआ से पीडि़त होते हैं वे काम करने के योग्य होते हैं और उनकी हालत अन्य प्रकार के सिजोफ्रेनिया से ग्रसित व्यक्ति से बेहतर होती है। इसकी बड़ी मिसाल जॉन नैश हैं जिन पर ए ब्यूटीफुल माइंड नाम की फिल्म भी बनी। जॉन नैश की ख्याति एक शानदार गणितज्ञ की है और उन्हें अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार भी मिला।

एक स्थिति कैटाटोनिक सिजोफ्रेनिया की है जिसमें गतिविधि क्षमता का व्यापक तौर पर ह्रïास होता है और व्यक्ति एक ही जगह पड़े रहने के लिए मजबूर हो जाता है।  बफेलो विश्वविद्यालय के हालिया शोध के मुताबिक वैज्ञानिकों ने शायद पहले मॉडल को खोज निकाला है जिससे इस बात का पता लगाया जा सकता है कि इंटीग्रेटिव न्यूक्लियर एफजीएफआर 1 सिग्नलिंग (आईएनएफएस पाथवे) में आई गड़बड़ी की वजह स्किट्सफ्रे निया की समस्या उत्पन्न होती है। हालांकि विज्ञान अभी भी अन्य कारकों मसलन, पर्यावरण, मनोवैज्ञानिक और जैव मनोविज्ञान के संबंधों को तलाशने में लगा हुआ है जिससे स्किट्सफे्रनिया के कारणों को स्पष्टï किया जा सकता है। लेकिन फिलहाल रहस्य की स्थिति बनी हुई है।

Keyword: Health , Pscylogy, मनोचिकित्सा विभाग,
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