बिजनेस स्टैंडर्ड - अवैध निर्माण पर सरकारी 'हथौड़ा'
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अवैध निर्माण पर सरकारी 'हथौड़ा'
सुशील मिश्र / मुंबई April 28, 2013

पिछले महीने मुंब्रा इलाके में अवैध इमारत ढहने से करीब 80 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा और दर्जनों लोग आज भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। इस हदासे के बाद मुंबई और आस-पास के इलाकों में बन रही अवैध इमारतों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए प्रशासन कमर कस चुका है और 1 लाख से ज्यादा इमारतें तोडऩे का फरमान भी आ गया है। अब सवाल यह है कि इन इमारतों में रहने वालों का क्या होगा? दूसरा अहम सवाल यह है कि उन बिल्डरों, महानगर पालिका अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी, जिनके संरक्षण में अवैध इमारतों का जमावड़ा हो गया है?

कल्याण-डोबिवली, ठाणे, वसई, विरार, उल्हासनगर और मीरा-भायंदर इलाकों में 1 लाख से ज्यादा अवैध इमारतें बनाई गई हैं, जिन्हें तोडऩे का आदेश बंबई उच्च न्यायालय ने दिया है। मुंब्रा हादसे के बाद दबाव में आया प्रशासन कार्रवाई शुरू भी कर चुका है। महाराष्टï्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण कहते हैं कि अवैध इमारतों के मामले में पूरी सख्ती बरती जाएगी। इमारतें तोड़ी जाएंगी और उन्हें बनाने वाले बिल्डरों पर भी कार्रवाई होगी। इमारतें महानगरपालिका के जिन अधिकारियों के समय में बनी थीं, उन पर और संबंधित पुलिस अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी।

हालांकि लोग चव्हाण की बात से प्रभावित नहीं हैं। उनका कहना है कि दो-चार इमारतें तोड़ी जाएंगी, कुछ दिन अवैध काम रुका रहेगा और बाद में सब कुछ पहले की तरह चलने लगेगा।
महानगर पालिकाओं से मिली जानकारी के मुताबिक कल्याण-डोबिवली इलाके में 76500 इमारतें अवैध हैं। पिछले चार साल में इस क्षेत्र में करीब 6000 इमारतें जमींदोज की जा चुकी हैं। मीरा-भायंदर में करीब 40000 इमारतें अवैध घोषित की गई हैं, जिनमें बमुश्किल दो दर्जन ही ढहाई गई हैं। हालांकि मुंबई में ज्यादा सख्ती दिखाई गई है। यहां 22000 अवैध इमारतों में 15280 साल भर में ही तोड़ी जा चुकी हैं।

इस बीच अवैध इमारतों पर सख्ती की राजनीति भी गरमाने लगे हैं। ठाणे महानगर पालिका में तकरीबन सभी राजनीतिक दल इसके विरोध में सड़क पर उतरने की धमकी दे रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को बदले में मुआवजा और रहने की जगह देनी चाहिए। इसके पीछे की वजह प्रमोद जेठे बताते हैं, जो लंबे अरसे से ऐसी इमारतों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बताया, 'कुछ साल पहले सरकार ने उल्हासनगर की अवैध इमारतों को वैध कर दिया था। इसके बाद अवैध निर्माण करने वाले मानते हैं कि जनता के दबाव में सरकार बाकी इमारतों को भी वैध कर देगी। बिल्डरों के मन से भी अब कानून का डर निकल गया। इसीलिए सरकार 1 इमारत तोड़ती है तो 10 अवैध इमारतें बन जाती हैं।Ó

बड़े भवन निर्माता बताते हैं कि अवैध इमारतों की लागत भी कम आती है क्योंकि बगैर नियम-कानून और मंजूरियों के इन्हें बनाना सस्ता पड़ता है। ऐसे बिल्डरों और उनके एजेंटों की पहुंच बैंक अधिकारियों तक भी होती है, जिसके कारण बैंकों से कर्ज भी मिल जाता है।

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