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ईपीएफ ने मारी एनपीएस से बाजी!
नेहा पांडेय देवरस और शिवानी शिंदे /  April 24, 2013

एक प्रमुख सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी में काम करने वाले बेंगलूर के 30 वर्षीय डर्क लुइस अगले वित्त वर्ष (2014-15) से राष्टï्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) चुनने की तैयारी में हैं। दरअसल उनकी कंपनी अपने कर्मचारियों को अनिवार्य कर्मचारी भविष्य निधि कोष (ईपीएएफ) के अलावा एनपीएस चुनने का विकल्प भी देती है। लुइस कहते हैं, 'एनपीएस से मुझे अधिक कर बचाने में मदद मिलेगी। साथ ही मैं जानता हूं कि मैं तभी पैसे बचा सकता हूं जब मेरे ऊपर दबाव हो। इस तरह एनपीएस की मदद से मैं अपनी सेवानिवृत्ति तक अच्छी खासी रकम जमा कर लूंगा। इस साल मेरे खर्च कुछ अधिक हैं, इस कारण से मैं एनपीएस में योगदान नहीं दे पाऊंगा।Ó इन्फोसिस, विप्रो, रिलायंस इंडस्ट्रीज, मुथूट फाइनैंस, कोलगेट-पामोलिव, कैपजेमिनाई और पैंटालून समेत कई कंपनियां एनपीएस का विकल्प उपलब्ध कराती हैं। विप्रो के महाप्रबंधक और वैश्विक प्रमुख (मुआवजा और सुविधाएं) समीर गाडगिल बताते हैं कि उनकी कंपनी में कर्मचारी ईपीएफ के साथ एनपीएस में भी खासी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वह कहते हैं, 'औसतन सालाना योगदान 4 से 6 करोड़ रुपये के करीब है। और हर साल इसे अपनाने वाले कर्मचारियों की संख्या बढ़ती जा रही है।Ó गाडगिल ने बताया कि विप्रो उत्पाद डायवर्सिफिकेशन के लिए और ईपीएफ में स्वैच्छिक योगदान के विकल्प के तौर पर एनपीएस की सिफारिश करती है। कुछ कंपनियां कहती हैं कि ज्यादातर 30 से 35 साल आयु वर्ग के लोग एनपीएस में योगदान दे रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि इसके तहत इक्विटी में निवेश किया जाता है जिनकी वजह से करीब 30 सालों में उन्हें अच्छा रिटर्न मिल सकता है।


मुथूट फाइनैंस के प्रबंध निदेशक जॉर्ज अलेक्जेंडर मुथूट का मानना है कि एनपीएस की मदद से उनके कर्मचारी अच्छा खासा सेवानिवृत्ति कोष तैयार कर लेंगे। कंपनी दो तरह से अपने कर्मचारियों को निवेश का विकल्प मुहैया करा सकती है, एक तो सबस्क्राइबर स्तर पर जिसमें कर्मचारियों को यह छूट होगी कि वे पेंशन फंड प्रबंधक और ऐसेट आवंटन का चयन कर सकें और दूसरा कंपनी स्तर पर जिसमें यह कंपनी तय करती है कि फंड प्रबंधक और ऐसेट अलोकेशन क्या होगा। अगर कंपनी स्तर पर चयन की बात करें तो कंपनी वह पोर्टफोलियो चुन सकती है जो केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए अनिवार्य है और कंपनी तीन सरकारी फंड प्रबंधकों- एलआईसी पेंशन फंड, एसबीआई पेंशन फंड और यूटीआई रिटायरमेंट सॉल्यूशन में से एक चुन सकती है।

लोगों को बस इतना करना है कि वे एनपीएस योजना को अपनाएं और अपने नियोक्ता से कहें कि वह हर महीने या हर साल एक निश्चित रकम उनकी आय में से काट कर इसमें डाल दें। कई कंपनियां भी अपने कर्मचारियों के एनपीएस में योगदान देकर आय कर की धारा 80सीसीई के तहत कर छूट का लाभ उठाती हैं और इसे अपने नुकसान-नफा के खाते में कारोबारी खर्च के तौर पर दिखाती हैं। मूल और महंगाई भत्ते के 10 फीसदी तक नियोक्ता द्वारा किया गया योगदान भी कर छूट के दायरे में आता है लेकिन नियोक्ता कर्मचारी के वेतन से अपनी इस हिस्सेदारी को बाद में घटा देते हैं।

ज्यादातर कंपनियां कर्मचारियों से कम से कम 6,000 रुपये सालाना या 500 रुपये हर महीने योगदान की मांग करती हैं। कई कंपनियों ने वेब सेमिनार, समूह चर्चा और अपने कैंपस में हेल्पडेस्क के जरिये कर्मचारियों के बीच एनपीएस को लेकर जागरूकता बढ़ाने का काम किया है। हालांकि वित्तीय योजनाकार एनपीएस (ईपीएफ की तुलना में) को लेकर खास उत्साहित नहीं हैं। हालांकि इन दोनों की तुलना करना कहीं से भी उचित नहीं होगा क्योंकि ईपीएफ पूरी तरह से एक डेट उत्पाद है जबकि एनपीएस की रकम इक्विटी में भी निवेश की जाती है। वित्तीय योजनाकार अर्णव पांड्या का मानना है कि ईपीएफ उन लोगों के लिए है जिन्हें निवेश की बहुत अच्छी समझ नहीं है।

लेकिन एनपीएस उन लोगों के लिए है जिन्हें निवेश की अच्छी समझ है और जो खुद से फंडों का चयन कर सकते हैं। मुंबई के वित्तीय योजनाकार गौरव मशरूवाला मानते हैं कि मौजूदा स्वरूप में ईपीएफ, एनपीएस से बेहतर है। मशरूवाला कहते हैं, 'सीधे शब्दों में कहें तो ईपीएफ अंश मात्र ही बाजार पर निर्भर करता है, उतना ही जितना सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है, जबकि एनपीएस 50 फीसदी बाजार पर निर्भर करता है क्योंकि इसमें इक्विटी में निवेश अधिक है। इस तरह ईपीएफ में रिटर्न सुरक्षित है, लेकिन एनपीएस में नहीं। एनपीएस में निवेश पर एक छोटी सी रकम खर्च करनी पड़ती है पर ईपीएफ के साथ ऐसा नहीं है।Ó साथ ही एनपीएस में निकासी की सीमाएं होती हैं, ईपीएफ में नहीं- ईपीएफ में कुछ खास उद्देश्यों के लिए निकासी की छूट होती है (जैसे मकान बनाने के लिए, शादी के लिए या फिर बीमारी के लिए)। लेकिन एनपीएस में समय से पहले रकम निकालने पर खाता बंद कर दिया जाता है। साथ ही मुश्किल समय में आप चाहें तो ईपीएफ में निवेश बंद कर सकते हैं लेकिन एनपीएस के साथ ऐसा नहीं है। कोई भी 60 साल की उम्र से पहले एनपीएस कोष का 20 फीसदी निकाल सकता है मगर बाकी की रकम का इस्तेमाल ऐन्युटी खरीदने के लिए करना पड़ता है।

उद्योग के एक जानकार बताते हैं, 'हाल ही में मैं एक फंड प्रबंधक से मिला था जिन्होंने मुझे बताया कि वह एनपीएस ऐसेट प्रबंधन से पैसा नहीं बना पाते, बाजार की हालत को देखकर शायद ही वह कभी पोर्टफोलियो में कोई बदलाव करते हैं।Ó अगर फंड प्रबंधकों को ठीक ठाक भुगतान नहीं किया जाए तो जल्द ही रिटर्न कम होने लगेगा। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इस योजना को निवेशकों के अनुकूल बनाना चाहिए। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) अपने अंशधारकों को  8.5 फीसदी का रिटर्न दिया है जबकि अगस्त 2012 तक एनपीएस ने 6 से 11 फीसदी का रिटर्न दिया है, यानी कि औसतन 8.5 फीसदी रिटर्न। हालांकि एनपीएस को बेहतर रिटर्न मुहैया कराना चाहिए क्योंकि इसमें इक्विटी में भी निवेश किया जाता है।

फ्रीडम फाइनैंशियल प्लैनर्स के सुमित वैद्य के मुताबिक कई कंपनियों का मानना है कि अगर ईपीएफ की रकम का प्रबंधन खुद किया जाए तो इससे 9 से 9.5 फीसदी की बेहतर रिटर्न मिल सकता है। ऐसे में एनपीएस में निवेश करने मेें कोई समझदारी नहीं है। लुइस की तरह ही कई लोग एनपीएस को कर बचाने की योजना के तौर पर देखते हैं। हालांकि इस लिहाज से भी यह योजना आकर्षक नहीं है। एक कर्मचारी की मूल आय और महंगाई भत्ते के 10 फीसदी के बराबर का योगदान ही आय कर की धारा 80सीसीडी (यह रकम धारा 80सी के तहत 1 लाख रुपये की सीमा के अंतर्गत है) के तहत कर छूट के दायरे में आता है। ज्यादातर कर प्रदाता ईपीएफ योगदान के जरिये ही धारा 80सी की सीमा के एक बड़े हिस्से का इस्तेमाल कर लेते हैं। ऐसे में एनपीएस में निवेश से शायद ही कोई फायदा होता है।

एनपीएस से निकासी पर मौजूदा स्लैब दर के हिसाब से कर वसूला जाता है और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली ऐन्युटी के साथ भी ऐसा ही होता है। इसलिए मशरूवाला ईपीएफ या फिर सार्वजनिक भविष्य निधि कोष की सलाह देते हैं। अगर आप सेवानिवृत्ति के लिए इक्विटी में निवेश करना चाहते हैं तो आप इक्विटी आधारित बैलेंस्ड फंड का चयन कर सकते हैं। म्युचुअल फंड रेटिंग एजेंसी वैल्यू रिसर्च के मुताबिक पिछले साल इक्विटी आधारित बैलेंस्ड फंडों से तकरीबन 7 फीसदी का रिटर्न हासिल हुआ है। वित्तीय विशेषज्ञों का भी मानना है कि स्वरोजगार में लगे लोगों के लिए भी एनपीएस से बेहतर पीपीएफ है क्योंकि पीपीएफ में 1 लाख रुपये तक का निवेश कर मुक्त है।

गाडगिल कहते हैं कि कोई कर्मचारी कंपनी छोडऩे के बाद भी एनपीएस खाते का इस्तेमाल जारी रख सकता है जबकि वैद्य इस पर शक जताते हुए कहते हैं कि क्या कोई कर्मचारी इतना अनुशासित होगा कि वह नौकरी बदलने के बाद भी एनपीएस में निवेश करता रहे वह भी तब जबकि मुमकिन है कि नई कंपनी में एनपीएस का विकल्प ही न हो।Ó वह ईपीएफ/पीपीएएफ, डेट फंडों और इंडेक्स फंडों में अलग अलग निवेश की सलाह देते हैं। पिछले एक साल में बीएसई सेंसेक्स ने करीब 9 फीसदी का रिटर्न दिया है जबकि नैशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी से 8 फसदी का रिटर्न मिला है। कर बचाने के लिहाज से भी देखें तो इक्विटी फायदेमंद है।

Keyword: EPF, Fund Transfer, PF, अंशधारक भविष्य निधि ,,
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