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मुश्किल डगर
संपादकीय /  April 14, 2013

फरवरी 2013 के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के आंकड़े बीते शुक्रवार को जारी किए गए। आंकड़ों के मुताबिक फरवरी 2012 के मुकाबले आंकड़ों में महज 0.6 फीसदी की वृद्घि दर्ज की गई। आमतौर पर तो ऐसे आंकड़ों पर खूब लिखा जाता और तमाम तरह का रोना रोया जाता लेकिन आज जो हालात हैं उनमें यह किसी तरह के झटके के बजाय राहत की बात थी।

इसलिए क्योंकि अधिकांश विश्लेषकों ने इस वृद्घि के नकारात्मक होने का अनुमान जताया था। इसकी व्याख्या इस तरह की जा सकती है मानो ऐसी सकारात्मक खबरें इसलिए आ रही हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था अपने निचले स्तर पर पहुंच चुकी है और अब यहां से केवल सुधार ही संभव है। सरकारी प्रवक्ता समय-समय पर ऐसी व्याख्या करते रहते हैं लेकिन इसमें कुछ हद तक सचाई है, खासतौर पर यह देखते हुए कि पिछले कुछ महीनों के दौरान आए आंकड़ों में और गिरावट देखने को नहीं मिली है। लेकिन यह हकीकत है कि स्थिरता स्थायी सुधार की गारंटी नहीं है, विकास में तेजी की तो बात ही दूर है। सूचकांक के कुछ घटकों के आंकड़े ये संकेत देते हैं कि अभी भी ढांचागत अवरोध एवं क्षेत्रों के मौजूदा प्रदर्शन में अस्थिरता मौजूद है। उदाहरण के लिए खनन क्षेत्र की बात करते हैं। फरवरी 2012 के मुकाबले इस क्षेत्र में कुल मिलाकर 8.5 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। ऐसा तब था जबकि विनिर्माण क्षेत्र में 2.2 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हुई, क्योंकि इससे पता चलता है कि खनिज पदार्थों की खपत में कुछ बढ़ोतरी हुई है। प्राथमिक तौर पर देखें तो खराब प्रदर्शन की सबसे बड़ी वजह थी लौह अयस्क खनन पर लगातार लगी रोक। उसकी वजह से न केवल घरेलू लौह एवं इस्पात उद्योग को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है बल्कि निर्यात राजस्व पर भी भारी असर हो रहा है। इसके चलते भुगतान संतुलन की समस्या पैदा हो रही है। पर्यावरण मानकों के प्रवर्तन को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच बना गतिरोध यकीनन आर्थिक प्रदर्शन पर असर डाल रहा है। कुछ खास समूहों और उत्पादों के प्रदर्शन को देखने से यह पता चलता है कि इस अवधि में सकारात्मक विकास मोटे तौर पर पूंजीगत वस्तुओं की वजह से हुआ जिनमें 9.5 फीसदी की गति से वृद्घि हुई। यह रुझानों के एकदम विपरीत है। वास्तव में किसी भी क्षेत्र में निवेश में कोई सुधार नहीं नजर आ रहा।

नजदीकी से निगाह डालें तो पता चलता है कि इसका बड़ा हिस्सा 'इलेक्ट्रिकल मशीनरी और यंत्रोंÓ से आ रहा है जो कहीं अलग से वर्गीकृत नहीं हैं। इनमे ं पिछले एक साल की तुलना में 73 फीसदी की वृद्घि देखने को मिली! फरवरी में इस शानदार प्रदर्शन के बावजूद औद्योगिक उत्पादन अप्रैल-फरवरी के दौरान 4.3 फीसदी की गिरावट देखने को मिली। क्या यह सूचकांक के आंकड़ों में एक और खामी का संकेत है? या फिर यह उद्योग जगत में आया तीव्र सुधार है? ंतेज वृद्घि और गिरावट की कई अन्य घटनाओं को भी महसूस किया जा सकता है। शायद, आखिर में वे एक दूसरे को परस्पर काटते हुए समूचे सूचकांक को वास्तविक स्थिति के करीब छोड़ें।

अगर ऐसा है तो गत शुक्रवार को ही जारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में मार्च 2013 के आंकड़े निराश ही करते हैं। पिछले माह के मुकाबले कुछ गिरावट के बावजूद मुद्रास्फीति 10 फीसदी से ऊंची बनी हुई है। जैसा कि भारतीय रिजर्व बैंक काफी समय से कहता रहा है इससे धीमे विकास के प्रति मौद्रिक नीति संबंधी उपाय सीमित हो जाते हैं। अब गेंद सरकार के पाले में है और समय बहुत तेजी से बीत रहा है।

Keyword: Editorial, संपादकीय, BS Editorial, IIP, Industrial Production Index, औद्योगिक उत्पादन सूचकांक,
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