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महिला-पुरुषों को अलग करने से बढ़ती जाएगी खाई
जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  March 28, 2013

यह दुखद है कि देश में महिलाओं के अधिकारों (या उनके अभाव) पर लोगों का ध्यान तब गया, जब राजधानी में करीब साढ़े तीन महीने पहले हुए खौफनाक सामूहिक बलात्कार में एक मासूम लड़की को अपनी जान गंवानी पड़ी। लेकिन इस मसले पर राजनीतिक गलियारों और अधिकारियों से मिली प्रतिक्रिया बेहद असंतोषजनक रही।  बात की पुष्टि उत्तर भारत के शहरों में होली के समय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने वाली महिलाएं भी कर सकती हैं। हकीकत यह है कि 'अतुल्य भारत' के विज्ञापनों में सरकार जिस होली के त्योहार को बेहद उत्साह और रंगों भरा बताकर विदेशियों को लुभा रही है वह उत्तर और पूर्वी भारत के मदोन्मत पुरुषों के लिए महिलाओं के साथ बदतमीजी और छेड़छाड़ करने का एक बहाना बनकर रह गया है।
इसलिए भले ही मीडिया ने महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों को तवज्जो देना शुरू कर दिया हो लेकिन राजनीतिक दलों ने एक बार फिर इन मामलों के प्रति उदासीनता दिखानी शुरू कर दी है। सबसे दुखद बात तो यह है कि महिलाओं के अधिकार किसी के भी राजनीतिक एजेंडे में शामिल नहीं हैं और यही वजह है कि आज तक इस मुद्दे को हमारे द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों (महिलाओं और पुरुष) की ओर से एक रचनात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है। अब दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का ही उदाहरण ले लीजिए । वह इस पद के लिए चौथी बार चुनाव लडऩे की तैयारी कर रही हैं लेकिन दुनिया में बलात्कार की राजधानी करार दी जा चुकी दिल्ली को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाने या शहर की छवि सुधारने की खातिर उन्होंने कोई योजना बनाने का संकेत नहीं दिया है। वह लगातार यही शिकायत करती रहती हैं कि दिल्ली पुलिस पूरी तरह उनके अधिकारक्षेत्र में नहीं आती है और केंद्र सरकार कमजोर है। वह कांग्रेस की मुख्यमंत्री हैं और कांग्रेस की अगुआई वाला गठबंधन पिछले नौ साल से सत्ता में है। क्या पुलिस में सुधार के लिए श्रीमती दीक्षित इस संबंध का फायदा नहीं उठा सकती थीं जबकि वह नेहरु-गांधी परिवार से नजदीकियों का बखान करने का कोई अवसर नहीं छोड़तीं?
जैसा कि हर सामाजिक बुराई के साथ होता है कि कोई भी उसका समाधान तब तक नहीं करता जब तक कि उसे कोई फायदा नहीं हो रहा हो। लंबे समय से लैंगिक समानता के प्रति रवैया अपमानजनक रहा है। नब्बे के दशक में आई एक मानव विकास रिपोर्ट के आंकड़ों ने सारी दुनिया के सामने भारत में महिलाओं के उत्पीडऩ की भयावह तस्वीर पेश की। इस रिपोर्ट पर जो प्रतिक्रिया मिली वह काफी हास्यास्पद थी। सुझाव आया कि संसद में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण होना चाहिए। यह बेहद मूर्खतापूर्ण प्रतिक्रिया थी और हैरानी की बात नहीं कि यह पिछले 17 साल से लोकसभा में लंबित पड़ी है।  2003 में पी चिदंबरम, जो जाहिर तौर पर भारत के सबसे प्रगतिशील वित्त मंत्री रहे हैं, ने 'जेंडर बजटिंग' का विचार शुरू किया। यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है क्योंकि इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि महिलाओं और पुरुषों के बीच सार्वजनिक संसाधनों का वितरण समान रूप हो।
पिछले महीने संसद ने एक कानून पारित किया, जो कार्यस्थल पर किसी भी तरह के यौन उत्पीडऩ से महिलाओं की रक्षा करेगा। जबकि उच्चतम न्यायालय करीब 16 साल पहले दिशानिर्देश जारी कर चुका था। जाहिर तौर पर यह महिलाओं की बेहतरी के लिए उठाया गया एक छोटा सा कदम है लेकिन महज शिक्षित और पेशेवर महिलाओं के लिए। इससे उन महिलाओं की समस्या का समाधान नहीं होगा, जो घरों में, छोटे असंगठित संयंत्रों और निर्माण स्थलों पर काम करती हैं।
गत दिसंबर में दिल्ली हादसे के बाद एक घोषणा की गई जिसका काफी मखौल उड़ा लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अभी तक इस प्रस्ताव को वापस क्यों नहीं लिया गया है। यह है आम बजट में चिदंबरम द्वारा प्रस्तावित महिलाओं का बैंक। गुडग़ांव प्रशासन द्वारा सिर्फ महिलाओं के लिए बस जैसी  'आरक्षण' वाली नीतियों की काफी निंदा हुई है और होनी भी चाहिए। किसी युवा महिला पेशेवर ने मजाक करते हुए कहा कि सिर्फ महिलाओं के लिए गलियां क्यों नहीं बनी अभी तक?
हम पुरुषों और महिलाओं को जितना ज्यादा अलग रखेंगे, महिलाओं के लिए हालात उतने ही खराब होंगे। यह 'समान लेकिन अलग' जैसा ही कानूनी सिद्घांत है, जो अमेरिका में हुए गृह युद्घ के बाद अस्तित्व में आया था, जिसे अश्वेतों पर लागू होता था। इससे उनकी दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। आखिरकार इस सिद्घांत को पचास के दशक में उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया। यह महज संयोग नहीं है कि महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध उन्हीं राज्यों में होते हैं, जहां उन्हें पैदा होने से पहले या तुरंत बाद मार दिया जाता है, जिससे पुरुषों की संख्या महिलाओं से ज्यादा रहे। हम अन्य देशों में लागू पर्दा प्रथा की भत्र्सना करते हैं लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में भी यह हर स्तर पर दिखता है। ज्यादातर सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था या सार्वजनिक सेवाओं का लाभ उठाने के लिए अलग कतारें होती हैं। इसलिए क्योंकि सार्वजनिक स्थलों पर दोनों का मिलना-जुलना सुरक्षित नहीं है।
अगर लैंगिक समानता के लिए व्यावहारिक योजनाएं बनाई जाएं जो उनके कामयाब होने की संभावना ज्यादा है। यह बात दक्षिण पूर्वी एशिया में साफ देखी जा सकती है, जहां कपड़ा, परिधान और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों ने महिला कर्मचारियों की मांग काफी बढ़ाई है, जिन्हें अपने अधिकारों का अच्छी तरह ज्ञान है। इस बात ने न सिर्फ इन देशों के सामाजिक ढांचे को बदला है बल्कि प्रशासन को भी ज्यादा सुरक्षित माहौल बनाने के लिए प्रेरित किया है। एशियाई प्रतिस्पर्धियों से पिछडऩे से पहले भारतीय बीपीओ उद्योग ने इस दिशा में उम्मीद जताई थी। जहां तक कपड़ा उद्योग की बात है तो भारत ने 80 के दशक के बाद से खुद अपने इस उभरते उद्योग को बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। व्यापक विनिर्माण क्षेत्र की हालत इतनी खस्ता है कि यह पुरुषों को ही पर्याप्त रोजगार नहीं मुहैया करा पा रहा है तो महिलाओं की बात तो छोड़ ही दीजिए।

Keyword: Women Rights, Media, Political Parties,
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