बिजनेस स्टैंडर्ड - मुश्किलें कम नहीं दूसरे चरण में
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मुश्किलें कम नहीं दूसरे चरण में
सुरजीत दास गुप्ता /  March 12, 2013

डिजिटल टीवी को अपनाने के लिए 38 शहरों में जो मियाद दी गई थी उसमें महज ढाई हफ्तों का समय रह गया है। इस उद्योग से जुड़ी कंपनियों के पास मौके का फायदा उठाने के लिए इतना ही समय बचा है। इस उद्योग की रिपोर्टों के अनुसार केबल टीवी वाले 1.2 करोड़ घरों में से केवल एक चौथाई घरों में सेट-टॉप बॉक्स लगाए गए हैं। उद्योग के कई जानकारों के मुताबिक सरकार का यह दावा बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है कि केबल टीवी वाले 47 लाख घर सेट-टॉप बॉक्स अपना चुके हैं।

जानकारों का यह भी कहना है कि इन शहरों में टीवी केबल उपभोक्ताओं के यहां सेट-टॉप बॉक्स लगाने में अभी 3 से 4 महीनों का समय और लगेगा। हालांकि सरकार 31 मार्च की मियाद से आगे की मोहलत देने को तैयार नजर नहीं आ रही है। टीवी वाले घरों में डिजिटाइजेशन का यह दूसरा दौर है। पहला चरण पिछले साल अक्टूबर में पूरा हो चुका है जिसके तहत चार मेट्रो शहरों: दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में एक करोड़ घरों में डिजिटाइजेशन का काम निपटाया जा चुका है।
प्रमुख चुनौतियां
टीवी प्रसारण कारोबार की अर्थव्यवस्था बदलने के लिए दूसरा चरण बेहद महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें काफी सारा पैसा निवेश किया गया है। एमएसओ (मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स) जैसे कि हैथवे ने दूसरे चरण में सेट टॉप बॉक्स खरीदने और केबल लगाने के लिए 1,200 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं और कंपनी जल्द से जल्द अपने निवेश पर प्रतिफल हासिल करना चाहती है। पहले चरण के तहत चारों मेट्रो शहरों को भी जोड़ दें तो कंपनी अब तक 3,000 करोड़ रुपये का निवेश कर चुकी है। प्रसारणकर्ताओं की नजरें भी इस ओर हैं। केबल नेटवर्क के आंकड़े काफी कम कर के पेश किए जाते हैं, इस वजह से प्रसारणकर्ताओं को सब्सक्रिप्शन राजस्व का महज एक छोटा सा हिस्सा ही हासिल हो पाता है। यही वजह है कि प्रसारणकर्ता भी चाहते हैं कि जल्द से जल्द डिजिटाइजेशन का काम पूरा किया जाए।

स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर महज कुछ हफ्ते पहले इस बात को लेकर चिंतित थे कि उद्योग से जुड़ी रिपोर्ट उत्साहजनक नहीं हैं। उन्होंने कहा था, 'संसद एक विधेयक पारित कर चुका है और हमें उम्मीद है कि सरकार अपनी मियाद पर अड़ी रहेगी। इससे काफी पैसा जुड़ा हुआ है।Ó दूसरे दौर के डिजिटाइजेशन के बाद भारत में प्रसारण की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। दूसरा चरण पूरा होने के बाद देश भर के 8 करोड़ केबल टीवी वाले घरों में 27 फीसदी डिजिटल छतरी के नीचे आ चुके होंगे। कुल सब्सक्रिप्शन राजस्व में इनकी 50 फीसदी हिस्सेदारी होगी।

फिलहाल कार्यक्रम और चैनलों की रेटिंग पर टैम की रिपोर्ट में 75 फीसदी वेटेज इन्हीं शहरों का है। टैम की इसी रिपोर्ट को देखकर कंपनियां विज्ञापन पर अपना पैसा खर्च करती हैं। साथ ही विज्ञापनदाता जिन दर्शकों को लक्ष्य करती हैं उनमें से 60 फीसदी इन्हीं शहरों में रहते हैं। प्रसारणकर्ताओं का कहना है कि इन 38 शहरों में राजस्व पैदा करने की असीम संभावनाएं हैं। पहली बात यह है कि केबल सेवा की गुणवत्ता इन शहरों में काफी कमजोर रही है। साथ ही ऐनालॉग की वजह से उपभोक्ताओं के पास चैनलों के भी सीमित विकल्प हैं। जी टर्नर और स्टार डेन की संयुक्त उपक्रम वितरण कंपनी मीडियाप्रो के मुख्य परिचालन अधिकारी गुरजीव सिंह कपूर के मुताबिक, 'फिलहाल केबल ऑपरेटर ऐनालॉग प्रणाली में अधिकतम 80 चैनल दिखाते हैं जो कि चार गुना बढ़कर 350 हो जाएगा और इस तरह उपभोक्ताओं के पास अधिक विकल्प होंगे और उन्हें बेहतर गुणवत्ता हासिल होगी।Ó फिलहाल इन शहरों में औसत मासिक एआरपीयू (प्रति उपभोक्ता औसत राजस्व) 180 से 200 रुपये है, मगर डिजिटाइजेशन के बाद इनमें 10 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। इस बढ़ोतरी के बाद चारों मेट्रो में राजस्व कमोबेश एआरपीयू के बराबर हो जाएगा।

फिलहाल स्थानीय केबल ऑपरेटर एक तिहाई सब्सक्राइबर की जानकारी ही नहीं देते हैं जिससे प्रसारणकर्ताओं को सबस्क्रिप्शन हिस्सेदारी में नुकसान उठाना पड़ता है। फिलहाल स्थानीय केबल ऑपरेटरों द्वारा सही जानकारी नहीं देने के कारण प्रसारणकर्ताओं को कुल 1,500 करोड़ रुपये के कुल सब्सक्राइबर राजस्व में से केवल 1,000 करोड़ रुपये ही हासिल होता है। डिजिटाइजेशन के बाद यह अंतर कम होने की उम्मीद की जा रही है क्योंकि तब हर सेट टॉप बॉक्स की जानकारी मिल सकेगी।
बाकी है काम केबल ऑपरेटरों का कहना है कि पहले चरण का ही बहुत सारा काम अभी पूरा होना बाकी है। सेट टॉप बॉक्स लगाने के बाद स्थानीय केबल ऑपरेटरों को उपभोक्ताओं से नो-यॉर कस्टमर (केवाईसी) फॉर्म भरवाना है जिसमें यह बताना होगा कि उपभोक्ताओं को कौन से चैनल पसंद हैं।

इस तरह एक विशिष्टï उपभोक्ता पहचान तैयार की जाएगी और बिल तैयार किए जाएंगे। केबल ऑपरेटर बताते हैं कि इस पर अभी काम हुआ ही नहीं है। केबल ऑपरेटर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रूप शर्मा बताते हैं, 'एमएसओ हमें रेट कार्ड नहीं दे रहे हैं तो फिर हम उपभोक्ताओं से केवाईसी कैसे भरवा सकते हैं।Ó शर्मा ने बताया कि फौरी समाधान के तौर पर एमएसओ ने प्रसारणकर्ताओं और स्थानीय केबल ऑपरेटरों के साथ थोक दर पर डील कर लिया है। सब्सक्राइबर से हासिल होने वाले वास्तविक राजस्व की जगह पर वे हर सेट टॉप बॉक्स के लिए 100 रुपये वसूल रहे हैं। शर्मा पूछते हैं, 'डिजिटाइजेशन से क्या बदलाव पैदा हुआ है।Ó सब्सक्राइबर की पूरी जानकारी नहीं देने के लिए एमएसओ स्थानीय केबल ऑपरेटरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। वे कहते हैं कि अगर उन्हें पूरी जानकारी मिल जाएगी तो वे अपनी ओर से बिल भेजने लगेंगे और इसी से बचने के लिए स्थानीय केबल ऑपरेटर सब्सक्राइबर उन्हें जानकारी मुहैया नहीं करा रहे हैं। उन्हें डर है कि दूसरे दौर में भी ऐसी ही समस्या देखने को मिलेगी।

एमएसओ संगठन के एक सदस्य का कहना है, 'कई एमएसओ को तो 20 फीसदी सब्सक्राइबर के सूचना पत्र भी नहीं मिले हैं। हां यह तो है कि अगर कोई व्यक्ति मासिक सब्सक्रिप्शन शुल्क अदा नहीं करता है तो उसका कनेक्शन कभी भी बंद किया जा सकता है। मगर इस प्रक्रिया में काफी समय लग रहा है।Ó प्रसारणकर्ताओं ने बताया कि शहरों में सेट टॉप बॉक्स लगाने का काम धीमा हो चुका है और अब केवल एक ही तरीका बचा है कि एमएसओ कड़ा रुख अपनाएं।

स्थानीय केबल ऑपरेटरों की कुछ दूसरी शिकायतें भी हैं। उनका कहना है कि उपभोक्ता सेट टॉप बॉक्सों पर खर्च करना नहीं चाहते हैं। पुणे के एक केबल ऑपरेटर मटोबा केबल नेटवक्र्स के एक प्रमुख अधिकारी बताते हैं, 'हमने केवल 25 फीसदी घरों में डिजिटाइजेशन पूरा किया है। उपभोक्ता बॉक्स खरीदने को तैयार नहीं हैं। साथ ही बाजार में बॉक्स की कमी भी है। हमारे पास पर्याप्त बॉक्स और इनकोडर नहीं हैं।

सब्सक्राइबर बॉक्स के लिए 600 रुपये खर्च करने को तैयार नहीं हैं और फिर वे हर महीने अधिक भुगतान भी नहीं करना चाहते हैं। कुल मिलाकर यह पूरी प्रक्रिया स्थानीय केबल ऑपरेटरों के कारोबार को पूरी तरह अव्यावहारिक बता रहे हैं।Óहालांकि इस उद्योग के लोग कहते हैं कि डिजिटाइजेशन तीसरे चरण में चुनौती और अधिक होगी क्योंकि इसमें 5,000 शहरों और कस्बों के 3.1 करोड़ से ऊपर घरों को शामिल किया जाएगा। इसमें अधिक निवेश और समय लगेगा।                 

Keyword: Media, Digital TV, Telivision, Indian TV Industry, Kebal TV,
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