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जीडीपी पर जोर से पहले समझें उसका ओर-छोर
देश में जीडीपी के विकास को लेकर बहुत जोर दिया जाता है लेकिन वास्तव में इसके मानी क्या हैं और यह विकास का पैमाना कैसे बना?
अजित बालाकृष्णन /  March 10, 2013

समाचार पत्रों में आमतौर पर ऐसी सुर्खियां देखने को मिलती रहती हैं जिनमें देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) विकास दर गिरकर 4.5 फीसदी पर आने अथवा एसऐंडपी द्वारा देश की वृद्घि दर का अनुमान कम करने की बात लिखी रहती है। आम भारतीयों के दिल की धड़कनें बढ़ाने वाली ये खबरें देश की आधुनिक जीवन शैली का हिस्सा बन गई हैं। इन सब बातों को देखते हुए यही अंदाजा लगता है कि जीडीपी की उच्च दर हासिल करना किसी भी सरकार का एकसूत्री एजेंडा होना चाहिए।

जीडीपी के बारे में इतनी ढेर सारी बातों को सुनते हुए, जीडीपी की मूल अवधारणा को ही भुला बैठना कोई कठिन बात नहीं है। देश की ताकत और समृद्घि के कारक के रूप में इसका इस्तेमाल करना एकदम नई परंपरा है। इससे पहले किसी देश की ताकत का अंदाजा उसके नियंत्रण वाले भू-क्षेत्र के आधार पर लगाया जाता था। इंगलैंड जैसे देशों को समस्याओं से घिरे होने के बावजूद उनके नियंत्रण में उपनिवेश होने के कारण सम्मान से देखा जाता था। इसके बाद आए सिमोन कुजनेत्स। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री सिमोन पिन्स्क (पहले रूस और अब बेलारूस में) में जन्मे और आज के यूक्रेन में पलने-बढऩे के बाद अंतत: अमेरिका जा बसे।

सन 1930 के दशक में कुजनेत्स ने अमेरिका के लिए एक ऐसी लेखा व्यवस्था की खोज की जो राष्टï्रीय स्तर पर सभी स्रोतों से होने वाली आय का आकलन करती थी। विश्व बैंक और अंतरराष्टï्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) द्वारा अपनाए जाने के बाद उनकी मापन व्यवस्था यानी जीडीपी को वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त हो गई। उन संस्थानों ने इस विधि को विकास परियोजनाओं की गुणवत्ता का आकलन करने के लिए अपनाया। बहरहाल, प्राय: इस बात को भुला दिया जाता है कि ऊंची जीडीपी दर कैसे हासिल की जाए। वर्ष 1928 से 1937 के बीच सोवियत संघ की जीडीपी 5.4 फीसदी की दर से विकसित हुई और वह जवाहरलाल नेहरू समेत विकासशील देशों के तमाम नेताओं की नजरों में नायक का दर्जा पा गया। सोवियत संघ ने यह विकास दर किस तरह हासिल की थी, इसकी सच्चाई बहुत बाद में लोगों के सामने आ पाई।

सोवियत संघ ने अपने किसानों पर दबाव डालकर उनको निजी खेती त्यागने पर मजबूर किया और उनको सामूहिक खेती से जोड़ा। उनके द्वारा उपजाए गए अन्न को कम दाम पर सोवियत सरकार को बेचा गया। इसके बाद सरकार ने इस अनाज को अच्छे मुनाफे के साथ शहरी आबादी को बेचा। इस मुनाफे से हासिल हुए धन को उद्योग धंधों में निवेश किया गया। कुल मिलाकर इससे ऊंची विकास दर तो हासिल हुई लेकिन अगली आधी सदी तक देश के कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन लडख़ड़ाया रहा। ऐसा वक्त आ गया कि एक समय दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अनाज उत्पादक और निर्यातक देश अब अपनी आबादी का पेट भरने लायक अनाज तक नहीं उगा पा रहा था।

इसके बाद पूर्वी एशिया में जीडीपी विकास के 'चमत्कार का दौर आया। वर्ष 1966 से आरंभ हुए 30 साल के इस दौर में हॉन्गकॉन्ग, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, ताइवान और थाइलैंड जैसे देशों ने 7 फीसदी की चकित करने वाली विकास दर हासिल की। विश्व बैंक ने तत्काल इसे अपनी उस सलाह का असर बताया जिसके तहत उसने इन देशों को निर्यात आधारित नीति अपनाने की सलाह दी थी। लेकिन सन 1997 में पूर्वी एशियाई संकट नमूदार हुआ और यह विकास अपने आप रुक गया। इस संकट की शुरुआत थाइलैंड में उस वक्त हुई जब वहां की मुद्रा बहत अचानक धराशायी हो गई। उसके बाद यह संकट तेजी से अन्य पूर्वी एशियाई मुल्कों में फैल गया। इन देशों की मुद्राओं का भी अवमूल्यन होने लगा और शेयर बाजार तथा अचल संपत्ति बाजार लडख़ड़ा गए। कंपनियां दिवालिया होने लगीं और 7 फीसदी की विकास दर शून्य पर आ गई। संकट को टालने के लिए आईएमएफ को दखल देना पड़ा और उसने बाजार में 40 अरब डॉलर की नकदी डाली।

जल्दी ही 'विकृत पूंजीवाद और 'भ्रष्टाचार में इस संकट की वजह तलाशी जाने लगी। अर्थशास्त्री पाल क्रुगमैन द्वारा इसकी असल वजह तलाश की गई। उन्होंने कहा कि पूर्वी एशियाई चमत्कार मूलतया विदेशी पूंजी की जबरदस्त आवक पर आधारित था (जिसे भारत में संस्थागत विदेशी निवेश कहा जाता है)। इस पूंजी को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध स्थानीय श्रम का समर्थन हासिल था और इसने मिलकर जबरदस्त विकास दर को अंजाम दिया। वहीं दूसरी ओर प्रति व्यक्ति उत्पादन अथवा उत्पादकता में कोई वृद्घि देखने को नहीं मिल रही थी। इस उत्पादकतारहित विकास के साथ समस्या यह थी कि एक बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निवेश का माहौल बदलने और विदेशी पूंजी के पलायन के बाद विकास अपने आप रुक गया।

सच्चा सतत विकास केवल उत्पादकता में बढ़ोतरी करके ही हासिल किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जब अर्थव्यवस्था में प्रति व्यक्ति उत्पादकता बढ़े तो ही सही अर्थों में विकास होगा। उत्पादकता में यह बढ़ोतरी नवाचार के जरिये ही लाई जा सकती है। यह नवाचार तकनीकी और संगठनात्मक होगा और इसे अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों उद्योग, सेवा और कृषि में लाना होगा।

इस समय हमारे देश में जो बहस चल रही है वह भी विदेशी पूंजी जुटाने पर आधारित है। माना जाता है कि इस पूंजी का घरेलू स्तर पर निवेश करने से देश की विकास दर में बढ़ोतरी होगी और सेंसेक्स में उछाल आएगी। जाहिर है यह सब देखकर कुजनेत्स की आत्मा व्याकुल हो रही होगी। वह जीडीपी द्वारा विकास आंकने के पैमाने के आविष्कारक थे लेकिन वह इसे किसी राष्ट्र कुशलता का आकलन करने का पैमाना बनाने के हामी नहीं थे। उनका मानना था कि जीडीपी का पैमाना विकास की गुणवत्ता और उसकी मात्रा में भेद नहीं करता। उदाहरण के लिए, जीडीपी के लक्ष्य में इजाफा करने से वन क्षेत्र में कमी आ सकती है क्योंकि बहुत संभव है कि किसी वन को काटने से जीडीपी में अधिक तेजी से विकास हो। लेकिन यह भी सच है कि उक्त वन को न काटने के पर्यावरण संबंधी ढेर सारे फायदे हों। इससे झीलों व नदियों में जल की गुणवत्ता सुधर सकती है, ऑक्सीजन पैदा हो सकती है आदि। इनमें से कोई भी लाभ जीडीपी के आकलन में नहीं आएगा। कुछ अर्थशास्त्री कहेंगे कि अमेरिका में घरों और अचल संपत्ति के लिए ऋण आसान करके जीडीपी बढ़ाने की कोशिशों ने ही वैश्विक वित्तीय संकट को जन्म दिया।

जीडीपी विकास को गति देने का इकलौता विश्वसनीय तरीका है अर्थव्यवस्था में उत्पादकता को बढ़ावा देना। जाहिर है समय आ गया है कि हम अपने समाचार पत्रों और टेलीविजन परिचर्चाओं में ऐसे सांस्थानिक बदलावों की बात करें जिनके जरिये देश के विनिर्माण, सेवा और कृषि क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाई जा सके। ऐसा करने से हमारी विकास दर में जरूर बढ़ोतरी होगी।

Keyword: GDP, economic development,
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