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कपास की किल्लत, मिलों की सांसत
दिलीप कुमार झा / मुंबई 03 08, 2013

  • सीसीआई और नेफेड से उनके पास पड़े 30 लाख गांठ कपास जारी करने की गुजारिश
  • देश की कपड़ा मिलों की एक महीने से ज्यादा वक्त की जरूरत के बराबर है इतना कपास
  • घरेलू बाजार में कपास की कीमतें इस जिंस के अंतरराष्टï्रीय भाव के मुकाबले बहुत ज्यादा

देश की कपड़ा मिलें कपास की तगड़ी किल्लत का सामना कर रही हैं, नतीजतन उन्हें करीब 1 अरब डॉलर यानी 5,500 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है। नुकसान की मात्रा का अनुमान निर्यात संबंधी मौकों का फायदा न उठा पाने के तौर पर लगाया गया है क्योंकि घरेलू कमी की भरपाई करने और निर्यात प्रतिबद्घता पूरी करने के लिए उन्हें अधिक कीमत पर कपास आयात करना पड़ रहा है।

सार्वजनिक क्षेत्र की दो एजेंसियों, कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) और राष्टï्रीय कृषि एवं विपणन महासंघ (नेफेड) ने करीब चार महीने पहले कई मौकों पर बाजार में हस्तक्षेप के जरिये लगभग 30 लाख गांठ (170 किलोग्राम) कपास खरीदी थी। इतनी कपास देश की कपड़ा मिलों की एक महीने से ज्यादा वक्त की जरूरत के बराबर है। लेकिन पिछले साल अक्टूबर में कपास की सरकारी खरीद शुरू होने से लेकर अब तक इन एजेंसियों ने मुश्किल से 20,000 गांठ कपास जारी की हैं। पिछले चार महीनों के दौरान कपड़ा उद्योग से जुड़े बुनियादी संकेतों में जबरदस्त बदलाव आया है, जिससे घरेलू बाजार में कपास की कीमतें इस जिंस के अंतरराष्टï्रीय भाव के मुकाबले बहुत ज्यादा हो गईं। फिर भी मंत्रालय ने सीसीआई और नैफेड को खरीदी गई कपास जारी करने का निर्देश नहीं दिया।

सूती कपड़ा निर्यात संवर्धन परिषद (टेक्सप्रॉसिल) के अध्यक्ष मणिकम रामस्वामी ने कहा, 'देश की कपड़ा मिलें इन दिनों करीब 50 लाख गांठ कपास की कमी का सामना कर रही हैं और यह स्थिति कृत्रिम रूप से पैदा की गई है। नतीजतन मिलों को मजबूरी में कपास आयात करना पड़ रहा है, खास तौर पर पश्चिमी अफ्रीकी देशों से।Ó भारतीय कपड़ा उद्योग परिसंघ (सीटी) और परिधान निर्यात संवर्धन परिषद (एईपीसी) समेत इस उद्योग से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं ने कपड़ा मंत्रालय से कपास जारी करने का आग्रह किया है। व्यापार सूत्रों के मुताबिक विभिन्न बहुराष्टï्रीय कंपनियों के पास लगभग 30 लाख गांठ कपास है और वे इसकी बिक्री ऊंचे दाम पर कर रही हैं।
कपास की भारी किल्लत का असर घरेलू बाजार में इसकी कीमतों पर भी दिखा। मुंबई के हाजिर बाजार में 15 फरवरी को बेंचमार्क किस्म शंकर 6 का भाव 34,600 रुपये प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) था, जो 8 मार्च को 8.38 फीसदी बढ़कर 37,500 रुपये प्रति कैंडी के स्तर पर पहुंच गया।
रामस्वामी ने दावा किया कि कपास की कीमतों में इजाफा होने से कपड़े तैयार करने की लागत भी बेवजह बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में कंपनी के मुनाफे पर विपरीत असर हो सकता है क्योंकि फिलहाल मिलों का परिचालन महज 2-3 फीसदी मार्जिन पर हो रहा है।
बहरहाल, घरेलू कपड़ा मिलों ने पश्चिमी अफ्रीकी देशों से कपास का आयात तेज कर दिया है। पिछले 15-20 दिनों में करीब 20,000 गांठ कपास का ठेका दिया जा चुका है। ऐसी स्थिति में इस वर्ष कपास का आयात बढ़कर 20 लाख गांठ तक पहुंचने की संभावना है, जबकि पिछले साल केवल 12 लाख गांठ कपास का आयात किया गया था।
भारतीय कपड़ा मिलें फिलहाल पश्चिमी अफ्रीकी देशों के निर्यातकों को कम से कम 5 सेंट प्रति पाउंड अधिक भाव चुका रही हैं, जबकि घरेलू बाजार से सीसीआई और नैफेड के पास पड़े कपास की खरीद की जा सकती है। चूंकि घरेलू बाजार में कपास का भाव इसकी अंतरराष्टï्रीय कीमतों से बहुत कम है, लिहाजा निर्यात प्रतिबद्घता पूरी करने के लिए भारतीय निर्यातक भी आयात की संभावनाओं पर गौर कर रहे हैं।

कपड़ा मंत्रालय के अधीन कपास सलाह बोर्ड (सीएबी) ने 2012-13 के सीजन में 34.6 लाख गांठ कपास के कैरीओवर भंडार का अनुमान लगाया है, जो एक साल पहले से 28.6 लाख गांठ अधिक है। सीएबी ने अनुमान लगाया है कि मौजूदा सीजन में देश का कपास उत्पादन 3.34 करोड़ गांठ रहेगा, जबकि पिछले सीजन में 3.53 करोड़ गांठ कपास का उत्पादन हुआ था। इस साल कपड़ा मिलों में 2.3 करोड़ गांठ कपास की खपत का अंदाजा है, जबकि पिछले साल मिलों ने 2.17 करोड़ गांठ कपास का इस्तेमाल किया था। 

 

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