सोने ने बढ़ाई मुश्किल | बीएस संवाददाता / नई दिल्ली February 27, 2013 | | | | |
वित्त वर्ष 2012-13 की आर्थिक समीक्षा में कई सालों के घरेलू बचत संयोजन में खासे बदलाव सामने आ हैं और इसमें सोने में होने वाले निवेश को दूसरे क्षेत्रों को स्थानांतरित करने के वास्ते कदम उठाने की जरूरत को रेखांकित किया गया है।
देश की बचत दर (बाजार मूल्य पर सकल घरेलू उत्पाद में सकल घरेलू बचत का प्रतिशत में आंकड़ा) वर्ष 2007-08 में 36.8 फीसदी के उच्चतम स्तर पर थी और 2011-12 में आठ साल के न्यूनतम स्तर 30.8 फीसदी पर पहुंच गई थी।
समीक्षा में इस बात का उल्लेख किया गया कि हाल के वर्षों में घरेलू बचतों में भौतिक बचतों के विपरीत वित्तीय बचत में कमी आ रही है। इसमें कहा गया कि कम रिटर्न और 1990 के दशक की तुलना में 2000 के दशक में ज्यादा उतार-चढ़ाव के चलते कुल वित्तीय बचत में शेयरों और डिबेंचरों की हिस्सेदारी में कमी आई है।
सोने की खरीद के बढ़ते रुझान से बचतों और घरेलू वित्तीय निवेशों पर नकारात्मक असर पडऩे पर जोर देते हुए समीक्षा में कहा गया, 'महंगाई की मार के साथ ही यह भी एक कारण है कि हाल के वर्षों में सोने में निवेश सुरक्षित स्वर्ग बन गया है।Ó
सोने की बढ़ती मांग को अर्थव्यवस्था की आधारभूत समस्याओं का एक 'लक्षणÓ बताते हुए समीक्षा में मुद्रास्फीति को थामने, वित्तीय समावेशन का विस्तार, मुद्रास्फीति सूचकांक बॉन्ड जैसे नए उत्पादों की पेशकश और वित्तीय उत्पादों के इस्तेमाल में सुधार पर खासा जोर दिया गया।
देश के घरेलू क्षेत्र की वित्तीय बचतों में अधिकांश बैंक जमाओं (वर्ष 2000 में लगभग 30 फीसदी), जीवन बीमा पूंजी (1980 के 9.6 फीसदी की तुलना में 2000 में 22 फीसदी) और पेंशन व भविष्य निधि खातों (1980 के 23.6 फीसदी की तुलना में 2000 में 16.5 फीसदी) के रूप में है।
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