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रेल बजट निराशाजनक
बीएस संवाददाता /  02 26, 2013

रेल बजट 2013-14 निराशाजनक है। इसमें केवल कांग्रेस शासित प्रदेशों को मदद दी गई है जबकि बिहार की उपेक्षा हुई है।  संप्रग 2 में साहस की कमी है और इसने जनवरी महीने में ही रेल किराए में बढ़ोतरी कर चालाकी की थी। अब यह संसद में कह रही है कि रेल किराये में बढ़ोतरी नहीं की गई है। बजट में कोई विजन नहीं है। यह केवल स्टॉप गैप व्यवस्था है। इस बजट के कारण अगले वर्ष लोकसभा चुनाव के बाद सत्ता में आने वाली नई सरकार के लिए समस्या होगी। इस बजट में बिहार के लिए कोई नई ट्रेन नहीं दी गई हैं, जबकि बड़ी संख्या में बिहार के यात्री ट्रेन से यात्रा करते हैं।
आम आदमी पर बोझ
यह रेल बजट जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। सरकार ने बजट सत्र की शुरुआत के पहले ही किरायों में बढ़ोतरी कर दी थी। अब सरकार ने नया दांव चलते हुए ईंधन की कीमतों को कारण बताकर माल भाड़े में बढ़ोतरी करने का फैसला किया है। इस बढ़ोतरी की वजह से कुल कीमतों में करीब 5 फीसदी की तेजी आएगी। मालभाड़े में किए गये इजाफे का सीधा असर देश में महंगाई की दरों पर सीधे तौर पर पड़ता है। इसके अलावा तत्काल की दरों और सुपरफास्ट गाडिय़ों के किराए में की गई बढ़ोतरी से भी आम आदमी के हित प्रभावित होंगे। इसके अलावा रेल मंत्री ने बुनियादी सुविधाएं विकसित करने और यात्री सुविधाओं की ओर भी गौर नहीं किया है। सरकार ने 24,600 करोड़ रुपये के घाटे का रेल बजट पेश किया है। इस बजट से सरकार की अदूरदर्शिता का पता चलता है।
रेल का राजनीतिकरण
रेल बजट एक विशेष क्षेत्र को तवज्जो देने वाला है। इस तरह से रेलवे का राजनीतिकरण करना देश के लिए ठीक नहीं है। पिछले कई वर्षो से संप्रग के घटक दल के पास रेल मंत्रालय रहा। यह आम चलन हो गया है कि इन दलों ने अपने राज्यों पर ध्यान दिया और रेलवे का राजनीतिक इस्तेमाल किया। देश के विकास और जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए रेलवे का जाल बिछाया जाना चाहिए और इसमें कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में 75 जिले हैं। रेल लाइन या अन्य रेल परियोजनाएं यदि रायबरेली के लिए ही होगी तो शेष 74 जिलों का क्या होगा। देश के तमाम क्षेत्रों में रेल नेटवर्क के विस्तार पर  ध्यान देने की जरूरत है। देश के गरीब लोग और मध्यम वर्ग सबसे अधिक रेलवे का उपयोग करते हैं, इसलिए इनके हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। एक विशेष क्षेत्र पर पूरा ध्यान लगाना ठीक नहीं है। रेलवे का राजनीतिकरण बिल्कुल भी नहीं होना चाहिए।

बोझ बढ़ाने वाला बजट
रेल बजट गरीबों और मध्य वर्ग के लिए पूरी तरह से निराशाजनक है। खासकर इससे पंजाब के लोग निराश हुए हैं। केंद्र सरकार ने पिछले दरवाजे से किराये में अतिरिक्त बढ़ोतरी करके आम आदमी पर बोझ बढ़ा दिया है। गरीब और मध्य वर्ग को निराश करते हुए रेल मंत्री ने अपने बजट में किसी भी नई सुविधा की घोषणा नहीं की है। पंजाब के लिए भी रेल बजट में कुछ भी खास नहीं है। सरकार ने राज्य में एकीकृत रेल कोच फैक्ट्री लगाने के अपने वादे को पूरा नहीं किया। इसके अलावा मालभाड़े को समान करने और मुंबई-कोलकाता मालभाड़े गलियारे को अमृतसर तक बढ़ाने की हमारी मांग को भी रेल बजट में कोई जगह नहीं दी गई है। इस बजट में कांग्रेस शासित राज्यो का खास खयाल रखा गया है जबकि पंजाब की मांगों की अनदेखी की गई है।

हरियाणा के लिए बेहतर
 सोनीपत में रेल कोच निर्माण और रखरखाव इकाई और मेवात क्षेत्र में रेल सेवाएं शुरू किए जाने की हरियाणा की पुरानी मांग को स्वीकार किया गया है। दिल्ली-सोहना-नूह-फिरोजपुर, झिरका-अलवर, हिसार-सिरसा वाया अगरोहा और फतेहाबाद, यमुनानगर-चंडीगढ़ वाया सधौरा, नारायणगढ़ जैसी नई रेल लाइनें शुरू किया जाना रेल मंत्रालय का सराहनीय कदम है। मंत्रालय ने कुछ नई लाइनों के लिए सर्वेक्षण का काम शुरू करने की घोषणा की है। कुछ एक्सप्रेस ट्रेनों को हरियाणा के रास्ते से गुजारने के प्रस्ताव से हरियाणावासियों को काफी सहूलियतें होंगी। इसके अलावा परंपरागत रूप से दिल्ली-कुरुक्षेत्र के बीच की मेमू और डेमू सेवाओं के बदले दिल्ली-रोहतक मेमू सेवा की शुरुआत करने का हम स्वागत करते हैं।

रेल का राजनीतिकरण
रेल बजट एक विशेष क्षेत्र को तवज्जो देने वाला है। इस तरह से रेलवे का राजनीतिकरण करना देश के लिए ठीक नहीं है। पिछले कई वर्षो से संप्रग के घटक दल के पास रेल मंत्रालय रहा। यह आम चलन हो गया है कि इन दलों ने अपने राज्यों पर ध्यान दिया और रेलवे का राजनीतिक इस्तेमाल किया। देश के विकास और जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए रेलवे का जाल बिछाया जाना चाहिए और इसमें कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में 75 जिले हैं। रेल लाइन या अन्य रेल परियोजनाएं यदि रायबरेली के लिए ही होगी तो शेष 74 जिलों का क्या होगा। देश के गरीब लोग और मध्यम वर्ग सबसे अधिक रेलवे का उपयोग करते हैं, इसलिए इनके हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। एक विशेष क्षेत्र पर पूरा ध्यान लगाना ठीक नहीं है। रेलवे का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए।

Keyword: Rail Budget, Indian Rail, Railway, Rail Budget 2013-14, Rail minister, Parliyament, Pawan Kumar Bansal,
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